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अमर उजाला संवाद में बोले रामलीला आयोजक- संकट के दौर से गुजर रही कमेटियां, प्रशासन करे मदद
Sun, 06 Oct 2019 12:18 PM IST
खुशबू गोयल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
Published by: खुशबू गोयल
Updated Sun, 06 Oct 2019 12:18 PM IST
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अमर उजाला संवाद में रामलीला आयोजक
- फोटो : अमर उजाला
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एक समय था जब घर-घर रामलीला की चर्चा होती थी और मंचन शुरू होने से पहले ही लोग अपनी सीट पर आकर बैठ जाते थे। चांदनी रात में सर्द हवाओं के बीच लोग देर रात तक रामलीला देखते थे। कुछ समय बाद टीवी आ गया। फिर आया केबल चैनलों का दौर और फिर अब सोशल मीडिया। इसके बाद अब दौर वेब सीरीज का है। इतने कठिन दौर से गुजरने के बावजूद अभी भी रामलीला के अस्तित्व पर कोई आंच नहीं आई है। हां, जो हालात बन रहे हैं, उससे आगे मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं। हर साल प्रशासन सख्त नियम बनाता जा रहा है।
रामलीलाओं के मंचन की परमिशन में कोई न कोई अड़चन हर साल खड़ी हो जाती है। सुरक्षा से लेकर सीसीटीवी की जिम्मेदारी कमेटियों पर डाल दी गई है। कमेटियों के पास फंड के नाम पर सिर्फ लोगों की ओर से दिया गया चंदा होता है। आजकल लोग चंदा देने से भी कतराने लगे हैं। इससे रामलीला कमेटियां आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही हैं। दूसरी तरफ, रामलीलाओं की स्क्रिप्ट, डायलॉग, साउंड और लाइटें भी पुराने जमाने की हैं। नयापन नहीं होने से लोगों को बांधे रखना अब मुश्किल हो रहा है। इन सबके बावजूद रामलीला के आयोजक डटकर खड़े हैं।
किसी न किसी व्यवस्था से आयोजक खर्चे को पूरा कर रहे हैं। कुछ आयोजकों ने नए प्रयोग शुरू भी किए हैं। रामलीला से जुड़े ऐसे तमाम मुद्दों के बीच अमर उजाला ने शहर की प्रमुख रामलीला कमेटियों के सदस्यों के साथ संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया। संवाद में आयोजकों ने अपनी समस्याओं को उन्होंने प्रमुखता से उठाया।
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रामलीलाओं के मंचन की परमिशन में कोई न कोई अड़चन हर साल खड़ी हो जाती है। सुरक्षा से लेकर सीसीटीवी की जिम्मेदारी कमेटियों पर डाल दी गई है। कमेटियों के पास फंड के नाम पर सिर्फ लोगों की ओर से दिया गया चंदा होता है। आजकल लोग चंदा देने से भी कतराने लगे हैं। इससे रामलीला कमेटियां आर्थिक संकट के दौर से गुजर रही हैं। दूसरी तरफ, रामलीलाओं की स्क्रिप्ट, डायलॉग, साउंड और लाइटें भी पुराने जमाने की हैं। नयापन नहीं होने से लोगों को बांधे रखना अब मुश्किल हो रहा है। इन सबके बावजूद रामलीला के आयोजक डटकर खड़े हैं।
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किसी न किसी व्यवस्था से आयोजक खर्चे को पूरा कर रहे हैं। कुछ आयोजकों ने नए प्रयोग शुरू भी किए हैं। रामलीला से जुड़े ऐसे तमाम मुद्दों के बीच अमर उजाला ने शहर की प्रमुख रामलीला कमेटियों के सदस्यों के साथ संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया। संवाद में आयोजकों ने अपनी समस्याओं को उन्होंने प्रमुखता से उठाया।
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संवाद में ये मुद्दे सामने आए
- रामलीलाओं के मंचन के लिए चंडीगढ़ प्रशासन कुछ अनुदान दे
