विरासत: पंजाब के सामने समृद्धि संभालने की चुनौती, शहीदों की धरती को खोखला कर रहा नशा
1 नवंबर 1966 को पंजाब हरियाणा व हिमाचल से अलग हुआ तो पहले सीएम बने ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर। पंजाब तीन हिस्सों मे बंट गया, दोआबा माझा व मालवा। माझा का इलाका ब्यास दरिया से शुरू होकर पाक सीमा तक था जबकि दोआबा ब्यास व सतलुज के बीच पड़ता था।
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पंजाब का नाम अपने आप में स्वः प्रभाषित है। 'पंज' से मतलब पांच तथा 'आब' से मतलब पानी है। यह फारसी शब्द है और दरियाओं वाली धरती पंजाब की नदियां झेलम, चिनाब, रावी, ब्यास और सतलुज हैं। पंजाब की खुशहाली की मिसाल पूरे भारत में मिलती थी। हालांकि आजादी के बाद गोपी चंद भार्गव पहले सीएम बने थे, जो 13 अप्रैल, 1949 तक रहे लेकिन पंजाब की असली तस्वीर 1960 में उभरकर सामने आई, जब पंजाब हरित क्रांति का पुरोधा बना। पंजाब ने 1960 के बाद से तेजी से तरक्की की, हरित क्रांति ने राज्य में तेजी से कृषि क्षेत्र का विकास किया और पंजाब तेजी से विकास की तरफ दौड़ रहा था कि 1966 में पंजाबी प्रदेश का आंदोलन शिखर पर पहुंच गया।
1 नवंबर 1966 को पंजाब हरियाणा व हिमाचल से अलग हुआ तो पहले सीएम बने ज्ञानी गुरमुख सिंह मुसाफिर। पंजाब तीन हिस्सों मे बंट गया, दोआबा माझा व मालवा। माझा का इलाका ब्यास दरिया से शुरू होकर पाक सीमा तक था जबकि दोआबा ब्यास व सतलुज के बीच पड़ता था। 8 मार्च 1967 तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे ज्ञानी गुरमुख सिंह पंजाबी भाषा के लेखक भी थे। उनके वोट के कारण ही हिंदी राष्ट्र भाषा बनी थी। पंजाब ने खेतीबाड़ी को अपना धंधा बनाकर रखा। यहां से काफी संख्या में विदेशों में भी जाकर लोग बसने लगे, जिनकी सहायता से सूबे में विकास की लहर शुरू हुई। पंजाब में दोआबा क्षेत्र से भारी संख्या में लोग कनाडा, यूके व अमेरिका जाना शुरू हो गए थे। पंजाब फिर से खड़ा हुआ और विकास की पटरी पर दौड़ने लगा।
कृषि से बढ़ी राज्य की जीडीपी
हालात यह थे कि 90 के दशक की शुरुआत में पंजाब प्रति व्यक्ति आय के मामले में महाराष्ट्र और हरियाणा के बाद तीसरा सबसे अमीर राज्य बन गया था। अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1970 से 1990 के दशक के दौरान कृषि से राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) ऊंची दर से बढ़ा, जिसने पंजाब को बुलंदियों पर पहुंचाया। इस अवधि में पंजाब की कृषि विकास दर करीब 5 फीसदी थी, जो किसी भी दूसरे राज्य की तुलना में ज्यादा थी और पूरे भारत के कृषि विकास (करीब 2 फीसदी) की तुलना में दोगुनी थी।
1960-61 में पंजाब में धान की खेती का क्षेत्र कुल खेती योग्य क्षेत्र का 4.8 फीसदी था और 2018-19 में यह बढ़कर 39.19 फीसदी हो गया और गेहूं के क्षेत्र में हिस्सेदारी 27 फीसदी से बढ़कर 45 फीसदी तक हो गई। लेकिन गेहूं और धान के अलावा दूसरी फसलों की खेती कम होने लगी। 1960-61 में पंजाब में मुख्यत: कुल 21 फसलें उगाई जाती थीं लेकिन 1991 तक इनकी संख्या सिर्फ नौ रह गई। नतीजन, राज्य का कृषि विकास भी घटने लगा। जहां कृषि विकास दर घटने लगी तो पंजाब से भारी संख्या में लोगों ने विदेशों का रुख कर लिया।
