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बड़ा मुद्दा: पंजाब में लगातार गिर रहा भूजल, सरकारें नहीं दे सकीं धान का विकल्प, फसली चक्र तोड़ना ही समाधान

Mon, 06 May 2024 12:58 PM IST
निवेदिता वर्मा सुशील कुमार, संवाद, सुनाम ऊधम सिंह वाला (पंजाब)
सुशील कुमार, संवाद, सुनाम ऊधम सिंह वाला (पंजाब) Published by: निवेदिता वर्मा Updated Mon, 06 May 2024 12:58 PM IST
सार

पंजाब में खेती के कुल क्षेत्रफल के करीब 85 प्रतिशत हिस्से पर धान की खेती होती है। खेती विभाग के आंकड़ों की मानें तो साल 2022-23 में खरीफ के समय पंजाब में कुल 3.59 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्रफल पर फसलों की बुवाई की गई। इसमें से धान की बुवाई 3.13 मिलियन हेक्टेयर में हुई। 

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Declining ground water level in Punjab big issue in loksabha election 2024
पंजाब में गिरता भूजल - फोटो : संवाद

विस्तार

पंजाब में भूजल का गिरता स्तर नाजुक स्तर तक पहुंच गया है। इसकी अहम वजह धान की लगातार हो रही खेती है। पंजाब के किसान अच्छी आमदनी होने के चलते धान की खेती कर रहे हैं और सरकारें इसके बराबर की आय वाली फसल का विकल्प देने में नाकाम रही हैं। गिरता भूजल तभी बचेगा, जब फसली चक्र टूटेगा। किसान मांग कर रहे हैं कि सियासी दल इसका ठोस हल करें और इस मुद्दे पर चर्चा हो। 
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पंजाब में खेती सेक्टर के लिए बिजली फ्री है और केंद्र सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर धान की खरीद कर लेती है। किसान की फसल उचित दाम पर हाथों हाथ बिक जाती है। इससे किसानों को अच्छी खासी आमदनी हो जाती है। किसान भी गिरते भूजल को लेकर चिंतित है, लेकिन उसके पास अन्य कोई विकल्प नहीं है। 
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मौजूदा दौर में पंजाब की खेती धान और गेहूं के फसली चक्र में फंसी हुई है। बीते दो दशकों से सरकारी, गैर सरकारी रिपोर्टों में तर्क दिए गए हैं कि पंजाब में फसली विविधता लाने की सख्त जरूरत है। फसली चक्र को तोड़ कर नई फसलों की बिजाई होनी चाहिए, लेकिन जमीनी स्तर पर इसे लागू करने में अभी तक किसी ने भी गंभीरता नहीं दिखाई है। पंजाब में ‘आम आदमी पार्टी’ की सरकार ने भी खेती विविधता पर जोर देने का दावा किया था। 
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पंजाब का 80 प्रतिशत इलाका रेड जोन में
भूजल के अत्यधिक दोहन की वजह से पंजाब का 80 प्रतिशत इलाका रेड जोन में आ गया है। देश में पंजाब ऐसा सूबा है जहां भूजल दोहन सबसे ज्यादा होता है। केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की एक ग्राउंड वाटर एस्टिमेशन रिपोर्ट के आंकड़ों की मानें तो पंजाब में जितना भूजल निकाला जाता है, उसका 97 प्रतिशत हिस्सा सिंचाई में खर्च होता है। इसमें भी सबसे बड़ा हिस्सा धान की सिंचाई का है। अगर मौजूदा रफ्तार से ही पंजाब में भूजल निकाला जाता रहा तो उसके पास सिर्फ 17 सालों के लिए यानी 2039 तक के लिए ही पानी है।

