Chandigarh: जीवनशैली बदलिए, नहीं आएगी बांझपन की नौबत... लाइफ स्टाइल मोडिफिकेशन पर PGI में हो रहा शोध
वर्तमान समय में महिलाओं के साथ पुरुषों में भी बांझपन तेजी से बढ़ रहा है। पीजीआई के तीन वर्षों के आंकड़ों से इसकी पुष्टि हो रही है इसलिए इस समस्या को लेकर गंभीर होने की जरूरत है।
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खान-पान और रहन-सहन में बदलाव कर बांझपन जैसी स्थिति से खुद को बचाया जा सकता है। यह महिला और पुरुष दोनों पर समान रूप से लागू हो रहा है। इस बढ़ते मर्ज पर काबू पाने के लिए पीजीआई के विशेषज्ञ दवाओं के साथ जीवन शैली में बदलाव कर दंपतियों को संतान सुख दिला रहे हैं।
बांझपन की बढ़ती शिकायत को देखते हुए पीजीआई का स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग फिजियोथैरेपी और आहार विज्ञान के साथ मिलकर काम कर रहा है। इसमें संतान सुख से वंचित दंपतियों पर लाइफ स्टाइल मोडिफिकेशन थैरेपी का उपयोग कर सकारात्मक परिणाम प्राप्त किए जा रहे हैं।
पीजीआई के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की प्रो. शालिनी ने बताया कि लाइफ स्टाइल मोडिफिकेशन पर शोध चल रहा है। इसके शुरुआती परिणाम काफी अच्छे हैं। इसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि युवा वर्ग इसका पालन कर बांझपन जैसी समस्या से बच सकता है। प्रो. शालिनी का कहना है कि महिलाओं के साथ पुरुषों में भी बांझपन तेजी से बढ़ रहा है। अगर पीजीआई की बात करें तो पिछले तीन वर्षों के आंकड़ों से इसकी पुष्टि हो रही है इसलिए इस समस्या को लेकर गंभीर होने की जरूरत है। वहीं, अच्छी बात यह है कि जरा सा बदलाव कर बचा जा सकता है।
पीजीआई जगा रहा उम्मीद की किरण
प्रो. शालिनी ने बताया कि संस्थान में लगभग 18 साल से इनफर्टिलिटी क्लीनिक का संचालन हो रहा है। इसमें सोमवार से शनिवार प्रतिदिन न्यू ओपीडी के रूम नंबर 2046 में इन मरीजों को परामर्श दिया जा रहा है। ओपीडी में प्रतिदिन 90 से 100 मरीज आ रहे हैं। इसमें महिला-पुरुष का अनुपात 30 और 70 का है। प्रो. शालिनी ने बताया कि पीजीआई में आईवीएफ पर कुल 70 से 80 हजार रुपये का खर्च आ रहा है। इसमें 40 हजार रुपये फीस है। इसके अलावा दवा और इंजेक्शन पर लगभग 30 से 40 हजार रुपये का खर्च आता है।
देरी न करें
प्रो. शालिनी ने बताया कि संतान की उम्मीद रखते-रखते काफी केस में इतनी देरी हो चुकी होती है कि उन्हें तकनीक का भी लाभ नहीं मिल पाता। ऐसे में जरूरी है कि डॉक्टर की सलाह पर बिना देरी किए इलाज शुरू कराएं। प्रो. शालिनी का कहना है कि अन्य जगहों के चक्कर काटकर पीजीआई में मरीज काफी देर से पहुंच रहे हैं, जिसके कारण आईवीएफ की सफलता दर पर असर पड़ रहा है। युवावस्था वाले केस में सफलता दर 40 से 45 प्रतिशत और ज्यादा उम्र वाले में 20 प्रतिशत है। बांझपन की समस्या इतनी ज्यादा बढ़ रही है कि पीजीआई में मौजूदा समय में आईवीएफ के लिए 60 से 70 की वेटिंग चल रही है।
इसलिए होता है बांझपन
बांझपन शुक्राणु की गुणवत्ता प्रभावित होने और स्पर्म काउंट कम होने के कारण होती है। जिसके कारण अंडों की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। इन सभी कारकों की वजह से धीरे-धीरे बांझपन की समस्या शुरू होने लगती है। इसके अलावा पुरुष और महिलाओं दोनों में ही बांझपन के लिए कई अलग-अलग कारण भी जिम्मेदार होते हैं।
इसका रखें ध्यान
- पोषक तत्वों से भरपूर आहार लें।
- स्मोकिंग और शराब के सेवन से बचें।
- नियमित एक्सरसाइज और योग का अभ्यास करें।
- शरीर के वजन को सामान्य बनाए रखें।
- चिंता, तनाव, अवसाद और अनिद्रा जैसी समस्याओं का प्रबंधन करें।
- अच्छी और पर्याप्त नींद लें।
- जंक, प्रोसेस्ड, मीठे, पैकेज्ड फूड्स और कैफीन युक्त ड्रिंक्स जैसे सोडा, एनर्जी ड्रिंक, चाय-कॉफी के सेवन कम करें।
- समय-समय पर डॉक्टर से चेकअप करवाएं।
महिला-पुरुष दोनों में बढ़ रहा बांझपन
वर्ष विभाग पुरुष/महिला
2023 यूरोलॉजी/ बांझपन क्लीनिक 1433/1359
2022 यूरोलॉजी/ बांझपन क्लीनिक 1425/809
2021 यूरोलॉजी/ बांझपन क्लीनिक 956/ 229