- रामलीला की अनुमति के लिए एक ऐसा सिस्टम बनाया जाए, जिससे दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें
- सुरक्षा और सीसीटीवी की जिम्मेदारी पुलिस-प्रशासन उठाए
- रामलीला की स्क्रिप्ट, डायलॉग और डायरेक्शन में नयापन लाने की जरूरत है
- रामलीला के मंचन के दौरान फिल्मी व भद्दे गीतों पर सख्ती से रोक लगे
- लोग भी रामलीला के मंचन में खुले दिल से सहयोग करें
रामलीला हमारी ऐतिहासिक धरोहर
रामलीला के मंचन के लिए हम दो महीने पहले से तैयारी शुरू कर देते हैं लेकिन प्रशासन का रुख उदासीन रहता है। रामलीला मंचन की अनुमति के लिए हर वर्ष परेशान होना पड़ता है। हम स्कूली बच्चों को साथ लेकर तैयारी करते हैं बच्चे ताकि संस्कारित हो सकें। नगर निगम और प्रशासन तीज फेस्टिवल के लिए लाखों खर्च करता है। ऐसे में रामलीला कमेटियों को भी अनुदान प्रशासन से मिलना चाहिए। रामलीला हमारी ऐतिहासिक धरोहर है। महंगाई के कारण चंदा कम आता है लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं जो रामलीला के लिए तैयार रहते हैं। वहीं, परिवारों में रामलीला की चर्चा कम हो गई है।
-भूपेंद्र शर्मा, चेयरमैन, चंडीगढ़ केंद्रीय रामलीला महासभा चंडीगढ़
प्रशासन रामलीला कमेटियों को दे अनुदान
प्रशासन सहायता की जगह बोझ डाल देती है। रामलीला में मोर्चा लगाने को कहती है। हम मोर्चा बना भी देते हैं। मोर्चा बनाने में काफी पैसे खर्च होते हैं लेकिन एक भी पुलिसवाला मोर्चा में नहीं रहते हैं। सीसीटीवी भी स्वयं ही लगाना पड़ता है। जब सभी काम रामलीला कमेटियों को ही करना पड़ता है तो प्रशासन किस लिए है। प्रशासन को चाहिए कि रामलीला कमेटियों को अनुदान दे ताकि और बेहतर तरीके से काम कर सकें। समाज को भी आगे आना होगा। लोग अपने बच्चों को रामलीला देखने के लिए लाते तो हैं लेकिन प्राय: यह देखा जाता है कि वे अपने मोबाइल में ही व्यस्त रहते हैं।
-अशोक चौधरी, उपाध्यक्ष, आजाद ड्रामाटिक क्लब रामलीला एवं दशहरा कमेटी सेक्टर-20
चंदा देने से कतराते हैं लोग
रामलीला मंचन के लिए घर-घर जाकर चंदा एकत्र करना बहुत बड़ी चुनौती है। कई बार लोग बुरे तरीके से व्यवहार करते हैं लेकिन फिर भी हम सभी लगे रहते हैं। प्रशासन और नगर निगम अपने फेस्टिवल के दौरान मुंबई के कलाकारों पर लाखों खर्च कर देते हैं लेकिन रामलीला के लिए उनके पास कोई फंड नहीं है। रामलीला का मंचन बहुत बड़ी चुनौती है। आगे के समय के लिए बड़ी मुश्किल होगी। दर्शकों में अब धैर्य की कमी है। आयोजनों में बदलाव किया है ताकि दर्शक जुड़े रहें। हमें भी समय के साथ रामलीला में बदलाव की ओर बढ़ना ही चाहिए। इस बात का ख्याल रखते हुए कि इसका मूल स्वरूप में कोई छेड़छाड़ न हो।
-यशपाल कुमार, गढ़वाल रामलीला मंडल बिजली बोर्ड सेक्टर 28
-भूपेंद्र शर्मा, चेयरमैन, चंडीगढ़ केंद्रीय रामलीला महासभा चंडीगढ़
प्रशासन रामलीला कमेटियों को दे अनुदान
प्रशासन सहायता की जगह बोझ डाल देती है। रामलीला में मोर्चा लगाने को कहती है। हम मोर्चा बना भी देते हैं। मोर्चा बनाने में काफी पैसे खर्च होते हैं लेकिन एक भी पुलिसवाला मोर्चा में नहीं रहते हैं। सीसीटीवी भी स्वयं ही लगाना पड़ता है। जब सभी काम रामलीला कमेटियों को ही करना पड़ता है तो प्रशासन किस लिए है। प्रशासन को चाहिए कि रामलीला कमेटियों को अनुदान दे ताकि और बेहतर तरीके से काम कर सकें। समाज को भी आगे आना होगा। लोग अपने बच्चों को रामलीला देखने के लिए लाते तो हैं लेकिन प्राय: यह देखा जाता है कि वे अपने मोबाइल में ही व्यस्त रहते हैं।
