अमृतसर हादसा: बीएसएफ के पूर्व आईजी बोले- बडी सिस्टम लागू होता तो टल सकती थी यह अनहोनी
परिवार से दूर रहकर देश सेवा में लगे जवानों का तनाव दूर करने के लिए सैनिक सम्मेलन जैसी पहल बहुत जरूरी है। इन दिनों यह महज औपचारिकता बनकर रह गए हैं। अधिकारियों को सिपाहियों व अन्य के अभिभावक के तौर पर काम करते हुए समय-समय पर सैनिक सम्मेलन में बात करनी चाहिए।
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सुरक्षा बलों के 80 फीसदी से ज्यादा कर्मचारी और अधिकारी हमेशा तनाव में रहते हैं। सीमाओं की रक्षा को लेकर उन्हें सामान्य से ज्यादा ड्यूटी देनी पड़ती है। इसी तनाव में सैनिक कई बार खुद और साथियों को नुकसान पहुंचा बैठते हैं। रविवार को बीएसएफ हेडक्वार्टर में हुई घटना के पीछे कुछ ऐसे ही कारण हैं। यह अनहोनी टाली जा सकती थी, यदि सेना में बडी (दोस्त) सिस्टम सक्रिय होता। इसके जरिए समय रहते बीएसएफ जवान के व्यवहार पर नजर रखकर उसकी काउंसलिंग की जा सकती थी। बीएसएफ के सेवानिवृत्त आईजी राजेश शर्मा ने इस घटना पर यह राय बयां की।
राजेश शर्मा ने बताया कि सेना में बहुत पहले से यह व्यवस्था है कि दो जवानों की ड्यूटी एक साथ लगती है। इसमें दोनों एक-दूसरे के बडी यानी दोस्त होते हैं और एक दूसरे के व्यवहार पर नजर रखते हैं। इनके जरिए जवानों की रिपोर्ट अधिकारियों को मिलती रहती थी। यह सिस्टम आजकल खत्म हो चुका है। इसमें दोनों अकसर साथ रहते थे और एक दूसरे से सुख-दुख साझा करते थे।
अगर कोई सैनिक खाना नहीं खा रहा है, परिवार से बात नहीं कर रहा है, या फिर ड्यूटी को लेकर तनाव में है तो बडी की यह जिम्मेदारी होती थी कि वह उसके व्यवहार में आए बदलाव को अपने वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचाए। इसके बाद वरिष्ठ अधिकारी उस सैनिक से बात कर उसकी परेशानी दूर करते थे। उसके अंदर आ रही नकारात्मकता को दूर किया जाता था। वर्तमान में इस व्यवस्था को शुरू किए जाने की जरूरत है।
अफसरों को बनाया चाहिए मित्रवत व्यवहार
राजेश शर्मा ने बताया कि ड्यूटी के तनाव से जवानों को निकालने की जिम्मेदारी अफसरों को उठानी चाहिए। माहौल को दोस्ताना बनाकर वह इसकी पहल कर सकते हैं। हालांकि कुछ अफसर ऐसा करते भी हैं। सैनिकों से प्रेरणादायक बातें करनी चाहिए। सिपाही का हवलदार से, हवलदार का एसआई से मित्रवत व्यवहार रहना चाहिए। यही तारतम्य जूनियर अफसरों का अपने वरिष्ठों से होना चाहिए।
वह कहते हैं कि मौजूदा समय में यह व्यवस्था टूट रही है। अफसर अपने जूनियर से सिर्फ ड्यूटी को लेकर ही बात करते हैं। कभी उनकी परेशानी जानने की कोशिश नहीं करते। यदि कोई अफसर अपने जूनियर से हंसकर बात कर लेता है तो उसका आत्मविश्वास बढ़ जाता है। यह अफसरों की जिम्मेदारी है कि वह अपने आसपास ऐसा माहौल न बनने दें कि कोई जूनियर अपनी बात तक उनके सामने कहने से झिझके ।
सैनिक सम्मेलन बहुत जरूरी
परिवार से दूर रहकर देश सेवा में लगे जवानों का तनाव दूर करने के लिए सैनिक सम्मेलन जैसी पहल बहुत जरूरी है। इन दिनों यह महज औपचारिकता बनकर रह गए हैं। अधिकारियों को सिपाहियों व अन्य के अभिभावक के तौर पर काम करते हुए समय-समय पर सैनिक सम्मेलन में बात करनी चाहिए। उनके साथ खेलना चाहिए।