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हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, नपा इस्टेट मालिक
सुरजीत सिंह सत्ती/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 24 Oct 2014 09:16 AM IST
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पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के जस्टिस हेमंत गुप्ता के नेतृत्व वाली डिवीजन बेंच ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए इस्टेट अफसर यूटी को एक लाख रुपए जुर्माना लगाया है। मकान को जब्त करने का एक मामला सुप्रीम कोर्ट तक से खारिज हो चुका था, लेकिन इसमें मकान मालिक की कोई गलती नहीं थी।
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उन्हें पता तक नहीं था कि उनके मकान का दुरूपयोग हुआ है। इस्टेट अफसर ने मकान मालिक को सुनवाई का मौका दिए बगैर मकान जब्त करने का आदेश दे दिया था।
इस्टेट अफसर ने चार मई 1995 को सेक्टर-21 मोहिंदर कौर का मकान नंबर-1278 जब्त करने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ अपीलों पर सुनवाई करते हुए मुख्य प्रशासक ने 11 मई 2011 और यूटी प्रशासक के सलाहकार ने सात अक्तूबर 2012 को इस्टेट अफसर के आदेश को बरकरार रखा था।
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इन्हीं आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। मोहिंदर कौर के बेटे एनआरआई गुरिंदर सिंह व उनके बेटे याचिका दायर की थी कि मकान मोहिंदर कौर को अलाट हुआ था। मां ने गुरिंदर सिंह व उनके बेटे के नाम वसीयत की थी। मां की 17 अक्तूबर 1988 को मौत हो गई थी। बाद में 20 फरवरी 1990 को मकान गुरिंदर सिंह व उनके बेटे के नाम ट्रांस्फर हो गया था।
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याचिका में बताया गया कि मां ने मकान सुरेश मेहरोत्रा को 1978 में किराए पर दिया था। वह दिल्ली चला गया था, लेकिन मां की मर्जी के बगैर वह मकान अनिल शर्मा नामक एक व्यक्ति के हवाले कर गया था। शर्मा यहां सीए का कार्यालय चलाने लगा। ग्राउंड फ्लोर 1979 में एम वी सेमुअल को किराए पर दी थी।
उसने यह हिस्सा विनोद चड्डा नामक व्यक्ति को सबलेट कर दिया। चड्डा यहां प्रिंटिंग प्रेस चलाने लगा। इस्टेट अफसर ने रिहायशी क्षेत्र को व्यवसायिक गतिविधियों के कारण मकान जब्ती का आदेश जारी कर दिया। गुरिंदर सिंह व उनके बेटे का कहना है कि वह कनाडा में रहते थे।
मकान उनके नाम चल रहा था, लेकिन इस्टेट अफसर ने उन्हें कोई नोटिस जारी नहीं किया। किराएदार उनकी मर्जी के बगैर रिहायश का दुरूपयोग कर रहे थे। किराएदारों ने ही इस्टेट अफसर के आदेश को प्रशासक के सलाहकार तक चुनौती दी थी। किराएदार सुप्रीम कोर्ट तक से यह केस हार चुके थे।
याचिका में गुरिंदर सिंह ने कहा कि मकान खाली कराने को उनके और किराएदारों के बीच अदालती केस चला और वह केस जीत गए। मकान खाली होने पर उन्हें 2010 में आकर पता चला कि मकान इस्टेट अफसर ने जब्त कर दिया था।
याचिका में कहा गया है कि इस्टेट अफसर ने 1995 में उन्हें एक्सपार्टे करार देते हुए मकान जब्त किया था। चूंकि वह मकान जब्त होने से अनभिज्ञ थे, लिहाजा यह आदेश रद्द किया जाए। दूसरी ओर प्रशासन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस्टेट अफसर का फैसला नहीं बदला, लिहाजा अपील रद्द की जानी चाहिए।
जस्टिस हेमंत गुप्ता एवं जस्टिस जयश्री ठाकुर की डिवीजन बेंच ने गुरिंदर सिंह की अपील मंजूर करते हुए ऐतिहासिक फैसला दिया है।
फैसले में कहा है कि इस्टेट अफसर को मकान जब्त करने का फैसला देने से पहले यह परखना चाहिए था कि क्या मकान मालिक ने इमारत का दुरुपयोग जानबूझ कर किया या फिर यह उसके नियंत्रण से ही बाहर था। किराएदारों ने शर्तों का उल्लंघन कर रिहायशी क्षेत्र का दुरूपयोग किया।
जैसे ही इसका पता गुरिंदर सिंह को लगा, उन्होंने मकान खाली कराने को तुरंत पैरवी की। वैसे भी कि किराएदार की गलती के लिए मकान मालिक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। वह भी उस वक्त जब वह विदेश में रहते थे और उन्हें नोटिस तक भी नहीं मिल पाया। उन्हें पैरवी का मौका तक नहीं मिला।
हाईकोर्ट ने कहा है कि इस्टेट अफसर को इमारत खाली कराने की स्थिति पर नजर रखनी चाहिए थी। इस्टेट अफसर ने मकान जब्त करने का आदेश देकर शक्तियों का दुरूपयोग किया है। किसी अधिकारी के ऐसे व्यवहार पर गंभीरता से विचार किया जाना बनता है। बेंच ने मकान जब्ती के प्रशासन के सभी आदेश रद्द करते हुए इस्टेट अफसर पर एक लाख रुपए जुर्माना लगाया है।