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Haryana: अलग होने की अटकलें एक साल से थी, सीट बंटवारे के पेंच से भाजपा को मौका मिल गया
Tue, 12 Mar 2024 11:20 PM IST
भूपेंद्र सिंह
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
Published by: भूपेंद्र सिंह
Updated Tue, 12 Mar 2024 11:20 PM IST
सार
जजपा भाजपा से दो सीटें मांग रही थी। भाजपा एक भी देने को तैयार नहीं थी। इसी बात को लेकर गठबंधन टूट गया।
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भाजपा-जजपा गठबंधन
- फोटो : सांकेतिक तस्वीर
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विस्तार
हरियाणा में भाजपा-जजपा के गठबंधन टूटने की अटकले पिछले एक साल से चल रही थी। भाजपा अपनी सहयोगी पार्टी जजपा से गठबंधन तो तोड़ना चाहती थी, मगर उसे कोई ठोस कारण और मौका नहीं मिल पा रहा था। इस बार पेच लोकसभा चुनाव में आकर फंस गया। भाजपा राज्य की दसों सीट पर कमल खिलाना चाहती है। मगर एनडीए कुनबे में शामिल होने की वजह से जजपा अपने सहयोगी दल से दो सीटे मांग रही थी।
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इसी सिलसिले में सोमवार को नई दिल्ली में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और जजपा प्रमुख दुष्यंत चौटाला के बीच करीब 45 मिनट मुलाकात चली, मगर बात सिरे नहीं चढ़ पाई। उसके बाद भाजपा ने गठबंधन तोड़ने का मन बना लिया। दोनों के बीच गठबंधन तोड़ने को यही बड़ी वजह मानी जा रही है। हालांकि भाजपा नेताओं ने गठबंधन तोड़ने के कई और कारण भी गिनाए हैं।
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भाजपा नेताओं ने बताया कि सत्ता में साझेदार बनने के बाद दुष्यंत को सभी महत्वपूर्ण विभाग सौंप दिए गए थे। दुष्यंत के पास उद्योग, पीडब्ल्यूडी, एक्ससाइज, हाईवे, राजस्व और नागरिक उड्डयन जैसे कई महत्वपूर्ण विभाग थे। साथ ही डिप्टी सीएम का दर्जा दिया और पार्टी के दो अन्य विधायकों को भी मंत्री बनाया। दुष्यंत के पास जो विभाग थे, उन्हीं को लेकर कई बार विपक्ष ने सवाल खड़े किए।
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कोरोना काल में शराब घोटाला हुआ। खूब हो हल्ला मचा, मगर जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई। इसी दौरान रजिस्ट्री घोटाला भी हुआ। इससे भी सरकार की छवि खराब हुई। विपक्ष भी जजपा के बजाय भाजपा पर निशाना साधता था। वहीं, भाजपा के पूर्व सहयोग चौधरी बीरेंद्र सिंह भी कई मौकों पर जजपा पर भ्रष्टाचार के आरोप लगा चुके थे। भाजपा के नेताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि राज्य की भाजपा सरकार के किए गए कार्यों का भी वह श्रेय ले रहे थे।
राज्य के हाईवे में जो अभूतपूर्व सुधार व निर्माण हुआ है, उसका श्रेय दुष्यंत ही लेते रहे। हालांकि विभाग उनके पास ही था, लेकिन अधिकतर योजनाएं केंद्र सरकार पास कर रही थी। वहीं, राज्य सरकार ने पंचायती राज संस्थाओं में भी महिलाओं के लिए 50 फीसदी कोटा तय किया था, जिसका भी श्रेय दुष्यंत ले रहे थे। यह बातें भाजपा आलाकमान को पसंद नहीं आई और गठबंधन तोड़ने का यह भी एक कारण बना। वहीं, भाजपा के कई विधायक भी जजपा के साथ गठबंधन को लेकर अपनी नाराजगी जता चुके थे।
जाट वोट भी एक कारण बना
हरियाणा की राजनीति जाट व गैर जाट वोटों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। भाजपा का जाट वोटों में प्रभाव बहुत कम है। पार्टी का भी पता है कि आगामी चुनावों में उन्हें जाट वोट नहीं मिलेंगे। ऐसे में उनके लिए जाट वोटों का धुव्रीकरण उन्हें फायदे में पहुंचा सकता है। राज्य का जाट वोट कांग्रेस और इनेलो के बीच ही विभाजित होता रहा है। ऐसे में जजपा भाजपा से अलग होकर अपने उम्मीदवार उतारती है तो इससे जाट वोट विभाजित हो सकते हैं और गैर जाट वोट भाजपा के पाले में गिर सकते हैं।
दुष्यंत के सामने राजनीतिक संकट
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा राजनीतिक संकट जजपा दुष्यंत चौटाला के सामने आने वाला है। दुष्यंत फिलहाल उचाना कलां से विधायक हैं। वह एलान कर चुके हैं कि राज्य की दसों सीट पर वह अपने उम्मीदवार उतारेंगे। चुनाव में यदि उन्हें नतीजे ठीक नहीं मिलते हैं तो आठ महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में उनके सामने बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। वहीं, यह भी चर्चा है कि उनकी पार्टी के विधायक भी उनसे अलग हो सकते हैं। ऐसे में आने वाले दिन दुष्यंत के लिए अच्छे नहीं होने वाले।