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Chandigarh: बच्चों पर छा रहा सुपर हीरो का क्रेज, व्यवहार से दिमाग तक कर रहा काबू, PGI में बढ़े केस

Sat, 21 Jan 2023 05:32 PM IST
निवेदिता वर्मा वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़
वीणा तिवारी, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sat, 21 Jan 2023 05:32 PM IST
सार

विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड के कारण एक लंबे समय तक कार्टून और सूपर हीरो वाले कैरेक्टर के साथ जुड़े होने के कारण व्यवहार में यह बदलाव सामने आ रहा है। इसे दूर करने में माता-पिता को ज्यादा सक्रिय रहना होगा। अन्यथा उनका बच्चा खुद से दूर होकर कल्पनाओं की दुनिया में खो जाएगा।

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Chandigarh: Super hero craze engulfing children, cases increased in PGI
Superheros - फोटो : Amar Ujala, Mumbai

विस्तार

बच्चों पर सुपर हीरो और कार्टून कैरेक्टर का क्रेज हावी होता जा रहा है। कोई भीम बनना चाहता है तो कोई स्पाइडर मैन। इसकी चाहत में वह किसी हद तक गुजरने को तैयार है। इससे अभिभावकों की चिंता बढ़ गई है। उन्हें इस बात की चिंता सता रही है कि कहीं सुपर हीरो बनने के चक्कर में उनका बच्चा खुद को नुकसान न पहुंचा जाए। इस चिंता के साथ वे अपने बच्चों को लेकर पीजीआई के मनोचिकित्सा विभाग और निजी अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। 
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विशेषज्ञों का कहना है कि कोविड के कारण एक लंबे समय तक कार्टून और सूपर हीरो वाले कैरेक्टर के साथ जुड़े होने के कारण व्यवहार में यह बदलाव सामने आ रहा है। इसे दूर करने में माता-पिता को ज्यादा सक्रिय रहना होगा। अन्यथा उनका बच्चा खुद से दूर होकर कल्पनाओं की दुनिया में खो जाएगा।
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केस- 1
6 साल का कमल हर पांच मिनट पर अपनी हथेली आगे करता है। पूछने पर कहता है कि वह स्पाइडरमैन का दोस्त है। वे अपने हाथ से जाल निकालकर कैद कर देगा। उसके माता-पिता उसकी इस हरकत से बेहद परेशान हैं। उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि कहीं वे स्पाइडरमैन की तरह छलांग लगाकर खुद को चोटिल न कर लें। वे कमल को बार-बार ऐसा करने से रोकते हैं। लेकिन वह नहीं सुनता। उसकी इस समस्या को दूर करने के लिए उनके माता-पिता उसे लेकर पीजीआई मनोचिकित्सा विभाग की ओपीडी में पहुंचे। जहां काउंसलिंग के बाद पता चला कि उस पर कार्टून कैरेक्टर और सुपर हीरो हावी है।
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केस- 2
7 साल के रोहित का वजन 40 किलो है। डॉक्टर ने उसे मीठा खाने से मना किया है। व्यायाम करने और दोस्तों के साथ दौड़ने-भागने वाला खेल खेलने को कहा है। लेकिन वह ऐसा नहीं करता। उसे तो छोटा भीम देखना पसंद है। वह भीम की तरह बनना चाहता है। इसलिए वह लड्डू भी बहुत खाता है। अब उसके अभिभावक उसकी इस लत और छोटा भीम बनने की चाहत से चिंतित हैं। वे भी पीजीआई के मनोचिकित्सक से उसकी काउंसिलिंग करवा रहे हैं।

कोविड ने कल्पनाओं की दुनिया गढ़ दी
पीजीआई मनोरोग विभाग की पूर्व प्रोफेसर आदर्श कोहली ने बताया कि अब बच्चों की मनोदशा तेजी से बदल रही है। झगड़े बढ़ रहे हैं। दूरी बढ़ रही है। बातचीत कम होने लगी है। बच्चे अभिभावकों से बातें छिपाने लगे हैं। इससे उनके अंदर मनोविकार उत्पन्न हो रहा है। जिस पर काबू पाना बेहद जरूरी है। खासतौर पर कोविड के दौरान अभिभावकों के मन में महामारी को लेकर डर, व्यस्त और घबराहट थी। जिसके कारण घर में होने के बावजूद वे बच्चों की तरफ ठीक से ध्यान नहीं दे सके। उस दौरान बच्चे खुद में मगन रहे। खाना-खेलना और पढ़ना तक टीवी के सामने ही होता रहा। आपस में सम्पर्क नहीं था। बाहर के बच्चों से भी मिलना बंद था। कल्पनाओं में ही खेलना पड़ा। वे कल्पना को ही अपनाते गए। वे ही उन्हें वास्तविकता लगने लगी। अपने कार्टून कैरेक्टर और सुपर हीरो के साथ जीने लगे और वे उनके जीवन का हिस्सा बन गया है। ऐसे में बच्चों के व्यवहार में बदलाव होना लाजमी है। गुस्सा को वे शक्ति के रूप में प्रयोग करने लगे हैं। उन बच्चों को वापस उनके व्यक्तित्व में लाने के लिए अभिभावकों को उन कार्टून कैरेक्टर की जगह खुद को स्थापित करना होगा।

