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Hindi News ›   Chandigarh ›   Haryana Elections 2024: CET and portal a big issue among the youth, but the discussion is only about Hooda.

Haryana Elections 2024 : युवाओं में सीईटी और पोर्टल बड़ा मुद्दा, लेकिन चर्चा बस हुड्डा की और इसलिए

Fri, 04 Oct 2024 05:07 AM IST
दुष्यंत शर्मा योगेश नारायण दीक्षित, रोहतक
योगेश नारायण दीक्षित, रोहतक Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Fri, 04 Oct 2024 05:07 AM IST
सार

यहां के युवा मतदाताओं से जब आप मुद्दों पर बात करते हैं, तो वे सीईटी से लेकर भाजपा सरकार में बने पोर्टल तक पर खुलकर तर्क के साथ बहस करते हैं। इतना बढ़िया संवाद करने वाले भी अपनी चर्चा में कहीं न कहीं भूपेंद्र सिंह हुड्डा का नाम ले ही आते हैं। इसकी वजह साफ है। यहां के लोग मानकर बैठे हैं कि हुड्डा जीतेंगे तो मुख्यमंत्री बनेंगे और हर घर में कम से कम एक सरकारी नौकरी आ ही जाएगी।  

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Haryana Elections 2024: CET and portal a big issue among the youth, but the discussion is only about Hooda.
भूपेंद्र हुड्डा और मंजू हुड्डा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

शहर के सेक्टर-4 से जब सोनीपत रोड पर चलते हैं, तो दरअसल आप गढ़ी सांपला-किलोई के उस विधानसभा इलाके में होते हैं जहां लगातार 19 साल से भूपेंद्र सिंह हुड्डा चुनाव जीत रहे हैं। यहां के युवा मतदाताओं से जब आप मुद्दों पर बात करते हैं, तो वे सीईटी से लेकर भाजपा सरकार में बने पोर्टल तक पर खुलकर तर्क के साथ बहस करते हैं। इतना बढ़िया संवाद करने वाले भी अपनी चर्चा में कहीं न कहीं भूपेंद्र सिंह हुड्डा का नाम ले ही आते हैं। इसकी वजह साफ है। यहां के लोग मानकर बैठे हैं कि हुड्डा जीतेंगे तो मुख्यमंत्री बनेंगे और हर घर में कम से कम एक सरकारी नौकरी आ ही जाएगी।  

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यह सिक्के का एक पहलू है जिस पर शहर और गांव सब जगह चर्चा है। वहीं दूसरा पहलू है कि भाजपा ने युवा और महिला प्रत्याशी के तौर पर मंजू हुड्डा के रूप में ऐसा चेहरा उतार दिया है, जिसने चुनौती देने के साथ ही मुकाबले को चर्चा में ला दिया है। जाट बहुल इस क्षेत्र में कम से कम इतनी चर्चा तो होने लगी है कि हुड्डा राज में किसे नौकरी मिली थी और किसे नहीं। चुनाव प्रचार थमने से पहले हरियाणा की इस सबसे हॉट सीट का माहौल इतना ठंडा है कि मतदाताओं के मन को परखना कठिन है। वैसे प्रत्याशी तो यहां और भी हैं। इनेलो-बसपा गठबंधन से कृष्ण कौशिक एडवोकेट, जजपा-आसपा से सुशीला देशवाल और आप से प्रवीण घुसकानी चुनावी मैदान में हैं। ये सभी परिणाम पर कितना असर डालंेगे, यह कहना अभी मुश्किल है। 
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भूपेंद्र सिंह हुड्डा प्रत्याशी, कांग्रेस
2005 में कांग्रेस के श्रीकृष्ण हुड्डा ने किलोई क्षेत्र में जीत दर्ज की थी। लेकिन, रोहतक के तत्कालीन सांसद भूपेंद्र सिंह हुड्डा को कांग्रेस ने सीएम बनाया तो श्रीकृष्ण ने त्यागपत्र दे दिया। उपचुनाव में हुड्डा जीत गए और इसके बाद 2009, 2014 और 2019 में हुड्डा ने बड़ी जीत दर्ज की थी। इस बार भी वह इसी क्षेत्र से प्रत्याशी हैं।