-अशोक चौधरी, उपाध्यक्ष, आजाद ड्रामाटिक क्लब रामलीला एवं दशहरा कमेटी सेक्टर-20
चंदा देने से कतराते हैं लोग
रामलीला मंचन के लिए घर-घर जाकर चंदा एकत्र करना बहुत बड़ी चुनौती है। कई बार लोग बुरे तरीके से व्यवहार करते हैं लेकिन फिर भी हम सभी लगे रहते हैं। प्रशासन और नगर निगम अपने फेस्टिवल के दौरान मुंबई के कलाकारों पर लाखों खर्च कर देते हैं लेकिन रामलीला के लिए उनके पास कोई फंड नहीं है। रामलीला का मंचन बहुत बड़ी चुनौती है। आगे के समय के लिए बड़ी मुश्किल होगी। दर्शकों में अब धैर्य की कमी है। आयोजनों में बदलाव किया है ताकि दर्शक जुड़े रहें। हमें भी समय के साथ रामलीला में बदलाव की ओर बढ़ना ही चाहिए। इस बात का ख्याल रखते हुए कि इसका मूल स्वरूप में कोई छेड़छाड़ न हो।
-यशपाल कुमार, गढ़वाल रामलीला मंडल बिजली बोर्ड सेक्टर 28
आर्थिक तंगी से गुजर रही हैं रामलीला कमेटियां
रामलीला कमेटियों को आर्थिक तंगी से हर वर्ष गुजरना पड़ता है। प्रशासन को चाहिए कि वह सभी रामलीला कमेटियों को आर्थिक सहायता करे। कम से कम 50-50 हजार रुपये प्रशासन अनुदान करे लेकिन प्रशासन इस पर कोई काम नहीं कर रहा है। हमारा तो सिर्फ दर्शकों का साथ है। हर रामलीला में करीब पांच लाख रुपये खर्च होते हैं। खर्च उठाना बहुत ही मुश्किल काम है। यही स्थिति रही तो रामलीला पांच वर्ष के बाद बंद होने लगेंगी। डायलॉग आौर सीन में भी सुधार करना होगा। लोगों में डर की भावना को प्रशासन दूर करे तो दर्शक बढ़ेंगे।
-विक्रम सिंह बिष्ट, प्रधान, चंडीगढ़ केंद्रीय रामलीला महासभा
रामलीला की अनुमति के लिए दौड़ाता है प्रशासन
रामलीला का मंचन बेहतर हो इसके लिए फंड एकत्र करने के लिए तीसरी मंजिलों तक चढ़ना पड़ता है। यही समझ लीजिए कि कि कितने घरों के तीसरी मंजिलों तक लगातार दो महीनों तक चढ़ना पड़ता है। कई लोग चंदा भी नहीं देते और बुरा-भला भी कहते हैं। यह सब सुनकर भी हम रामलीला का आयोजन हर साल कर रहे हैं। यह बहुत बड़ी चुनौती है। इतना होने के बाद प्रशासन रामलीला का मंचन करने के लिए परमिशन देने में बहुत परेशान करता है। दफ्तरों के कई चक्कर लगाने पड़ते हैं।
सतीश जोशी, गढ़वाल रामलीला एवं सांस्कृतिक मंडल सेक्टर 22
रामलीलाओं के प्रति लगाव बढ़ा है, प्रशासन भी काम आसान करे
प्रशासन की सख्ती से रामलीला कमेटियां नाराज हैं। प्रशासन ने सभी रामलीला कमेटियों से अंडरटेकिंग ली है। यह ठीक नहीं है। सभी जिम्मेवारी रामलीला कमेटियों को किस प्रकार हो सकती है। कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी तो पुलिस प्रशासन की होती है। अंडरटेकिंग के बाद मन में काफी चिंता रहती है। कहीं कुछ हो न जाए। अंतिम क्षणों में रामलीला की अनुमति मिलती है। ऐसे में रामलीला कमेटियों को काफी कष्ट होता है। इस बात को प्रशासन समझे। दो महीना पहले रामलीला मंचन की अनुमति के लिए आवेदन किया जाता है, लेकिन अंत समय तक अधिकारी परेशान करते हैं। जो अधिकारी लापरवाही करते हैं उन पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।
-बीपी गौड़, महासचिव, चंडीगढ़ केंद्रीय रामलीला महासभा चंडीगढ़
-विक्रम सिंह बिष्ट, प्रधान, चंडीगढ़ केंद्रीय रामलीला महासभा
रामलीला की अनुमति के लिए दौड़ाता है प्रशासन
