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कैसे हो विकास? MHA के पास सालों से अटके कई काम
ब्यूरो, अमर उजाला/चंडीगढ़
Updated Wed, 29 Jun 2016 01:00 AM IST
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चंडीगढ़ ओपन हैंड
- फोटो : file photo
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चंडीगढ़ प्रशासन के कई अहम मामले कई वर्षों से मिनिस्ट्री ऑफ होम अफेयर्स (एमएचए) के पास अटके पड़े हैं। इससे प्रशासन की कार्यप्रणाली तो प्रभावित हो ही रही है, साथ में लोगों को भी परेशानी उठानी पड़ रही है। इन मामलों पर सिर्फ चिट्ठी लिख रहे हैं। सबसे अहम मामला मिसयूज और वॉयलेशन की पेनल्टी तय करने का है।
यूटी प्रशासन ने कई वर्षों से मिसयूज और वॉयलेशन की पेनल्टी रेट तय करने का प्रस्ताव एमएचए के पास भेजा हुआ है। लेकिन अब तक एमएचए की ओर से इस पर कोई फैसला नहीं लिया जा सका है। इसका सबसे बड़ा साइड इफेक्ट यह है कि मिसयूज और वॉयलेशन के मामलों की पेंडेंसी हजारों की संख्या में पहुंच गई है।
पेंडेंसी निपटाने के लिए प्रशासन ने अपने स्तर पर रेट तय भी किए थे, लेकिन यह रेट लोगों को रास नहीं आए। कुछ की पेनल्टी तो उस प्रॉपर्टी के मार्केट रेट से भी ज्यादा हो गई, जिसके लिए पेनल्टी लगाई गई है। ऐसे में लोगों ने प्रशासन का पेनल्टी रेट मानने से इंकार कर दिया और मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया। अब यह मामला कोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे में एमएचए इस पर कोई फैसला नहीं ले पाया है।
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दूसरा मामला पंजाब राइट टू सर्विस एक्ट-2011 को अपनाने का है। इस एक्ट को चंडीगढ़ में अपनाने के लिए यूटी प्रशासन ने एमएचए से मंजूरी मांगी हुई है। मंजूरी मांगे जाने को सालभर हो चुका है। नगर निगम अपने स्तर पर सिटीजन चार्टर लागू भी कर चुका है।
स्मार्ट सिटी का प्रस्ताव भेजने से पहले नगर निगम में सिटीजन चार्टर लागू किया गया था। लेकिन प्रशासन के डिपार्टमेंट्स में अब भी सेवा की समय सीमा तय नहीं है। जवाबदेही तय न होने से बाबू फाइल को दबाए बैठे रहते हैं। लोगों के चक्कर पर चक्कर लगते रहते हैं।
पंजाब में 40 से अधिक सेवाएं इस एक्ट के अंतर्गत लाई जा चुकी हैं। चंडीगढ़ के एस्टेट, आरएलए, एसटीए जैसे पब्लिक डीलिंग विभागों में लोगों को अपने काम के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। कई चक्कर लगाने पड़ते हैं। राइट टू सर्विस एक्ट लागू होने के बाद ही लोगों को राहत मिल सकती है। राइट टू सर्विस एक्ट के तहत एक तय समय सीमा में लोगों का काम पूरा करना होता है। ऐसा नहीं होने पर संबंधित अधिकारी या बाबू को इसके लिए जवाबदेह ठहराकर पेनल्टी का प्रावधान है।
कोट्स...
मिसयूज और वॉयलेशन के पेनल्टी रेट प्रशासन ने अपने स्तर पर तय कर लोगों को राहत देने की कोशिश की थी। लेकिन मामला कोर्ट में चला गया। एमएचए से भी अभी तक इसको लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है।
सर्वजीत सिंह, वित्त सचिव, चंडीगढ़।
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यूटी प्रशासन ने कई वर्षों से मिसयूज और वॉयलेशन की पेनल्टी रेट तय करने का प्रस्ताव एमएचए के पास भेजा हुआ है। लेकिन अब तक एमएचए की ओर से इस पर कोई फैसला नहीं लिया जा सका है। इसका सबसे बड़ा साइड इफेक्ट यह है कि मिसयूज और वॉयलेशन के मामलों की पेंडेंसी हजारों की संख्या में पहुंच गई है।
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पेंडेंसी निपटाने के लिए प्रशासन ने अपने स्तर पर रेट तय भी किए थे, लेकिन यह रेट लोगों को रास नहीं आए। कुछ की पेनल्टी तो उस प्रॉपर्टी के मार्केट रेट से भी ज्यादा हो गई, जिसके लिए पेनल्टी लगाई गई है। ऐसे में लोगों ने प्रशासन का पेनल्टी रेट मानने से इंकार कर दिया और मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया। अब यह मामला कोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे में एमएचए इस पर कोई फैसला नहीं ले पाया है।
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दूसरा मामला पंजाब राइट टू सर्विस एक्ट-2011 को अपनाने का है। इस एक्ट को चंडीगढ़ में अपनाने के लिए यूटी प्रशासन ने एमएचए से मंजूरी मांगी हुई है। मंजूरी मांगे जाने को सालभर हो चुका है। नगर निगम अपने स्तर पर सिटीजन चार्टर लागू भी कर चुका है।
स्मार्ट सिटी का प्रस्ताव भेजने से पहले नगर निगम में सिटीजन चार्टर लागू किया गया था। लेकिन प्रशासन के डिपार्टमेंट्स में अब भी सेवा की समय सीमा तय नहीं है। जवाबदेही तय न होने से बाबू फाइल को दबाए बैठे रहते हैं। लोगों के चक्कर पर चक्कर लगते रहते हैं।
पंजाब में 40 से अधिक सेवाएं इस एक्ट के अंतर्गत लाई जा चुकी हैं। चंडीगढ़ के एस्टेट, आरएलए, एसटीए जैसे पब्लिक डीलिंग विभागों में लोगों को अपने काम के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। कई चक्कर लगाने पड़ते हैं। राइट टू सर्विस एक्ट लागू होने के बाद ही लोगों को राहत मिल सकती है। राइट टू सर्विस एक्ट के तहत एक तय समय सीमा में लोगों का काम पूरा करना होता है। ऐसा नहीं होने पर संबंधित अधिकारी या बाबू को इसके लिए जवाबदेह ठहराकर पेनल्टी का प्रावधान है।
कोट्स...
मिसयूज और वॉयलेशन के पेनल्टी रेट प्रशासन ने अपने स्तर पर तय कर लोगों को राहत देने की कोशिश की थी। लेकिन मामला कोर्ट में चला गया। एमएचए से भी अभी तक इसको लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हुई है।
सर्वजीत सिंह, वित्त सचिव, चंडीगढ़।