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Literati Festival: सुनैनी शर्मा बोलीं- दिल दुखता है... पंजाबी लोकगीतों से भद्दे गाने बना रहा बॉलीवुड

Mon, 19 Dec 2022 12:03 AM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Mon, 19 Dec 2022 12:03 AM IST
सार

सुनैनी शर्मा ने कहा कि लोकगीतों पर किसी का कॉपीराइट नहीं है इसलिए उन पर कई गाने बनाए जा रहे हैं लेकिन किसी का हक नहीं बनता कि ‘लट्ठे दी चादर उत्ते हनीमून कर माइया’ जैसे फिजूल गाने बना दिए जाएं। 

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Chandigarh Literati Festival concludes
फेस्ट में पहुंचे लोग। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लेक क्लब में चल रहे 10वें इंटरनेशनल लिट फेस्टिवल चंडीगढ़ लिटराटी-2022 का समापन रविवार को हो गया। अंतिम दिन आखिरी सत्र में पंजाब की कोयल कही जाने वाली लोकप्रिय गायिका स्व. सुरिंदर कौर की नातिन सुनैनी शर्मा ने कहा कि पंजाबी लोकगीतों के बॉलीवुड में हो रहे भद्दे निर्माण से दिल दुखता है। उन्हें ऐसा करने का कोई हक नहीं। 

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इस सत्र में सुनैनी शर्मा के अलावा मशहूर पंजाबी कवि जतिन सलवान और पंजाबी पहनावे पर रिसर्च करने वाली जसविंदर कौर ने भी अपने विचार रखे। सुनैनी शर्मा ने कहा कि लोकगीतों पर किसी का कॉपीराइट नहीं है इसलिए उन पर कई गाने बनाए जा रहे हैं लेकिन किसी का हक नहीं बनता कि ‘लट्ठे दी चादर उत्ते हनीमून कर माइया’ जैसे फिजूल गाने बना दिए जाएं। 
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दुख की बात यह है कि पंजाबी गायक ऐसे गानों को गा रहे हैं। सुनैनी शर्मा ने कहा कि गायक में इतनी नैतिकता तो होनी चाहिए कि वह क्या गा रहा है। उन्होंने इस मौके पर सुरिंदर कौर के जीवन पर भी प्रकाश डाला। कहा कि उनके जैसा फकीर कोई नहीं देखा। उन्होंने संपत्ति या गहने नहीं बनाए। कोई घर नहीं खरीदा न ही बनाया। पूरी जिंदगी किराये के घर में रहीं। कहा कि नानी को कभी सफेद कपड़े नहीं पहनने दिए क्योंकि उनके गानों में जो रंग थे, उन पर हम कभी फीका रंग नहीं पड़ने देना चाहते थे।
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युवा गर्व से कहते हैं पंजाबी हैं लेकिन बोलते अंग्रेजी हैं: जतिन सलवान
एमए अंग्रेजी से करने के बावजूद पहली किताब पंजाबी में लिखने के सवाल पर मशहूर पंजाबी कवि जतिन सलवान ने कहा कि पंजाबी उनकी मां बोली है। इसी बोली ने सबकुछ दिया है। पंजाबी भाषा से बहुत ज्यादा प्यार है। कहा कि उनकी मां बहुत अच्छी पंजाबी बोलती थीं। कहा कि उन्हें दुख होता है कि आज के युवा पंजाबी भाषा में बात करने से कतराने लगे हैं। युवा कहते हैं कि वह पंजाबी हैं लेकिन इस बात को वह अंग्रेजी में बोलते हैं। जतिन सलवान ने बताया कि उन्हें गर्व होता है कि उनके नाना मशहूर गायक मोहम्मद रफी के पर्शियन भाषा के टीचर थे।

अंग्रेजों की वजह से कई क्राफ्ट खत्म हो गए: जसविंदर कौर
पंजाबी पहनावे पर विस्तृत रिसर्च करने वालीं जसविंदर कौर ने कहा कि ब्रिटिश सरकार जानबूझ कर धीरे-धीरे पंजाबी व भारतीय कपड़ों की जगह मैनचेस्टर कॉटन लेकर आई, इससे लोग कपड़ा बनाना भूल गए। गांधी जी का संघर्ष भी इसको लेकर ही था कि लोग अपने कपड़े खुद बनाएं और पहनें। अंग्रेजों की इसी साजिश की वजह से देश से कई कपड़े खत्म हो गए। क्राफ्ट खत्म हो गया। डायनिंग टेबल पर खाना खाना, नैपकिन, टेबल-कुर्सी और कई तरह की आदतें अंग्रेज लेकर आए। पहले लोग नीचे बैठकर खाना खाते थे।

प्रेम है हिंदी, शौक है उर्दू और अंग्रेजी मजबूरी
साहित्यकार चंद्रशेखर वर्मा ने ने कहा कि मेरा हनीमून शिमला में मना और पहला स्टॉप था चंडीगढ़। यहां आना मुझे अच्छा लगता है। सुमिता मिश्रा के साथ उन्होंने बातचीत की। सुमिता मिश्रा ने जब पूछा कि आप साहित्यकार भगवती चरण वर्मा के परिवार से आते हैं, आप तो विरासत संभाले हुए हैं। इस पर उन्होंने कहा कि विरासत तो रोहन गावस्कर को भी मिली थी लेकिन क्रिकेट में कुछ खास कर नहीं पाए। एक-दो नेताओं को भी विरासत में सत्ता मिली लेकिन वो भी कुछ नहीं कर पाए। नाम नहीं लूंगा किसी का लेकिन जरूरी नहीं कि विरासत में जो मिला, उसे हम निभा सकें। 

चंद्रशेखर वर्मा ने कहा कि पुत्र राजा का जो था उसने रियासत पाई और नेताओं के बेटों ने सियासत पाई, शारदे मां का आशीष था हमारे घर पर, साहित्य की अनमोल विरासत पाई। उन्होंने अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी में लेखन किया है। इस पर उन्होंने कहा कि प्रेम है हिंदी, शौक है उर्दू और अंग्रेजी मजबूरी है, वो जुबान लेता हूं जो जहां जरूरी है... इस पर लोगों ने ठहाके लगाए और तालियां बजाईं। चंद्रशेखर वर्मा ने अपनी किताब से एक कहानी भी सुनाई।

डॉ. सुमिता मिश्रा ने कहा कि एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में काफी व्यस्तता रहती है। हर किताब का अपना सफर होता है। लम्हों की सबनम पांच वर्षों के बाद आई है। लम्हों की शबनम कभी खुशी, गम, जीत और हार ओस की तरह होती है। इसके लिए मुश्किल से समय निकाला। इस दौरान सुमिता मिश्रा ने कविता भी पढ़ी। अपनों की दुनिया भुलानी पड़ती है, गैरों की हुकूमत बजानी होती है, एक मंजिल पाने के लिए कई मंजिलें गंवानी पड़ती हैं....। सुमिता ने कहा कि बचपन से कविता लिख रही हैं। पहली बार अंग्रेजी में लिखा, उसके बाद देर से हिंदी में कविता लिखी।  

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