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दिल्ली विधानसभा चुनाव में मिली हार ने खोली भाजपा संगठन की पोल, 'मिशन 2022' पर छाया संकट
Thu, 13 Feb 2020 11:54 AM IST
खुशबू गोयल
अशोक नीर, अमृतसर
अशोक नीर, अमृतसर
Published by: खुशबू गोयल
Updated Thu, 13 Feb 2020 11:54 AM IST
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दिल्ली चुनाव को जीतने के लिए कई मुख्यमंत्रियों, सांसदों व पंजाब हरियाणा के हजारों कार्यकर्ताओं की फौज चुनाव मैदान में झोंकने के बाद भी मिली हार ने भाजपा संगठन कमजोरियों की पोल खोल दी है।
पार्टी ने दिल्ली के चुनाव में उन नेताओं को संगठन की जिम्मेदारी सौंपी थी, जो अपने घर में संगठन को मजबूत नहीं कर पाए। दिल्ली चुनाव के इंचार्ज व सह-प्रभारी तरुण चुघ 2012 के पंजाब विधानसभा चुनाव के बाद अपने घर का बूथ तक जीत नहीं पाए, ऐसे संगठन स्पेशलिस्ट दिल्ली जैसे राज्य में पार्टी के बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने का पाथ पढ़ाने में नाकाम रहे।
तरुण चुग पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को जमीन हकीकत की जानकारी देने में असमर्थ रहे, वही पंजाब से चुनाव प्रचार करने गए भाजपा नेताओं के साथ तालमेल भी नहीं बना पाए। प्रदेश विशेष कर अमृतसर व जालंधर में जितने भी भाजपाई दिल्ली में चुनाव प्रचार के लिए गए उन सभी का एक मात्र उद्देश्य दिल्ली में अपना एक राजनीतिक आका ढूंढना था, ताकि भविष्य में वह आका उनकी राजनीति की गाड़ी को आगे बढ़ा सके।
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बेशक पार्टी ने तरुण चुग को पूरे दिल्ली के संगठन व चुनाव इंचार्ज की ड्यूटी दे रखी थी, लेकिन वह भी अपने दोस्त आरपी सिंह के चुनाव प्रचार में अधिक समय जुटे रहे। यही नहीं पूर्व मंत्री अनिल जोशी, पूर्व विधायक भंडारी ने चुनाव प्रचार के दौरान आरपी सिंह के विधानसभा में अधिक समय बताया। इसके बावजूद भी पंजाब से चुनाव प्रचार में गए नेता आरपी सिंह की नैया पार नहीं लगा सके।
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पार्टी ने दिल्ली के चुनाव में उन नेताओं को संगठन की जिम्मेदारी सौंपी थी, जो अपने घर में संगठन को मजबूत नहीं कर पाए। दिल्ली चुनाव के इंचार्ज व सह-प्रभारी तरुण चुघ 2012 के पंजाब विधानसभा चुनाव के बाद अपने घर का बूथ तक जीत नहीं पाए, ऐसे संगठन स्पेशलिस्ट दिल्ली जैसे राज्य में पार्टी के बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को एकजुट रखने का पाथ पढ़ाने में नाकाम रहे।
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तरुण चुग पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को जमीन हकीकत की जानकारी देने में असमर्थ रहे, वही पंजाब से चुनाव प्रचार करने गए भाजपा नेताओं के साथ तालमेल भी नहीं बना पाए। प्रदेश विशेष कर अमृतसर व जालंधर में जितने भी भाजपाई दिल्ली में चुनाव प्रचार के लिए गए उन सभी का एक मात्र उद्देश्य दिल्ली में अपना एक राजनीतिक आका ढूंढना था, ताकि भविष्य में वह आका उनकी राजनीति की गाड़ी को आगे बढ़ा सके।
