{"_id":"031b6f3c5da6de6851ad48bb87a1952b","slug":"big-relief-for-disabled-soldiers","type":"story","status":"publish","title_hn":"निशक्त होने पर निकाले गए सैनिकों को बड़ी राहत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
निशक्त होने पर निकाले गए सैनिकों को बड़ी राहत
आशीष वर्मा/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Sat, 25 Jan 2014 11:52 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारतीय सेना में काम करते वक्त बीमारी व अन्य कारणों से निशक्त हुए सैनिकों को सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ी राहत दी है।
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय की उस पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें मार्च 2011 के फैसले पर फिर से विचार करने को कहा था।
मार्च 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने कैप्टन केजेएस बुट्टर बनाम यूनियन ऑफ इंडिया की सुनवाई करते हुए निशक्तता के नए मानकों को साल 1996 से पहले रिटायर्ड सैनिकों पर भी लागू करने के निर्देश दिए थे।
पांचवें वेतन आयोग में सिफारिश की गई थी कि यदि कोई 30 प्रतिशत निशक्त है तो उसे 50 प्रतिशत निशक्त मानकर फायदा दिया जाए। इसी तरह 50-75 प्रतिशत से नीचे निशक्त को 75 प्रतिशत निशक्त का फायदा दिया जाए और 76 प्रतिशत से ऊपर के निशक्त को 100 प्रतिशत निशक्त मानकर बेनाफिट दिया जाए।
विज्ञापन
रक्षा मंत्रालय ने आयोग की सिफारिशों का लाभ सिर्फ साल 1996 के बाद रिटायर्ड सैनिकों को दिया जबकि इससे पहले रिटायर्ड सैनिकों को पेंशन का कोई लाभ नहीं दिया। इससे इन सैनिकों का जीवन काफी प्रभावित हो गया।
विज्ञापन
पांचवें वेतन आयोग के बाद नए मानक लागू होने से साल 1996 के बाद रिटायर्ड सैनिकों को लाभ मिला, लेकिन इससे पहले निकाले गए सैनिकों को कोई लाभ नहीं दिया गया।
इन सैनिकों ने पहले आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल का रुख किया। ट्रिब्यूनल से उन्हें पूरा फायदा मिला लेकिन रक्षा मंत्रालय ने इस फैसले के खिलाफ पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट में भी मंत्रालय को मुंह की खानी पड़ी और सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के दो केस यूनियन ऑफ इंडिया बनाम परमजीत सिंह और यूनियन आफ इंडिया बनाम कैप्टन केजेएस बुट्टर को आधार मानकर सैनिकों के पक्ष में फैसला दिया।
इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका खारिज करने में देरी का भी आधार माना है। कोर्ट का कहना है कि पुनर्विचार याचिका 907 दिन के बाद दायर की गई है और देरी का कोई ठोस कारण भी नहीं बताया गया।