जौहल ने 37 साल पहले किया था आगाह
लगभग 37 साल पहले साल 1986 में कृषि अर्थशास्त्री एसएस जौहल की अगुवाई में फसलों की विविधता पर तैयार की गई सरकारी रिपोर्ट में सलाह दी गई थी कि पंजाब में जितने क्षेत्रफल पर धान और गेहूं की खेती की जा रही है, उसमें से कम से कम 20 प्रतिशत क्षेत्रफल पर किसी और फसल की खेती शुरू की जाए। इस तरह के बदलाव करने से तेजी से घटते भूजल स्तर को रोका जा सकेगा। धान की खेती ऐसी है जिसे पानी की बहुत ज्यादा जरूरत होती है। एक किलो धान पैदा करने के लिए 5,000 लीटर पानी खर्च होता है। भारत में खाद्य सुरक्षा का लक्ष्य हासिल करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से हरित क्रांति शुरू किए जाने से पहले पंजाब में गेहूं और धान के अलावा कई अलग-अलग फसलों की खेती की जाती थी और यहां फसली विविधता थी।

पूसा 44 किस्म पर है पाबंदी
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के 2019 से 2023 की धान क्षेत्र के आंकड़ों के विश्लेषण के मुताबिक, पंजाब में करीब 40 फीसदी से अधिक बुआई गैर-सिफारिशी धान की है। इसमें पूसा 44 का प्रभुत्व सबसे ज्यादा है। आंकड़ों के मुताबिक 2023-24 में 58.18 फीसदी धान सिफारिश श्रेणी का था और 41.82 फीसदी धान गैर सिफारिशी श्रेणी का था। सरकार ने इस बार पूसा 44 किस्म पर पाबंदी लगा दी है, क्योंकि यह क़िस्म सबसे ज्यादा पानी की खपत करती है। 

सरकारें, अपनी नीति व नीयत बदलें: उगराहां
भारतीय किसान यूनियन एकता उगराहां के प्रदेश अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां ने कहा कि अन्य फसलों पर सुनिश्चित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) ही किसानों को गेहूं-धान के चक्र से बाहर निकाल सकता है। इसे व्यावहारिक रूप से लागू किया जाना चाहिए। यदि विविधता लाने के लिए अन्य फसलों को उगाने की कोशिश होती है तो उपज की खरीद मंडियों में नहीं की जाती है और किसान इसे एमएसपी से कम दरों पर निजी विक्रेताओं को बेचने के लिए मजबूर होते हैं। किसान पहले ही एमएसपी की गारंटी मांग रहे हैं। किसान, क्यों चाहेगा कि भूजल पर संकट गहराए। सरकारें, अपनी नीति व नीयत बदलें। सियासी दल इस मुद्दे पर चुप क्यों हैं, चर्चा से हल हो। 

किसानों से अन्याय कर रही केंद्र सरकार: खैरा
कांग्रेस के विधायक व संगरूर से प्रत्याशी सुखपाल सिंह खैरा ने कहा कि केंद्र सरकार किसानों से अन्याय कर रही है । पंजाब का किसान पूरे देश में अनाज की पूर्ति करता है । पंजाब के पानी को बचाने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से सरकारों की है । पंजाब सरकार भी इस गंभीर समस्या पर आँखें मूँद कर बैठी है । कम से कम पानी की खपत वाली फसलों का एमएसपी तय हो और सरकारी तौर पर खरीदने की उचित व्यवस्था करके फ़सली चक्र को तोड़ने का विकल्प दिया जाए। किसान को धान व गेहूं के बराबर की आय वाला विकल्प देने में सरकारें आगे आएं। 


अन्य फसलों पर एमएसपी दे सरकार: अरोड़ा
कैबिनेट मंत्री अमन अरोड़ा ने कहा कि पंजाब सरकार तो किसानों को पूरी तरह से समर्पित है। केंद्र सरकार, किसानों को कम से कम कपास, मक्का, गन्ना, तिलहन, बासमती और दालों जैसी अन्य फसलों पर सुनिश्चित एमएसपी दे और इनकी खरीद सुनिश्चित करे। तभी पंजाब की कृषि का परिदृश्य बदल सकता है। इससे न केवल भूजल की बचत होगी बल्कि पराली जलाने में भी कमी आएगी। विविधीकरण पंजाब की कृषि समस्याओं का प्राथमिक समाधान है। किसानों को बुनियादी आय दिए बिना विविधीकरण अपनाने के लिए राजी करना संभव नहीं है।
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