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बेशक पार्टी ने तरुण चुग को पूरे दिल्ली के संगठन व चुनाव इंचार्ज की ड्यूटी दे रखी थी, लेकिन वह भी अपने दोस्त आरपी सिंह के चुनाव प्रचार में अधिक समय जुटे रहे। यही नहीं पूर्व मंत्री अनिल जोशी, पूर्व विधायक भंडारी ने चुनाव प्रचार के दौरान आरपी सिंह के विधानसभा में अधिक समय बताया। इसके बावजूद भी पंजाब से चुनाव प्रचार में गए नेता आरपी सिंह की नैया पार नहीं लगा सके।
अपने-अपने गुटों तक सीमित नहीं रहे नेता
प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष व सांसद श्वेत मालिक भी दिल्ली चुनाव में एक-दो नुक्कड़ बैठकों तक ही सीमित रहे। मलिक भी पंजाबी मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में करने में नाकाम रहे। चुनाव प्रचार के लिए गए अमृतसर व जालंधर के नेता भी अपने-अपने गुटों तक सीमित नहीं रहे। दिल्ली में भाजपा की हुई करारी हार के बाद प्रदेश भाजपाइयों में भी निराशा है।
2022 के विधानसभा चुनाव में दिल्ली के राजनीतिक आकाओं के बलबूते टिकट पाने के जुगाड़ में जुटे इन नेताओं को डर सताने लगा है कि दिल्ली चुनाव में हार का असर उनके टिकट पर पड़ सकता है। दिल्ली में भाजपा की हार के प्रदेश के राजनीतिक समीकरण भी बदलेंगे। इन समीकरणों में वर्तमान भाजपा लीडरशिप पार्टी को पंजाब में सत्ता तक पहुंचा पाएगी, इस बात का आभास पार्टी को नहीं हो रहा है।
भाजपा नेता अरुण जेटली के पूर्व निजी सचिव रहे विश्वास नगर से विधायक निर्वाचित हुए ओम प्रकाश शर्मा के चुनाव प्रचार में अमृतसर व जालंधर से गए कार्यकर्ता नहीं पहुंचे। 2014 में जब अरुण जेटली ने अमृतसर संसदीय हलके से चुनाव लड़ा था तब ओम प्रकाश शर्मा की राजनीतिक हैसियत देखते हुए स्थानीय भाजपा नेता उनके आसपास मंडराते दिखते हैं।
2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपाइयों ने शर्मा का चुनाव प्रचार किया था। दिल्ली चुनाव में ओम प्रकाश उन चुने हुए भाजपा के आठ विधायकों में हैं, जिन्होंने चुनाव जीता है।
2022 के विधानसभा चुनाव में दिल्ली के राजनीतिक आकाओं के बलबूते टिकट पाने के जुगाड़ में जुटे इन नेताओं को डर सताने लगा है कि दिल्ली चुनाव में हार का असर उनके टिकट पर पड़ सकता है। दिल्ली में भाजपा की हार के प्रदेश के राजनीतिक समीकरण भी बदलेंगे। इन समीकरणों में वर्तमान भाजपा लीडरशिप पार्टी को पंजाब में सत्ता तक पहुंचा पाएगी, इस बात का आभास पार्टी को नहीं हो रहा है।
भाजपा नेता अरुण जेटली के पूर्व निजी सचिव रहे विश्वास नगर से विधायक निर्वाचित हुए ओम प्रकाश शर्मा के चुनाव प्रचार में अमृतसर व जालंधर से गए कार्यकर्ता नहीं पहुंचे। 2014 में जब अरुण जेटली ने अमृतसर संसदीय हलके से चुनाव लड़ा था तब ओम प्रकाश शर्मा की राजनीतिक हैसियत देखते हुए स्थानीय भाजपा नेता उनके आसपास मंडराते दिखते हैं।
2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपाइयों ने शर्मा का चुनाव प्रचार किया था। दिल्ली चुनाव में ओम प्रकाश उन चुने हुए भाजपा के आठ विधायकों में हैं, जिन्होंने चुनाव जीता है।