बड़ी उपलब्धिः 49 साल की दादी ने 6 साल के पोते को दी जिंदगी, पीजीआई चंडीगढ़ ने रचा इतिहास
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छह साल के एक बच्चे का लाइव डोनर लिवर ट्रांसप्लांट (एलडीएलटी) कर पीजीआई की उपलब्धियों में एक और अध्याय जुड़ गया है। इसके साथ लाइव लिवर ट्रांसप्लांट करने वाला पीजीआई उत्तर भारत का पहला संस्थान बन चुका है। हालांकि, पीजीआई साल 2011 से लिवर ट्रांसप्लांट कर रहा है, लेकिन वह मृत डोनर से होता है।
यह पहली बार है कि किसी जिंदा व्यक्ति से लिवर का कुछ हिस्सा लेकर मरीज में ट्रांसप्लांट किया गया है। इस नए केस में बच्चे की दादी के लिवर का हिस्सा लेकर ट्रांसप्लांट किया गया है। दादी और पोता दोनों ठीक हैं। इस केस की सफलता पर कई मरीजों की उम्मीदें टिकी हैं।
बचपन से ही शुरू हो गई थीं दिक्कतें
सूरज मूल रूप से झारखंड का रहने वाला है। जन्म से ही उसके लिवर में दिक्कत थी। अक्सर दस्त आती थी। पहले तो वहीं दिखाते रहे। दवाई से लेकर झाड़-फूंक किया। उल्टा दिक्कतें और बढ़ गईं। यूरीन से खून आने लगा। वे फिर अपने बच्चे को लेकर उत्तर भारत के प्रतिष्ठित लिवर अस्पताल इंस्टीट्यूट ऑफ लिवर एंड बायलेरी साइंस, नई दिल्ली पहुंचे।
दो साल तक वहां इलाज चला, लेकिन सुधार नहीं हुआ। वहां से बच्चे को पीजीआई रेफर कर दिया गया। पिछले साल अगस्त में चंडीगढ़ पहुंचे। छह महीने तक बच्चे का इलाज चला। इस दौरान उसकी हालत और खराब होने लगी। आंखें पीली पड़ने लगीं। पेट भी काफी फूल गया। जांच में पता चला कि बच्चा कांजिनाइटेल हिपेटिक फाइब्रोसिस से पीड़ित था। यदि ट्रांसप्लांट नहीं किया जाता तो शायद बच्चे की जिंदगी खतरे में पड़ जाती।
इसमें लिवर के सेल सख्त हो जाते हैं। लिवर में ब्लड की नसें फूलती हैं। कई बार ब्लीडिंग भी होती है। बाद में स्थिति यह आती है कि लिवर खराब हो जाता है। इसमें ट्रांसप्लांट के अलावा कोई चारा नहीं होता।
18 घंटे तक चला ऑपरेशन
पहले लाइव डोनर लिवर ट्रांसप्लांट के लिए पीजीआई को 18 घंटे तक मशक्कत करनी पड़ी। बताया गया है कि गुरुवार सुबह छह बजे पहले 49 वर्षीय दादी को आपरेशन थियेटर में ले जाया गया। बायोप्सी कर उसके लिवर को एग्जामिन किया गया। डेढ़ घंटे में उसके रिजल्ट आए तो करीब नौ बजे सूरज को ऑपरेशन थियेटर ले जाया गया।
दादी का लिवर स्वस्थ था। उनके लिवर कुछ हिस्सा लिया गया और सूरज में ट्रांसप्लांट कर दिया गया। दादी को करीब छह बजे रिकवरी रूम में लाया गया, जबकि 11.30 बजे सूरज को। सर्जिकल टीम का नेतृत्व प्रोफेसर अरुणानांशु बेहरा ने किया। टीम में प्रोफेसर एल कमन, डॉ. दिव्या दहिया, प्रो. साधना लाल (पीडियाट्रिक गेस्ट्रोएंट्रोलाजी) शामिल रहे। एनेस्थीसिया टीम का नेतृत्व प्रो. जीडी पुरी ने किया। उनके साथ डॉ. समीर सेठी और डॉ. कमल काजल मौजूद रहे।
इस उपलब्धि के लिए पीजीआई ने आठ साल तक इंतजार किया
लाइव डोनर लिवर ट्रांसप्लांट के लिए अनुभव की जरूरत पड़ती है। दक्षता हासिल करने के लिए पीजीआई साल 2011 से दिवंगत डोनर से ट्रांसप्लांट की प्रैक्टिस कर रहा है। अब तक पीजीआई 50-60 सफल ट्रांसप्लांट कर चुका है। लिवर ट्रांसप्लांट के इंतजार में करीब 50 लोग वेटिंग में है।
आठ से दस लोगों को एग्जामिन किया जा चुका है। जल्द ही दूसरे ट्रांसप्लांट किए जाएंगे। बताया जा रहा है इस तकनीक का इस्तेमाल यंग पेशेंट में किया जाएगा। इसमें मरीज का कोई भी परिजन अपने लिवर का 65 प्रतिशत हिस्सा डोनेट कर सकता है। जो हिस्सा डोनेट होता है, वह फिर से बढ़ने लगता है।
दिवंगत औैर लाइव लिवर डोनर ट्रांसप्लांट में अंतर
दिवंगत ट्रांसप्लांट किसी ब्रेन डेड मरीज के परिजनों की स्वीकृति के बाद किया जाता है। वहीं लाइव लिवर डोनर ट्रांसप्लांट में किसी मरीज के परिजन का लिवर का कुछ हिस्सा लेकर उसमें ट्रांसप्लांट किया जाता है। जिस डोनर का लिवर लिया जाता है, उसमें धीरे-धीरे लिवर के सेल उत्पन्न होते हैं। हालांकि, इसमें डोनर के साथ रिसीपिएंट (जिसमें लिवर ट्रांसप्लांट किया जाता है) की विशेष निगरानी रखनी होती है।
यह पीजीआई के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है। पूरी टीम को बधाई। सर्जन, पीडियाट्रिशियन, एनेस्थेटिस्ट के टीम वर्क से यह सफल हो पाया है। -प्रो. जगतराम डायरेक्टर, पीजीआई