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बैसाखी पर याद आया पंजाब, NRI बोले- जिस्म विदेश में लेकिन आत्मा पंजाब में
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 14 Apr 2017 09:27 AM IST
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Vaisakhi Special
- फोटो : अमर उजाला
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खेतों में लहलहाती फसलें... गिद्दे और भंगड़े की मस्ती की बात ही कुछ अलग है। बेशक रोजगार और प्रोफेशन इनको विदेश खींच ले गया हो, लेकिन हर एनआरआई के दिल में बसता है पंजाब। बैसाखी पर याद आने लगते हैं वे लम्हे जिनका इंतजार एक साल तक रहता था।
बैसाखी पर एनआरआई सवेरे गुरुद्वारा पहुंचते हैं और शाम के समय होता है बैसाखी मेला या पार्टी। खरड़ से ऑस्ट्रेलिया में जाकर बसे एनआरआई केविन खजूरिया ने बताया कि मेलबर्न में उन्होंने पंजाब के दोस्तों का एक ग्रुप बनाया है। यह ग्रुप बैसाखी पर अपने परिवार के साथ पहले डेंडियांग में एकत्र होता था। अब थोड़ा ट्रेंड चेंज हो गया है और मेलबर्न में ही हॉल में भंगड़े, गिद्दे का इंतजाम करके मेला लगाते हैं। उन्होंने बताया कि उनका जिस्म चाहे विदेश में है, लेकिन आत्मा पंजाब में ही बसती है।
बठिंडा के रहने वाले एनआरआई हरजीत सिंह ने फोन पर बताया कि पंजाब की बैसाखी की बात ही अलग है। विदेश में त्योहार मनाते जरूर हैं पर असल मस्ती तो पंजाब में है। फ्रांस के एनआरआई गुरप्रीत सिंह कंग ने बताया कि वह कुछ दिन पहले ही पंजाब आए थे। यहां की बात निराली है। पंजाब में बैसाखी पर दोस्तों संग मस्ती की बात अलग है।
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बैसाखी पर एनआरआई सवेरे गुरुद्वारा पहुंचते हैं और शाम के समय होता है बैसाखी मेला या पार्टी। खरड़ से ऑस्ट्रेलिया में जाकर बसे एनआरआई केविन खजूरिया ने बताया कि मेलबर्न में उन्होंने पंजाब के दोस्तों का एक ग्रुप बनाया है। यह ग्रुप बैसाखी पर अपने परिवार के साथ पहले डेंडियांग में एकत्र होता था। अब थोड़ा ट्रेंड चेंज हो गया है और मेलबर्न में ही हॉल में भंगड़े, गिद्दे का इंतजाम करके मेला लगाते हैं। उन्होंने बताया कि उनका जिस्म चाहे विदेश में है, लेकिन आत्मा पंजाब में ही बसती है।
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बठिंडा के रहने वाले एनआरआई हरजीत सिंह ने फोन पर बताया कि पंजाब की बैसाखी की बात ही अलग है। विदेश में त्योहार मनाते जरूर हैं पर असल मस्ती तो पंजाब में है। फ्रांस के एनआरआई गुरप्रीत सिंह कंग ने बताया कि वह कुछ दिन पहले ही पंजाब आए थे। यहां की बात निराली है। पंजाब में बैसाखी पर दोस्तों संग मस्ती की बात अलग है।
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नए जोड़ों और बच्चों के लिए खास
बैसाखी स्पेशल
- फोटो : अमर उजाला
नवांशहर के रहने वाले सुरिंदर पटोला ने कहा कि वह बेशक नवांशहर से मेलबर्न गए हैं। मेलबर्न में तो बैसाखी का सिर्फ मेला ही होता है। आनंद तो पंजाब में बैसाखी मनाने का है।
धार्मिक आस्थाओं का जुड़ाव
सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की। तभी से यह पवित्र दिन बैसाखी की तरह मनाया जाता है। बैसाखी के दिन लोग गुरुद्वारे में इस दिन की जाने वाली विशेष अरदास में शामिल होते हैं। यहां पर लंगर का आयोजन भी किया जाता है।
नए जोड़ों और बच्चों के लिए खास
यह दिन नए शादीशुदा जोड़ों और बच्चों के लिए खास होता है। किसी भी बच्चे के जन्म के बाद पड़ने वाली पहली बैसाखी बहुत विशेष मानी जाती है। शादी के बाद पड़ने वाली पहली बैसाखी को भी नई दुल्हन के लिए खास माना जाता है।
धार्मिक आस्थाओं का जुड़ाव
सिखों के दसवें गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की। तभी से यह पवित्र दिन बैसाखी की तरह मनाया जाता है। बैसाखी के दिन लोग गुरुद्वारे में इस दिन की जाने वाली विशेष अरदास में शामिल होते हैं। यहां पर लंगर का आयोजन भी किया जाता है।
नए जोड़ों और बच्चों के लिए खास
यह दिन नए शादीशुदा जोड़ों और बच्चों के लिए खास होता है। किसी भी बच्चे के जन्म के बाद पड़ने वाली पहली बैसाखी बहुत विशेष मानी जाती है। शादी के बाद पड़ने वाली पहली बैसाखी को भी नई दुल्हन के लिए खास माना जाता है।