रामलीला का मंचन बेहतर हो इसके लिए फंड एकत्र करने के लिए तीसरी मंजिलों तक चढ़ना पड़ता है। यही समझ लीजिए कि कि कितने घरों के तीसरी मंजिलों तक लगातार दो महीनों तक चढ़ना पड़ता है। कई लोग चंदा भी नहीं देते और बुरा-भला भी कहते हैं। यह सब सुनकर भी हम रामलीला का आयोजन हर साल कर रहे हैं। यह बहुत बड़ी चुनौती है। इतना होने के बाद प्रशासन रामलीला का मंचन करने के लिए परमिशन देने में बहुत परेशान करता है। दफ्तरों के कई चक्कर लगाने पड़ते हैं।
सतीश जोशी, गढ़वाल रामलीला एवं सांस्कृतिक मंडल सेक्टर 22
रामलीलाओं के प्रति लगाव बढ़ा है, प्रशासन भी काम आसान करे
प्रशासन की सख्ती से रामलीला कमेटियां नाराज हैं। प्रशासन ने सभी रामलीला कमेटियों से अंडरटेकिंग ली है। यह ठीक नहीं है। सभी जिम्मेवारी रामलीला कमेटियों को किस प्रकार हो सकती है। कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी तो पुलिस प्रशासन की होती है। अंडरटेकिंग के बाद मन में काफी चिंता रहती है। कहीं कुछ हो न जाए। अंतिम क्षणों में रामलीला की अनुमति मिलती है। ऐसे में रामलीला कमेटियों को काफी कष्ट होता है। इस बात को प्रशासन समझे। दो महीना पहले रामलीला मंचन की अनुमति के लिए आवेदन किया जाता है, लेकिन अंत समय तक अधिकारी परेशान करते हैं। जो अधिकारी लापरवाही करते हैं उन पर भी कार्रवाई होनी चाहिए।
-बीपी गौड़, महासचिव, चंडीगढ़ केंद्रीय रामलीला महासभा चंडीगढ़
रामलीला के लिए स्थायी मंच तैयार करे प्रशासन
रामलीला कमेटियों को हर वर्ष स्टेज बनाने पर ही कम से कम दो लाख रुपये खर्च होते हैं। रामलीला कमेटयों के लिए प्रशासन स्थायी मंच तैयार करके दे दे। प्रशासन रामलीला कमेटियों की समस्याएं नहीं समझ रहा। पॉलिटक्स करने वाले लोग भी यह नहीं चाहते। चंदा मांगने जाने पर भी कई दिक्कतों का समाना करना पड़ता है। रामलीला का आयोजन चुनौतियों से भरा हुआ है। रामलीला के लाइट, साउंड में भी बदलाव की जरूरत है। बारिश में जब ग्राउंड और कुर्सियां गीली होती हैं तो दर्शक कहां से आएंगे।
-बृज मोहन फोंदणी, उपाध्यक्ष, श्री बद्री केदार रामलीला कमेटी 45-46
नयापन लाना जरूरी, तभी दर्शक रुकेंगे
रामलीला मंचन के लिए सबसे पहले अनुमति के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। हमारी मांग है कि रामलीला की अनुमति के लिए प्रशासन सिंगल विंडो सिस्टम की व्यवस्था करे। रामलीला मंचन से 15 दिन पहले अनुमति मिले ताकि रामलीला कमेटियों अपने काम सुचारु रूप से कर सकें। अंतिम समय में अनुमति मिलने पर आयोजकों को काफी टेंशन हो जाती है। कई तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता है। हमने दर्शकों को बांधने के लिए तीन स्टेज बनाए हैं। कभी सीन के लिए दर्शकों को इंतजार नहीं करना पड़ता है। आपको नयापन स्वयं ही सृजित करना पड़ता है तभी तो दर्शक रुकेंगे।
-परमजीत सिंह पम्म, महासचिव, संयुक्त रामलीला कमेटी ट्राइसिटी
रामलीला की स्क्रिप्ट और डायलॉग में बदलाव करने होंगे
रामलीला मंचन को प्रशासन धार्मिक कहकर अनुदान नहीं देता। रामलीला का मंचन पुरातन है। मुगल और अंग्रेज भी इसे रोक नहीं पाए। लोग जागरूक हैं। रामलीला मंचन के लिए लोग ही चंदा देते हैं। लोग साथ हैं तो फिर किसी भी प्रकार की दिक्कत नहीं अपनी चाहिए। हां, अपने में बदलाव लाइए। कलाकारों का डेडिकेशन और दर्शकों की भक्ति भावना बहुत जरूरी है। पहले ढोलक और हारमोनियम पर रमालीला होती थी। अब काफी बदलाव है। क्वालिटी देने पर दर्शक आएंगे। हमारी लड़ाई टेक्नोलॉजी से है। स्क्रिप्ट, डायलॉग में बदलाव करने होंगे।
