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कांग्रेस के सियासी भंवर में फंसे रह गए तंवर, हुड्डा से नहीं पा सके पार, अब नई पारी का इंतजार

Sun, 06 Oct 2019 05:29 AM IST
देव कश्यप यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
यशपाल शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: देव कश्यप Updated Sun, 06 Oct 2019 05:29 AM IST
सार

  • पार्टी को नई पीढ़ी अनुसार चलाने में नाकाम रहने पर कहा तंवर ने कहा अलविदा
  • पूर्व सीएम हुड्डा से नहीं पा सके पार, अब नई पारी का रहेगा इंतजार

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Haryana assembly Election 2019 Ashok Tanwar resignation Shocking for Congress
Abhay Chautala, CM Manohar lal & Ashok Tanwar - फोटो : File Photo

विस्तार

हरियाणा में कांग्रेस को चुनावी बेला में एक के बाद एक झटके लग रहे हैं। अनेक पूर्व विधायक, मंत्री व नेता टिकट वितरण के बाद पार्टी छोड़कर दूसरे दलों में जा चुके हैं या फिर निर्दलीय चुनाव मैदान में ताल ठोक दी है। इसके बाद कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका शनिवार को तब लगा जब पूर्व प्रदेशाध्यक्ष व पूर्व सांसद अशोक तंवर ने भी पार्टी छोड़ दी। उन्होंने प्राथमिक सदस्यता से अपना इस्तीफा राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेजा है।

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अब सोनिया पर निर्भर है, वह क्या निर्णय लेती हैं। तंवर के तेवर बेहद तल्ख हैं। विधानसभा चुनाव के लिए टिकट वितरण में अनदेखी से वह खासा नाराज थे। चुनाव की घोषणा से ठीक पहले चार सितंबर 2019 को प्रदेशाध्यक्ष पद से हटाने पर उन्हें गहरा आघात लगा था, जिससे वह उभर नहीं पाए। उनकी नाराजगी कांग्रेस हाईकमान से बढ़ती ही गई। टिकट वितरण में वह युवा व नए चेहरों को तरजीह चाह रहे थे, जो नहीं हुआ।
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हाईकमान ने पूर्व सीएम भूपेंद्र हुड्डा व सैलजा की पसंद को ही तवज्जो दी। पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा से सीधी टक्कर लेना भी तंवर को भारी पड़ा। तंवर समझ ही नहीं पाए कि वह कांग्रेस के सियासी भंवर में फंस चुके हैं। जिससे पार पाने के लिए जोश और संयम दोनों की जरूरत थी। कार्यकर्ताओं व समर्थकों की भावनाओं में वह बह गए। वह पार्टी को नई पीढ़ी की सोच अनुसार चलाना चाह रहे थे, जो संभव नहीं हो पाया। तंवर की नई पारी का अब सभी को इंतजार है कि वह किसी दल के साथ जाएंगे, किसी का समर्थन करेंगे या फिर अभी विधानसभा चुनाव के नतीजों को देखेंगे।

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पांच साल आठ महीने रहे प्रदेशाध्यक्ष

तंवर 5 साल 8 महीने प्रदेशाध्यक्ष रहे। 2009 से 2014 तक सिरसा से सांसद रहे। 2014 व 2019 में सिरसा सीट पर ही हार का सामना करना पड़ा। उन्होंने अनेक आंदोलन किए, साइकिल यात्रा भी की। नतीजतन, लोकसभा चुनाव में छह फीसदी से अधिक वोट भी बढ़े। तंवर को उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव उनकी अध्यक्षता में ही होंगे, लेकिन उन्हें शायद आभास नहीं था कि राहुल गांधी के पद छोड़ने व गुलाम नबी आजाद के हरियाणा प्रभारी बनने के बाद उनकी जमीन खिसक चुकी थी। तंवर की कमजोरी यह भी रही कि वह हरियाणा में जमीन स्तर पर संगठन खड़ा नहीं कर पाए। गुटबाजी इतनी हावी थी कि उनके कार्यकाल में जिलाध्यक्ष व ब्लॉक अध्यक्ष तक नियुक्त नहीं हुए। लोकसभा चुनाव में करारी हार का ठीकरा भी मोदी लहर के साथ कमजोर संगठन पर फोड़ा गया।

चुनावों में कांग्रेस को नुकसान की आशंका

तंवर के कांग्रेस छोड़ने से पार्टी को विधानसभा चुनाव में नुकसान हो सकता है। तंवर ने 80 सीटों पर अपने समर्थकों के लिए टिकट मांगे थे। जिनमें से दो को ही टिकट मिले हैं। कई समर्थक आजाद खड़े हो चुके हैं तो अनेक ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। तंवर के समर्थक अगर दूसरे दलों को चुनाव में समर्थन देते हैं तो कांग्रेस का चुनावी गणित बिगड़ेगा। कांग्रेस में अब भितरघात की आशंका भी बढ़ गई है। एससी वर्ग में तंवर ने अपना अलग कैडर तैयार किया है, जो अब कांग्रेस से खिसकेगा। प्रदेश में 17 विधानसभा सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं।

हुड्डा का एक और कांटा निकला

जींद उपचुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रणदीप सुरजेवाला तीसरे स्थान पर रहे थे। चुनाव से पहले शिक्षा मंत्री रामबिलास शर्मा ने कहा था कि हुड्डा के रास्ते का कांटा निकल गया। नतीजे भी वैसे ही आए। अब विधानसभा चुनाव से पहले तंवर के रूप में एक और कांटा निकल गया। अब हुड्डा के कंधों पर चुनाव जिताने की जिम्मेदारी आ गई है।

सोनिया ने तंवर को नहीं दी तवज्जो

सोनिया गांधी ने अध्यक्ष पद दोबारा संभालने के बाद अशोक तंवर को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। वह मिलने का समय मांगते रहे, नहीं मिला। सोनिया बदलाव का मन बना चुकी थी। राष्ट्रीय अध्यक्ष के आवास के बाहर कार्यकर्ताओं से हंगामा कराकर तंवर से रही सही कसर भी पूरी कर दी। उनसे पार्टी काफी नाराज थी।

कांग्रेस में बिना पैसे कुछ नहीं होता : सीएम

 अशोक तंवर के कांग्रेस छोड़ने पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा कि कांग्रेस में बिना पैसे के कुछ नहीं होता। कांग्रेस में ऐसा होता रहता है।

इनेलो में तंवर का स्वागत : अभय

इनेलो नेता अभय चौटाला ने कहा कि इनेलो में तंवर का स्वागत है। कांग्रेस ने दलित की राजनीति की, मगर हमेशा दलित को कमजोर रखा। पांच साल तक तंवर के नाम पर दलित को जोड़ा।

कांग्रेस कभी एकजुट रही ही नहीं: दुष्यंत

जजपा नेता दुष्यंत चौटाला ने कहा कि कांग्रेस न कभी एकजुट थी और न ही अब एकजुट है। चारों ओर कांग्रेस में बगावत के बिगुल बज रहे हैं। कांग्रेसी नेता एकजुटता के लाख दावे करते रहे, नजीता सबके सामने है। कांग्रेस की टूट का सिलसिला तो पिछले विधानसभा चुनावों के बाद ही शुरू हो गया था।

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