खैर, पंजाब का किसान धान व गेहूं तक ही सीमित होकर रह गया। लेकिन इसका विपरीत असर पंजाब की आबो हवा पर हो गया। पंजाब में पानी 400 फीट नीचे चला गया, जो किसी समय 40 फीट पर आसानी से मिल जाता था। पानी में कीटनाशक के अधिक प्रयोग से कैंसर फैल गया। राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं को देखते हुए अबोहर-जोधपुर पैसेंजर ट्रेन को ‘कैंसर ट्रेन’ का नाम दिया गया था। मौजूदा समय में पंजाब में 1 लाख लोगों पर 90 मरीज कैंसर से पीड़ित हैं। पिछले 7 सालों की बात करें तो हर साल औसतन 7500 नए मामले आ रहे हैं।
इंडस्ट्री के पलायन से लगा झटका
आंतकवाद का दंश झेलने के बाद पंजाब की कमर टूट चुकी थी, उसको रियायत क्या मिलनी थी उलटा पड़ोसी राज्यों में इंडस्ट्री को पैकेज दे दिया गया। 2003 में जब सात सालों के लिए पहाड़ी राज्यों को पैकेज दिया गया था तो पंजाब की जालंधर, लुधियाना, बटाला और अमृतसर आदि की इंडस्ट्री जम्मू कश्मीर व हिमाचल में पलायन कर गई थी। पंजाब को 3600 करोड़ रुपए का सालाना राजस्व नुकसान हुआ। आज तक पंजाब दोबारा पटरी पर नहीं आ सका है, बड़े बड़े औद्योगिक घराने पंजाब से पलायन कर चले गए। पंजाब की राजधानी भी अपनी नहीं है, चंडीगढ़ पंजाब को देने की मांग 1966 से चली आ रही है।
एनआरआई दूल्हों ने तोड़े कई महिलाओं के दिल
आर्थिक तौर पर पंजाब की कमर टूटी लेकिन साथ ही सामाजिक तौर पर भी पंजाब पर धब्बा लगा, जो आज तक दिखाई देता है। पंजाब की लड़कियों पर कहर बरपता था, एनआरआईज पंजाब में शादी करने के बाद दुल्हन को छोड़कर विदेशों में चले जाते थे और महिलाएं गांव में खेती बाड़ी व बजुर्गों की देखभाल करती रह जाती थी। आंसू निकलते थे महिलाओं के जब उनको पता चलता था कि उनके पति ने विदेश में भी शादी कर रखी है। आज भी पंजाब में ऐसी महिलाओं की संख्या 40 हजार के करीब है। इन महिलाओं का दुर्भाग्य है कि भारत की यूरोप के कई देशों के साथ प्रत्यार्पण संधि नहीं है, जिसका फायदा एनआरआईज दूल्हों ने जमकर उठाया है। यह पंजाब की दर्दनाक तस्वीर है, जो आज भी गांवों में देखने को मिल रही है। अब एक नई समस्या ने पंजाब में जन्म ले लिया है, वह है कांट्रेक्ट मैरिज।
नशे की मार झेल रहा पंजाब
पंजाब को मार चौतरफा मार पड़ी है। अफीम, भुक्की से शुरू हुआ सिलसिला हेरोइन, स्मैक, कोकीन, सिंथेटिक ड्रग जैसे जानलेवा नशे तक पहुंच चुका है। आंकड़ों के अनुसार पंजाब में 9 लाख लोग ड्रग्स लेते हैं। इसमें 3.5 लाख लोग एडिक्ट हैं। पंजाब का 553 किलोमीटर का इलाका सीमावर्ती है, जो पाकिस्तान से सटा हुआ है। नार्कोटेरिज्जम ने पंजाब को न केवल बदनाम कर दिया बल्कि युवाओं को नशे की दलदल में धकेल दिया। रोजाना समाचार आते हैं कि ड्रोन से हथियार गिराये जा रहे हैं, पाक से आने वाली हेरोइन बरामद हो रही है। यह बात विचलित करने वाले होती है अपना पंजाब क्या था और क्या हो गया है? इसको किसी की बुरी नजर लग गई है। पंजाब में गांवों में चहकती मुटियारें नहीं दिखती, आईलेट्स सेंटरों में भीड़ बढ़ती जा रही है। पंजाब का युवा विदेशों में चला गया तो विरासत कौन संभालेगा ? खेत खलिहान कौन देखेगा ? हरित क्रांति का पुरोधा पंजाब क्या अपनी पहचान जिंदा रख सकेगा ? आने वाला समय इससे भी अधिक खतरनाक है और भविष्य की तस्वीर भी डरा देने वाली दिख रही है।
(डॉ. जसबीर कौर ऋषि, वीसी, डीएवी यूनिवर्सिटी, जालंधर)