-अभिषेक शर्मा, डायरेक्टर, उत्तराखंड युवा समिति सेक्टर 28
रामलीलाओं में शालीनता बनाए रखना जरूरी
रामलीला का मंचन साधारण काम नहीं है। रामलीला में हमें अपने आदर्श प्रस्तुत करने हैं। रामलीला में शालीनता बनाकर रखना बहुत जरूरी है। रामलीला के कलाकारों को प्रशासन के द्वारा उचित सम्मान मिले। समाज में गलत मैसेज न जाए, इसका पूरा खयाल रहे। कई बार रामलीला कमेटयों के मंच से फिल्मी भद्दे गीत बजते हैं और रामलीला से मेल न खाने वाले डांस होता है जो ठीक नहीं है। इसे बंद करना चाहिए। हर वर्ष नयापन लाते हैं। कमेटी की ओर से रामलीला से संबंधित क्वीज रखते हैं। विजेता बच्चों के साथ साथ उनके माता पिता को भी मंच पर बुलाकर सम्मानित करते हैं। इससे हमारा काफी उत्साह बढ़ता है। लोग इस कदम की भरपूर सराहना करहे हैं।
-मोहम्मद शहजाद आलम, असिस्टेंट डायरेक्टर, नवयुग रामलीला एवं दशहरा कमेटी सेक्टर 7
-बृज मोहन फोंदणी, उपाध्यक्ष, श्री बद्री केदार रामलीला कमेटी 45-46
नयापन लाना जरूरी, तभी दर्शक रुकेंगे
रामलीला मंचन के लिए सबसे पहले अनुमति के लिए दर-दर भटकना पड़ता है। हमारी मांग है कि रामलीला की अनुमति के लिए प्रशासन सिंगल विंडो सिस्टम की व्यवस्था करे। रामलीला मंचन से 15 दिन पहले अनुमति मिले ताकि रामलीला कमेटियों अपने काम सुचारु रूप से कर सकें। अंतिम समय में अनुमति मिलने पर आयोजकों को काफी टेंशन हो जाती है। कई तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता है। हमने दर्शकों को बांधने के लिए तीन स्टेज बनाए हैं। कभी सीन के लिए दर्शकों को इंतजार नहीं करना पड़ता है। आपको नयापन स्वयं ही सृजित करना पड़ता है तभी तो दर्शक रुकेंगे।
-परमजीत सिंह पम्म, महासचिव, संयुक्त रामलीला कमेटी ट्राइसिटी
रामलीला की स्क्रिप्ट और डायलॉग में बदलाव करने होंगे
रामलीला मंचन को प्रशासन धार्मिक कहकर अनुदान नहीं देता। रामलीला का मंचन पुरातन है। मुगल और अंग्रेज भी इसे रोक नहीं पाए। लोग जागरूक हैं। रामलीला मंचन के लिए लोग ही चंदा देते हैं। लोग साथ हैं तो फिर किसी भी प्रकार की दिक्कत नहीं अपनी चाहिए। हां, अपने में बदलाव लाइए। कलाकारों का डेडिकेशन और दर्शकों की भक्ति भावना बहुत जरूरी है। पहले ढोलक और हारमोनियम पर रमालीला होती थी। अब काफी बदलाव है। क्वालिटी देने पर दर्शक आएंगे। हमारी लड़ाई टेक्नोलॉजी से है। स्क्रिप्ट, डायलॉग में बदलाव करने होंगे।
-अभिषेक शर्मा, डायरेक्टर, उत्तराखंड युवा समिति सेक्टर 28
रामलीलाओं में शालीनता बनाए रखना जरूरी
रामलीला का मंचन साधारण काम नहीं है। रामलीला में हमें अपने आदर्श प्रस्तुत करने हैं। रामलीला में शालीनता बनाकर रखना बहुत जरूरी है। रामलीला के कलाकारों को प्रशासन के द्वारा उचित सम्मान मिले। समाज में गलत मैसेज न जाए, इसका पूरा खयाल रहे। कई बार रामलीला कमेटयों के मंच से फिल्मी भद्दे गीत बजते हैं और रामलीला से मेल न खाने वाले डांस होता है जो ठीक नहीं है। इसे बंद करना चाहिए। हर वर्ष नयापन लाते हैं। कमेटी की ओर से रामलीला से संबंधित क्वीज रखते हैं। विजेता बच्चों के साथ साथ उनके माता पिता को भी मंच पर बुलाकर सम्मानित करते हैं। इससे हमारा काफी उत्साह बढ़ता है। लोग इस कदम की भरपूर सराहना करहे हैं।
-मोहम्मद शहजाद आलम, असिस्टेंट डायरेक्टर, नवयुग रामलीला एवं दशहरा कमेटी सेक्टर 7