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Ayodhya Ram Mandir: 6 दिसंबर 1992 को राम मंदिर पर भगवा फहराने वालों में शामिल थे ये शख्स

Tue, 04 Aug 2020 03:17 PM IST
खुशबू गोयल कर्मबीर लाठर, करनाल
कर्मबीर लाठर, करनाल Published by: खुशबू गोयल Updated Tue, 04 Aug 2020 03:17 PM IST
सार

  • 1990 में कारसेवकों के जत्थे का नेतृत्व करते हुए पहुंचे थे अयोध्या
  • पुलिस से बचते बचाते पहुंचे तो सैन्य बलों ने बरसाई थीं लाठियां
  • पुलिस ने तोड़ दिये थे हाथ, सात लोग हो गये थे गोलियों के शिकार
  • उमा भारती सिर के बाल कटवाकर पहुंची थी, अशोक सिंघल पोस्टमैन बनकर
  • 6 दिसंबर 1992 को मंदिर पर भगवा फहराने में भी निभाई थी अग्रणी भूमिका

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Ram Mandir Bhoomi Pujan Ayodhya News: Sharat Chandra Bhatia Played Important Role
शरत चंद्र भाटिया - फोटो : फाइल फोटो

विस्तार

राममंदिर निर्माण के लिए जान की बाजी लगाने वाले करनाल के सेवानिवृत्त लेक्चरर फिलहाल अस्वस्थ्य चल रहे हैं, लेकिन मंदिर निर्माण की तिथि घोषित होने और पांच अगस्त को भूमि पूजन को लेकर उनमें उत्साह है। 1990 में कारसेवा जत्थे का नेतृत्व करते हुए पुलिस से बचते बचाते वे अयोध्या पहुंचे थे, जहां सैन्य बलों के लाठीचार्ज में उनके हाथ टूट गये थे, वहीं उनके सामने ही सात कारसेवक पुलिस की गोलियों का शिकार हो गये थे।
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सोमवार को जब उनके सामने राममंदिर निर्माण पर चर्चा की गयी तो उनकी आंखों में आंसू आ गये। उन्होंने बताया कि उस दौरान उमा भारती सिर के बाल कटवाकर अयोध्या पहुंची थी, जबकि अशोक सिंघल पोस्टमैन बनकर आये थे। जिले के नगला रोड़ान गांव निवासी सेवानिवृत्त लेक्चरर शरतचंद्र भाटिया (70) का परिवार श्रीराम के प्रति गहरी आस्था रखता है।
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जत्थे में सौ कारसेवक थे

वे बताते हैं कि अयोध्या में श्रीराम मंदिर बनाने को लेकर 1990 में दिल्ली में विश्व हिंदू परिषद की बैठक में योजना बनी और कार सेवकों का जत्था अयोध्या के लिए 26 अक्तूबर को रवाना हुआ। मुद्दा था कार सेवा करनी है और राम मंदिर बनाना है। जत्थे में सौ कारसेवक थे। जत्थे का नेतृत्व वे स्वयं कर रहे थे। दिल्ली के केशव पुरम से ही जत्थे के पीछे सीआईडी और पुलिस के गुप्तचर लग गए। शाम को पुलिस को चकमा देकर कारसेवक नई दिल्ली स्टेशन से ट्रेन में सवार हो गए।

ट्रेन के हर डिब्बे में लोग थे। इसके बाद पुलिस शक के आधार पर कारसेवकों को रास्ते में पकड़कर उतार रही थी। इस दौरान शरत चंद्र भाटिया लोई ओढ़कर ट्रेन में लेट गए। लखनऊ जाकर गाड़ी रुकी। ट्रेन गार्ड ने सूचना दी कि आगे गाड़ियां नहीं जाएंगी। सभी गाड़ियां तीन से चार व सात घंटे तक देरी से लखनऊ पहुंच रही थीं। लखनऊ में जब पूछताछ हुई तो कारसेवकों ने जवाब दिया कि वह देवरिया या गोरखपुर जा रहे हैं। जब आगे नहीं जाने दिया गया तो सभी ने मिलकर ट्रैक या पगडंडियों के सहारे पैदल ही आगे जाने की योजना बनाई। तभी लखनऊ में उन्हें एसएसपी ने गिरफ्तार कर लिया। गहन पूछताछ की गयी।

सैन्य बल ने कारसेवकों पर लाठीचार्ज किया

शाम को पुलिस ने उनके जत्थे को गाड़ियों में भरकर दूर जंगल में छोड़ दिया। किसी तरह वह गोंडा में पहुंचे, जहां पता चला कि वह आगे नहीं जा सकते। गोंडा में लोगों ने उनकी मदद की और उनके ठहरने की घरों में व्यवस्था की। वह वहां रामअवतार गुप्ता के घर पर रुके थे। गोंडा से अयोध्या की दूरी कम रह गई थी। कारसेवकों के लिए वहां के लोग मदद को मजबूती से खड़े थे। रात को वह अयोध्या के पास जाकर रुक गए। सरयू के पास पहुंचे तो पुल पर सीआरपीएफ थी।

वहां से एक किलोमीटर दूर नाव से सरयू पार की। अयोध्या में कर्फ्यू था। मुश्किल से आगे बढ़े और छोटी छावनी में प्रमुख महंत नृत्य गोपाल दास से मिले। वह 29 अक्तूबर को अयोध्या में दाखिल हो गए थे। 30 अक्तूबर को प्रदर्शन था। इस दौरान हनुमानगढ़ी चौक पर सैन्य बल ने कारसेवकों पर लाठीचार्ज किया। आंसू गैस छोड़ी। सुबह 11.30 बजे थे। दोपहर एक बजे फायरिंग शुरू हो गयी। सात लोग उनके सामने ही गोलियों के शिकार हो गये।
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खूब पीटा और दोनों हाथ तोड़ दिये

उन्हें पुलिस ने लाठियों से आधा घंटा खूब पीटा और दोनों हाथ तोड़ दिये। वह निढाल होकर गिर गये। दो नवंबर को फिर कूच करने की कोशिश की, लेकिन सभी की हालत खराब थी इस कारण स्थगित करना पड़ा। 1992 में दोबारा मूवमेंट हुई। दिल्ली के केशवपुरम से ही योजना बनी, जिसमें वह शामिल थे। उनकी मुख्य ड्यूटी यातायात की व्यवस्था के लिए लगी।

छह दिसंबर 1992 को मंदिर पर भगवा झंडा फहराने की योजना तय हुई, जिसमें उन्हें सफलता मिली। उन्होंने खुद आचार्य धर्मेंद्र के कहने पर गैंती लेकर इमारत की नींव से सौ से अधिक ईंटें उखाड़ी। उसके बाद वह आयोध्या से वापस दिल्ली लौट आए थे। भाटिया इस समय अस्वस्थ चल रहे हैं, लेकिन उनकी इच्छा है वह अयोध्या में श्रीराम मंदिर देखें और रामलला के दर्शन करें।
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