ये पड़ रहा दुष्प्रभाव
पीजीआई मनोचिकित्सा विभाग के डॉ. राहुल चक्रवर्ती का कहना है कि स्क्रीन या मोबाइल पर ज्यादा समय तक कार्टून या अन्य प्रोग्राम देखने से बच्चों का पढ़ाई में मन नहीं लग रहा। एकाग्रता भंग हो रही है। व्यवहार के साथ बोलचाल में बदलाव आ रहा है। एक ही चीज को बार-बार कर रहे हैं। चिंता, उदासी और घबराहट की प्रवृत्ति बढ़ रही है। 


डॉ. राहुल ने बताया कि ऐसी स्थिति में छोटी-छोटी वजह से बच्चे को डांटे-फटकारें नहीं। ऐसा होने पर बच्चे भावनात्मक रूप से कमजोर होने लगते हैं। उसे ऐसा लगता है कि जानबूझकर उसे डांटा जा रहा है। वह अपने सुपर हीरो की तरह नहीं बन पा रहा। इसके बाद वे घर, स्कूल में ज्यादा मारपीट करने लगते हैं। सामान को तोड़ देते हैं तो कुछ एकांत में रहने लगते हैं। हमेशा गुस्से में रहते हैं, अपशब्द का भी प्रयोग करने लगते हैं। यानी बच्चे ज्यादा शरारत करते हैं। किसी की बात को नहीं सुनते हैं। अकेले में रहना पसंद कर रहे हैं। अपना पसंदीदा प्रोग्राम न देख पाने पर वे खाना-पीना तक छोड़ने लगते हैं।

ये लक्षण हैं खतरनाक
- छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा होना, चिल्लाना, चीखना
- किसी कार्टून, सीरियल या फिल्म के कैरेक्टर की भाषा बोलना या उसकी तरह व्यवहार करना।
- ज्यादा चिड़चिड़ापन
- नियमित गतिविधि में बदलाव
- कार्टून देखते हुए खाना खाने की जिद करना
- कार्टून कैरेक्टर की पसंद वाले आहार का ज्यादा सेवन करना
- पढ़ने और आउट डोर गेम में मन न लगना।
- किसी से भी मिलना जुलना बंद कर दे और कल्पना की दुनिया में जीने लगे।

यूं करें समस्या का समाधान
- जन्म से दो वर्षों तक बच्चों को मोबाइल फोन या स्क्रीन के संपर्क में न आने दें।
- तीन से पांच वर्ष तक स्क्रीन टाइम आधा घंटा हो।
- छह से 12 वर्ष तक के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम एक से दो घंटा हो।
- 12 से अधिक आयु वर्ग में स्कूल जाने तक की अवस्था तक बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम तीन से चार घंटे तक हो।
- बच्चों को बाहर के खेलकूद के लिए प्रेरित करें।
- उन्हें हम उम्र बच्चों से घुलने मिलने दें।
- बच्चों के लिए समय निकालें। उन्हें पारिवारिक समय दें।
- उन्हें घर के कामों में शामिल करें। घर के पास बने कॉलोनी के पार्क में रोजाना लेकर जाएं।
- बच्चों को किताबें पढ़ने, स्वीमिंग, पौधा लगाने, आर्ट, पेंटिंग करने के लिए प्रेरित करें।
- बच्चों को संगीत से जोड़ें। संगीत मानसिक अवस्था को बेहतर करने में मदद करता है।
- बच्चों के कार्टून प्रोग्राम का चुनाव करें और उनके देखने का समय निर्धारित करें।
- अगर बच्चा ज्यादा कार्टून देखे तो उन्हें चित्रों वाले कॉमिक्स और किताबें पढ़ने और देखने के लिए भी प्रेरित करें।
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