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कैंसर की दवाओं के रेट में सौदेबाजी

Wed, 23 Jan 2019 10:37 PM IST
ajay kumar आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
आशीष वर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Wed, 23 Jan 2019 10:37 PM IST
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Cancer drug sold in different prices in Chandigarh
सांकेतिक तस्वीर

मोहाली के लखविंदर मल्टीपल मायोलामा नामक कैंसर से पीड़ित हैं। पीजीआई में उनकी कीमोथेरेपी चल रही। उन्हें बोटीजोमिब की दो एमजी की डोज हर हफ्ते लगती है, जिसकी शीशी पर अधिकतम मूल्य (एमआरपी) 12 हजार रुपये प्रिंट है। सेक्टर-11 स्थित केमिस्ट शॉप से उन्हें यही दवा तीन हजार रुपये में मिलती है। 

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लखविंदर को लगता है कि जिस शॉप्स से वह दवा खरीद रहे हैं, उसका संचालक उन्हें अच्छा खासा डिस्काउंट दे रहा है। एक दिन जब वह पीजीआई में डॉक्टर को दिखाने के लिए कतार में खड़े थे तभी उन्हें मल्टी मायोलामा का एक अन्य मरीज मिल गया। मर्ज एक ही होने के कारण दोनों में बातचीत शुरू हो गई। पहले मर्ज और फिर बातचीत दवा के रेट पर पहुंची। दूसरे मरीज ने उन्हें बताया कि जो दवा वह तीन हजार में खरीद रहे हैं, वही दवा पीजीआई के अंदर स्थित अमृत फार्मेसी पर दो हजार से भी कम रेट उपलब्ध है। 
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अगली डोज उन्होंने अमृत फार्मेसी से खरीदी तो उन्हें करीब 1850 में पड़ी। इसके बाद जब भी लखविंदर डॉक्टर को दिखाने पीजीआई जाते तो मरीजों से दवा के रेट पर चर्चा जरूर करते। बाद में उन्हें किसी ने बताया कि यदि वह सेक्टर-24 से यही दवा खरीदेंगे तो उन्हें 1400 रुपये से भी कम रेट में मिलेगी। इसके बाद लखविंदर जब सेक्टर-24 स्थित मेडिकल शॉप पर पहुंचे तो बात सच निकली। 

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Cancer drug sold in different prices in Chandigarh
सांकेतिक तस्वीर

उन्हें इससे भी कम रेट में दवा मिल गई। अब लखविंदर यह समझ नहीं पा रहे कि आखिर जिस दवा का अधिकतम मूल्य 12 हजार रुपये है, वह दवा उन्हें इतने कम दाम में कैसे मिल रही है। लखविंदर तो किसी तरह से कम से कम मूल्य में दवा ले आए, लेकिन कैंसर के ऐसे कई मरीज हैं, जो एमआरपी के चक्कर में रोजाना ठगे जा रहे हैं। सिर्फ मरीज नहीं बल्कि सरकार को भी नुकसान पहुंचाया जा रहा है।

दवाओं की एमआरपी 90 फीसदी से ज्यादा
सिर्फ बोटीजोमिब ही नहीं बल्कि कैंसर की कई और दवाओं का मैक्सिम रिटेल प्राइज (एमआरपी) 90 फीसदी से ज्यादा है। ब्रेस्ट कैंसर के इलाज में उपयोग आने वाली दवा ट्रस्ट्यूज्यूमेब की 440 एमजी की डोज की एमआरपी 60 हजार है, लेकिन जब मरीज यह खरीदते हैं तो उन्हें यह दवा अलग-अलग ब्रांड में 20-30 हजार में मिलती है।

कीमोथेरेपी में इस्तेमाल की जाने वाली फिलग्रेस्टिम की एमआरपी 1200 से 1500 रुपये है, लेकिन बाजार में इसका मूल्य 300 रुपये है। जब इतना अंतर होगा तो घपलेबाजी तो तय है। अब सवाल यह सब कैसे हो रहा है? इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं?

अनियंत्रित हैं कैंसर की दवाओं के मूल्य

Cancer drug sold in different prices in Chandigarh
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : file photo

दरअसल, कैंसर की अधिकतर दवाओं की कीमतें अनियंत्रित हैं। सरकार के आधीन काम करने वाले राष्ट्रीय औषध मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) दवाओं के रेट को कंट्रोल करती है। पिछले कुछ सालों में एनपीपीए ने कई दवाओं के अधिकतम मूल्य तय किए हैं, लेकिन कीमोथेरेपी की दवाओं पर अब भी लूट जारी है। आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन दवाओं के बनाने से लेकर बेचने तक का खर्च काफी कम है, लेकिन एमआरपी को 90 फीसदी से ज्यादा बढ़ाकर बेची जा रही हैं। 

कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने समय-समय पर इस बारे में सरकार को चिट्टी लिखी है कि कैंसर खासकर कीमोथेरेपी में इस्तेमाल होने वाली दवाओं के रेट तय किए जाएं लेकिन सरकार ने इसे अभी गंभीरता से नहीं लिया है। नतीजतन लोगों को कैंसर के इलाज के लिए ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ रही है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिस तरह से स्टेंट व आर्थोपैडिक्स इंप्लांट के रेट तय किए गए, उसी तरह से कैंसर के दवाओं के रेट फिक्स किए जाएं।

यहां मरीजों और सरकार की ज्यादा चपत
पीजीआई में कैंसर का इलाज कराने वाले मरीजों को तो थोड़ी बहुत सस्ती दवा मिल जाती है, लेकिन जो प्राइवेट में इलाज करवाते हैं, उन्हें ज्यादा चपत लगती है। इसे एक उदाहरण से समझिए। प्राइवेट हास्पिटल कंपनियों से कैंसर की दवाओं की कोटेशन मंगवाती हैं। कंपनियां आती हैं और उन्हें अपने रेट बताती हैं, जो भी कम रेट देता है, हास्पिटल उस कंपनी की दवा मंगवा लेती है।

Cancer drug sold in different prices in Chandigarh
सांकेतिक तस्वीर

अब जब मरीज उनके पास इलाज के लिए जाता है तो वह मरीज से एमआरपी रेट पर ही बेचते हैं न कि उस रेट पर जिस पर कोटेशन मंगवाई गई थी। कंपनी को तो दवा बेचनी होती है इसलिए वह कम से कम रेट पर हास्पिटल को देता है और उसे एमआरपी पर बेचा जाता है। 

कई सरकारी कर्मचारी और सेना से जुड़े लोग प्राइवेट हॉस्पिटल में ही कैंसर का इलाज करवाते हैं। उनके बिलों की अदायगी सरकार करती है, ऐसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार को हर साल कितने करोड़ों की चपत लगती है। यदि दवाओं के अधिकतम मूल्य तय हो जाए तो न मरीज को दिक्कत आएगी और न ही सरकार को।

कैंसर की दवाओं की एमआरपी और उनके बाजार रेट
दवा                                 एमआरपी                  बाजार में
पैक्लीटैक्सेल   (260 एमजी)      9 हजार                दो से ढाई हजार 
डोकिटैक्सेल   (120 एमजी)      12 हजार              ढाई से तीन हजार
जेमीसेटाबाइन  (एक ग्राम)         छह हजार            छह सौ से ढाई हजार
बोटीजोमिब    (दो एमजी)         12 हजार             1500 से तीन हजार 
ट्रस्ट्यूज्यूमेब   (440 एमजी)       60 हजार            20-28 हजार 
बीवेकिजूमेब   (400एमजी)        40 हजार            20-25 हजार
पेगफिलग्रास्टिम     --             12-17 हजार          दो से तीन हजार
फिलग्रास्टिम       --              12 से 1500           तीन सौ रुपये
कैप्सिटाबाइन      --               1250 रुपए             तीन सौ से पांच सौ रुपये
जोलेड्रोनिक एसिड                2000-2800            छह सौ रुपये

कैंसर इस समय काफी तेजी से बढ़ रहा है। परिवार में किसी एक को कैंसर हो जाए तो उसके इलाज में इतना पैसा खर्च होता कि परिवार गरीब हो जाता है। मैं इस संबंध में रसायन एवं उवर्रक मंत्रालय मंत्री सदानंद गौड़ा और प्रधानमंत्री को लेटर लिखकर गुहार लगाऊंगा कि कैंसर की दवाओं के अधिकतम मूल्य तय किए जाएं। -प्रिंस भंढुला, प्रधान, मेडिकल सेल बीजेपी

पहले कार्डियक और आर्थोपैडिक्स पर खेल हुआ, अब सारा नेक्सेस कैंसर की दवाओं पर काम कर रहा है। एमआरपी ज्यादा होने से मरीजों से धोखाधड़ी हो रही है साथ ही सरकार को हर साल करोड़ों रुपये की चपत लग रही है। इसमें सरकार को एमआरपी फिक्स करनी चाहिए। साथ में एक आनलाइन पोर्टल भी बनाना चाहिए, जिसमें दवाओं के रेट की जानकारी हो, ताकि मरीज को कोई गुमराह न कर पाए। -डा. संजीव भाटिया, डायरेक्टर ग्लोबल हेल्थ केयर क्लीनिक चंडीगढ़

कैंसर की दवाओं की एमआरपी तय होनी चाहिए। इसकी जेनरिक दवाओं की एमआरपी भी काफी ज्यादा है। इस वजह से मरीजों को काफी दिक्कतें आती हैं। इसकी एक सीमा तो तय करनी होगी। कैंसर का इलाज सस्ता भी है और महंगा, लेकिन यह मरीज के मर्ज पर निर्भर करता है। -डा. जतिन सरीन, चंडीगढ़ कैंसर एंड डाइग्नोस्टिक सेंटर 

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