मंजू हुड्डा प्रत्याशी, भाजपा
जिला परिषद पार्षद और फिर रोहतक जिला परिषद की युवा अध्यक्ष बनकर सियासत की पारी शुरू करने वाली मंजू हुड्डा इसी हलके के धामड़ गांव की बहू हैं। उन्होंने पांच साल में ही भाजपा में मजबूत पकड़ बनाकर कांग्रेस के सीएम चेहरा माने जा रहे पूर्व मुख्यमंत्री हुड्डा के खिलाफ विधायकी का टिकट हासिल कर लिया।

शहर से अलग है  गांव की कहानी
भालाैठ जैसे बड़े गांव में बाजार से लेकर लोगों की बैठक तक में चुनाव की चर्चा है। जाट बहुल इस गांव में आबादी तो मिश्रित है, लेकिन सियासी तौर पर लोग करीब एक सी बात कहते हैं। कस्बेनुमा इस गांव में अच्छा बाजार है। यहां की एक दुकान पर हुक्का गुड़गुड़ाते युवा से लेकर बुजुर्ग तक मिले। सत्ताधारी दल के इलाके के बड़े नेता भी मिले और इंजीनियरिंग पढ़े युवा भी। एक बुजुर्ग का कहना था, हुड्डा सरकार में बड़े गांव के चंद घरों के बच्चों को ही सरकारी नौकरी मिलीं, बाकी इंतजार करते रहे। हालांकि युवा दलबीर फोगाट का कहना था कि मुद्दा नौकरियों के साथ विकास का भी है। वह कहते हैं रोहतक के इस इलाके में पिछले दस साल में हुए विकास का एक भी नमूना नहीं है किसी के पास। हालांकि यहां चर्चा थोड़ी पारंपरिक सी लगी।

  • दूसरी ओर, रोहतक के सेक्टर और मार्केट में न तो चुनावी चर्चा है और न सामने आकर वोटिंग को लेकर बोलने का चार्म। सेक्टर-4 में अखबार पढ़ते कर्मवीर पहलवान हमसे जानना चाहते हैं कि हवा का रुख क्या है, लेकिन खुद कोई राय रखने से पहले झूला छोड़कर घर के अंदर चले जाते हैं, आैर जाते-जाते घर के सामने सड़क की उखड़ती बजरी दिखाते हुए कहते हैं, यही विकास हुआ है यहां...। मिलती-जुलती बात उनके पड़ोस में रहने वाले राज धनखड़ ने भी रखी। उन्होंने कहा, सेक्टर के लोग वोट डालने जाएंगे तो ही बदलाव होगा। शहरी वोटर की इतनी चुप्पी इसी इलाके में देखने को मिली।


विकास का यह मॉडल समझना होगा
चुनाव में कौन भारी और क्या जमीनी हकीकत, यह जानने के लिए हम पहुंचे भालाैठ के उस इलाके में जहां सबसे ज्यादा वोट समूह से इतर जाति के लोग रहते हैं। यहां युवाओं के साथ सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त करतार भौरिया भी चुनावी चर्चा में शामिल मिले। उन्होंने बताया कि करीब 10 वर्ष पहले कांग्रेस सरकार में बोहर व आसपास के गांवों की जमीन पर औद्योगिक मॉडल टाउनशिप बसाया गया था। तब मारुति, एशियन पेंट्स जैसी कई कंपनियां वहां आईं। इन कंपनियों ने भालाैठ समेत कई गांवों को गोद लिया। वहां सीवर से लेकर बिजली-पानी और सड़क तक की व्यवस्था कंपनियां देखती हैं। जो गांव इस योजना में नहीं आए, उनमें नागरिक सुविधाएं न के बराबर हैं। गांव के युवाओं के पास सरकारी नौकरियों में सीईटी की अनिवार्यता को लेकर सवाल हैं। अभिमन्यु और अश्विनी कहते हैं, नवंबर 2022 के बाद सीईटी की परीक्षा दोबारा नहीं हुई। ऐसे में जिनके नंबर कम रह गए थे, उन्हें अंक सुधारने का मौका नहीं मिला। हर छह महीने में सीईटी कराने के वादे पर अमल न होने से कई युवा ओवरएज होने वाले हैं। इन युवाओं का साफ मानना है कि सरकार चाहे जिसकी बने, नौकरी के अवसर समान व समय पर मिलने चाहिए।

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