अस्पताल ने बताया कोरोना पॉजिटिव, निजी लैब ने निगेटिव, अलग-अलग रिपोर्ट से लटकी सर्जरी
- कैंसर के मरीज के साथ परिजन भी तनाव में, कहा- किस रिपोर्ट पर करें यकीन, समझ नहीं आ रहा
- पंचकूला के सिविल अस्पताल की रिपोर्ट पर शक होने पर निजी लैब में कराया था टेस्ट
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कोरोना जांच की रिपोर्ट अलग-अलग लैब में अलग-अलग आने की शिकायत लगातार जारी है। कई मामले सामने के आने के बावजूद इसके समाधान का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा। इससे मरीजों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसी तरह के एक मामले में कोराना की रिपोर्ट पॉजिटिव और निगेटिव आने के चक्कर में कैंसर के एक मरीज की सर्जरी टल गई है। इस मरीज के साथ उसका परिवार भी तनाव में है।
रामपुर सियुड़ी (सूरजपुर) पिंजौर के 49 वर्षीय राजेश की 18 सितंबर को दिल्ली के एक निजी अस्पताल में कैंसर की सर्जरी होनी थी लेकिन उनकी कोरोना जांच रिपोर्ट के चक्कर में यह सर्जरी फिलहाल टाल दी गई है। राजेश को जब अस्पताल में 18 सितंबर की सर्जरी की डेट दी गई तो इससे पहले कोरोना जांच कराने को कहा गया।
डॉक्टर के निर्देशानुसार, राजेश ने पंचकूला के सेक्टर-6 स्थित सिविल हॉस्पिटल में कोरोना की जांच कराई। 16 सितंबर को आई रिपोर्ट में उनमें कोरोना की पुष्टि हुई। रिपोर्ट पर राजेश और उनके परिजनों को शक हुआ। उन्होंने दोबारा चंडीगढ़ के सेक्टर-11 स्थित निजी लैब में जांच का नमूना दिया। इसकी रिपोर्ट 17 सितंबर को निगेटिव आई। अब मरीज और उनके परिजन इस बात को लेकर चिंता में हैं कि उनके मरीज को कोरोना है या नहीं।
बड़ी मुश्किल से मिली थी सर्जरी की डेट
राजेश के बेटे अमन ने बताया कि उनके पिता का पिछले 2 साल से कैंसर का इलाज चल रहा है। कोरोना के कारण पिछले 6 महीने से इलाज प्रभावित है। ऐसी स्थिति में बड़ी मुश्किल से हॉस्पिटल ने सर्जरी की डेट दी थी लेकिन कोरोना की जांच रिपोर्ट के अलग-अलग आने से स्थिति समझ से बाहर है। इस संदर्भ में संबंधित अस्पताल से बात कर अगली डेट लेने की कोशिश की गई लेकिन उनका कहना है कि रिपोर्ट पॉजिटिव आई है इसलिए कोरोना से बचाव के मानक के अनुसार, फिलहाल मरीज की सर्जरी नहीं की जा सकती।
पहले भी आ चुके हैं ऐसे मामले
कोरोना के संदिग्ध मरीजों की अलग-अलग लैब में अलग-अलग जांच रिपोर्ट आने का मामला इससे पहले भी शहर में सामने आ चुका है लेकिन प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की तरफ से इस असमंजस की स्थिति को साफ करने के लिए कोई भी उपाय नहीं किया जा रहा है। अब तक निजी लैब पर उंगली उठाई जा रही थी लेकिन पंचकूला के सिविल अस्पताल की रिपोर्ट पर भी मरीज के परिजनों को आपत्ति है। उनका कहना है कि जब मरीज में कोई लक्षण नहीं है तो उसकी रिपोर्ट पॉजिटिव कैसे आ सकती है।
किस पर यकीन करें लोग
अमन का कहना है कि इस तरह की समस्या के कारण मरीजों के साथ ही उनका पूरा परिवार तनाव में आ रहा है इसलिए ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि जांच रिपोर्ट निगेटिव आने या पॉजिटिव आने पर तय मानकों का पालन कर मरीज दोबारा जांच कराकर भ्रम की स्थिति से बच सकें। अमन का कहना है कि इस संदर्भ में लैब वालों से बात करने पर पता चला कि संक्रमण के दौरान अलग-अलग समय में अलग-अलग जांच रिपोर्ट आने का खतरा रहता है इसीलिए मरीजों को इस तरह की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन गंभीर मरीजों की जांच रिपोर्ट को लेकर एक मानक तय कर दिया जाए तो उन्हें सर्जरी कैंसिल होने जैसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा।
कोरोना की जांच रिपोर्ट का अलग-अलग लैब में अलग-अलग आने के कई कारण हो सकते हैं। आरटीपीसीआर तरीके से की गई जांच में 30 प्रतिशत तक फॉल्स निगेटिव आने का चांस रहता है, यानी कि इसमें रिपोर्ट पॉजिटिव भी नहीं होती और निगेटिव भी पूरी तरह से नहीं होती। ऐसी स्थिति में मरीज की दोबारा जांच करनी पड़ती है। इसमें रिपोर्ट के पॉजिटिव आने का चांस ज्यादा रहता है।
इसके अलावा सैंपल लेने के तरीके भी गड़बड़ रिपोर्ट आने के लिए काफी हद तक जिम्मेदार हैं क्योंकि कई बार ट्रेंड स्टाफ के न होने के कारण गलत तरीके से लिए गए सैंपल की रिपोर्ट भी अलग-अलग लैब में अलग-अलग परिणाम देती है। - डॉ आरएस बेदी, आईएमए के पूर्व अध्यक्ष व वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन के एडवाइजर