गांव वालों ने दी सांप्रदायिक एकता की मिसाल, बोरवेल से नदीम के बाहर आने के बाद मनाई होली
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मासूम नदीम के बोरवेल में गिरने से लेकर उसके बाहर निकाले जाने तक के प्रकरण में बालसमंद गांव में सांप्रदायिक एकता और भाईचारे की झलक देखने को मिली। ग्रामीणों ने इस दौरान न केवल चाय-पानी, बल्कि खाने की भी व्यवस्था की हुई थी, बल्कि वे राहत और बचाव कार्य में भी जुटे हुए थे। गांव के लोगों ने नदीम के बोरवेल से बाहर आने के बाद शुक्रवार को अबीर गुलाल लगाकर होली मनाई और पटाखे फोड़कर खुशियां भी मनाईं।
खास बात यह है कि घटना गांव से करीब 2-3 किलोमीटर दूर ढाणी में हुई थी। इसके बावजूद पूरा गांव घटनास्थल पर था और यह कोई तमाशबीन बनकर मौजूद नहीं थे, बल्कि हर उस काम में सहयोग कर रहे थे, जिसमें वे सहयोग कर सकते थे या प्रशासन उनका सहयोग मांग रहा था।
गांवों में कुईं खुदाई का काम करने वाले जहां खुदाई के काम में प्रशासन का सहयोग कर रहे थे, वहीं ग्रामीण वहां राहत और बचाव कार्य में जुटे थे। वहां हर व्यक्ति के खाने-पीने और चाय की व्यवस्था गांव के लोगों ने की थी।
हर ग्रामीण की जुबां पर नदीम के सकुशल आने की बात
बोरवेल में गिरने वाला बच्चा नदीम अल्पसंख्यक समुदाय से संबंध रखता है, फिर भी ग्रामीणों ने 48 घंटे तक सहयोग और बचाव कार्य में जुटकर समाज में अनूठा उदाहरण पेश किया। इस दौरान ग्रामीणों के मुंह से केवल यही सुनने को मिल रहा था कि नदीम सकुशल बाहर आ जाए। गांव की महिलाएं तीन दिन से नदीम की मां गुलशन के पास बैठी रहीं। नदीम के पिता आजम और दादा मोहम्मद को भी ग्रामीणों ने अकेला नहीं छोड़ा और उनके साथ रहे।
ग्रामीणों ने संभाली खाने की जिम्मेदारी
ग्रामीणों के भाईचारे की एक मिसाल यह भी देखने को मिली कि गांव के राजकुमार, जगमहेंद्र जांगड़ा, आजाद सिंह, रमेश जांगड़ा, राकेश, मनजीत की टीम चाय और खाने-पीने की जिम्मेदारी संभाले हुए थी। इसके अलावा गांव से कोई रोटी लेकर पहुंच रहा था तो कोई सब्जी बनाकर ला रहा था। कोई चीनी और चाय पत्ती पहुंचा रहा था, कोई दूध लेकर आ रहा था। घटनास्थल पर मौजूद हर व्यक्ति के लिए ग्रामीणों के सहयोग से 24 घंटे चाय और खाने-पीने का इंतजाम किया गया था।
मेजर सुमित चड्ढा नदीम को लेकर आए बाहर
एनडीआरएफ के डिप्टी कमांडेंट रविंद्र कुस्बा के नेतृत्व में ये पूरा ऑपरेशन चला, जिसमें सेना के जवानों, एनडीआरएफ की दोनों टीम, प्रशासनिक अधिकारियों, हिसार पुलिस के जवानों के साथ-साथ ग्रामीणों का सहयोग रहा। अभियान के अंतिम चरण में मेजर सुमित तिवारी ने मिट्टी हटाई और नदीम तक पहुंचने का रास्ता बनाया। नदीम के दिखाई देने के बाद मेजर सुमित चड्ढा ने हाथ आगे बढ़ाकर बच्चे को कपड़े में ढक कर सकुशल बाहर निकाला।
बाहर आते ही लगे सेना के जयकारे
जैसे ही सेना और एनडीआरएफ के जवान नदीम को कपड़े में ढक कर बाहर लाए तो करीब दो हजार की संख्या में मौजूद ग्रामीणों ने खुशी में सेना के जयकारे लगाने शुरू कर दिए। बच्चे को एंबुलेंस तक पहुंचाने के बाद ग्रामीणों ने मेजर सुमित चड्ढा को सिर पर उठा लिया तथा जोर-जोर से सेना के जयकारे लगाने लगे।
बच्चा निकलने के बाद ये बोली दादी जरीना
नदीम के बोरवेल में गिरने के बाद उसके बचने की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी। प्रसाशन के मौके पर पहुंचने के बाद बचाव की उम्मीदें जगीं। लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा था, उसी प्रकार हमारी सांसें फूल रही थीं और किसी अनहोनी की आशंका से हमारा दिल बैठा जा रहा था। पूरा गांव हमारा परिवार है और किसी ने भी अब तक होली नहीं मनाई थी। (बच्चे के निकलने के बाद जरीना ने 48 घंटे बाद केवल चाय पी है।) -जरीना, नदीम की दादी
अटकी रहीं सांसें, देने लगा था दो हजार ग्रामीणों का धैर्य जवाब
मासूम नदीम को बाहर निकालने में लगी टीम के साथ ग्रामीण भरपूर सहयोग कर रहे थे। इस दौरान शुक्रवार शाम को 4:10 बजे जब नदीम के बाहर निकलने के लिए हलचल हुई और पुलिस ने लोगों को थोड़ा पीछे हटा दिया तब लोगों के दिल में आस जगी कि अब नदीम को बाहर निकाल लिया जाएगा। इसके बावजूद जब ज्यादा समय लगा तो लोगों का धैर्य जवाब देने लगा था।
इस पूरे अभियान के दौरान सबकी सांसें अटकी हुई थीं। खासतौर पर ग्रामीणों की। हालांकि वे प्रशासन का बराबर सहयोग कर रहे थे, लेकिन काम करते हुए वे यही दुआ कर रहे थे कि नदीम ठीक-ठाक बाहर आ जाए। जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, हर कोई अनहोनी की सोचकर घबरा रहा था। ऐसे में पूरी घटनाक्रम के दौरान तीन बार ऐसा हुआ कि नदीम के 5-10 मिनट में बाहर आने की खबर फैलती और उसके बाद फिर से अभियान में किसी न किसी कारण से कई घंटे लगने की बात सामने आती तो ग्रामीणों में मायूसी छा जाती।
ऐसे में शुक्रवार शाम को 4:10 बजे जब उसके कुछ ही पल में बाहर आने की बात के बाद भी समय लगा तो करीब दो हजार की संख्या में मौजूद ग्रामीणों का धैर्य जवाब देने लगा। ग्रामीण वहां खड़ी जेसीबी मशीन, सेना की गाड़ियों के ऊपर चढ़े हुए थे। हालांकि सेना की गाड़ियों से ग्रामीणों को उतार दिया गया, लेकिन वहां खड़ी सभी जेसीबी के ऊपर काफी संख्या में ग्रामीण चढ़े हुए थे। देरी के कारण ग्रामीणों में बेचैनी बढ़ने लगी थी और प्रशासनिक अधिकारी किसी तरह उन्हें शांति बनाए रखने के लिए बार-बार आग्रह कर रहे थे।