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बेटी का हत्यारा पिता बरी: तीन साल की बच्ची को डायन बता मार डाला था, हाईकोर्ट ने कहा-मानसिक ताैर पर अस्वस्थ था

Wed, 12 Feb 2025 08:12 AM IST
निवेदिता वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Wed, 12 Feb 2025 08:12 AM IST
सार

धन्ना राम ने 2011 में अपनी तीन साल की बेटी के सिर पर तवे से वार किया। पत्नी ने उसे रोकने की कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुई। पंचकूला कोर्ट ने उसे उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अब हाईकोर्ट ने उसे बरी कर दिया है।

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Father who killed his daughter acquitted by Punjab Haryana Highcourt
पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

तीन वर्षीय बेटी की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे पिता को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने बरी कर दिया है। जस्टिस सुरेश्वर ठाकुर और जस्टिस विकास सूरी की खंडपीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि आरोपी अपराध के समय कानूनी रूप से मानसिक अस्वस्थ था।

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अभियोजन पक्ष के अनुसार धन्ना राम की पत्नी ने 2011 में उसे अपनी तीन वर्षीय बेटी का गला घोंटते देखा और रोकने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं रुका। धन्ना राम का दावा था कि उसकी बेटी डायन है और उसके बेटे को नुकसान पहुंचाएगी। उसने बच्ची के सिर पर तवे से वार किया, जिससे उसकी मौत हो गई। घटना के बाद वह मौके से फरार हो गया। इस मामले में पंचकूला की कोर्ट ने 22 मार्च 2013 को उसे उम्र कैद की सजा सुनाई थी। जिसके बाद उसने सजा के खिलाफ हाई कोर्ट में अपील दायर की थी।
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याची के वकील ने अदालत में दलील दी कि वह गंभीर मानसिक बीमारी से पीड़ित था और उसे अपनी हरकतों का अहसास नहीं था। कोर्ट में प्रस्तुत मेडिकल रिपोर्ट्स और गवाहों के बयानों के अनुसार याची को पिछले दो सालों से भ्रम और मतिभ्रम (डिल्यूजन और हेल्यूसिनेशन) हो रहे थे। परिवार ने उसे डाक्टर के पास ले जाने के बजाय एक तांत्रिक के पास झाड़-फूंक के लिए भेजा था। गिरफ्तारी के बाद उसे मानसिक चिकित्सालय में भर्ती कराया गया, जहां डाक्टरों ने पुष्टि की कि वह मनोवैज्ञानिक विकार (साइकोसिस) से पीड़ित था। हाईकोर्ट ने मानसिक बीमारी को अपराध बोध खत्म करने वाला कारक मानते हुए याची को बरी कर दिया और उसे जेल के बजाय मानसिक अस्पताल में भर्ती कराने का आदेश दिया।
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हाईकोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 84 का हवाला दिया, जो मानसिक विकार से ग्रसित व्यक्ति को आपराधिक दायित्व से मुक्त करती है। कोर्ट ने कहा कि किसी अपराध के लिए अपराध करने की मानसिक स्थिति का होना जरूरी है, लेकिन याची की मानसिक स्थिति ऐसी थी कि वह सही और गलत में अंतर नहीं कर पा रहा था।

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