भाई की साइकिल तोड़ छात्र ने बना दी 'हाइब्रिड साइकिल', कहानी भी प्रेरणादायक, जानें खूबियां
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गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय के मेकैनिकल में बीटेक द्वितीय वर्ष के जिस छात्र ने अपने भाई की साइकिल को तोड़कर उसे हाइब्रिड इलेक्ट्रॉनिक साइकिल बना दिया था, उसी आशीष कुमार के सुपर इलेक्ट्रॉनिक साइकिल बनाने के प्रोजेक्ट का चयन राष्ट्रीय स्तर पर हुआ है। देश के मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय के इनोवेशन सेल की तरफ से उन्हें राष्ट्रीय स्तर के बूट कैंप एवं प्रदर्शनी के लिए आमंत्रित किया गया है।
गुजवि के विद्यार्थी आशीष ने 10वीं कक्षा में इलेक्ट्रॉनिक साइकिल बना ली थी, जिसे विश्वविद्यालय में दाखिले के बाद उसे और बेहतर बनाया। आशीष की यह साइकिल अब 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ती है।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय के इनोवेशन सेल की तरफ से राष्ट्रीय स्तर के बूट कैंप एवं प्रदर्शनी के लिए देशभर के 43 विद्यार्थियों के प्रोजेक्ट को चयनित किया था। इनमें हरियाणा के गुजवि के विद्यार्थी आशीष कुमार शामिल हैं। उनका यह प्रोजेक्ट जिला और प्रदेश स्तर पर हुई प्रदर्शनी में चयनित होकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा है।
प्रदर्शनी के तहत सोमवार को आशीष ने दिल्ली में आयोजित एक सेमिनार में हिस्सा लिया और प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने पर चर्चा की। आशीष के प्रोजेक्ट को उन 23 प्रोजेक्ट में भी शामिल किया गया है, जिसे विश्वविद्यालय के पंडित दीनदयाल इनोवेशन सेंटर की तरफ से चयनित किया गया था।
ऐसी है आशीष की हाइब्रिड इलेक्ट्रॉनिक साइकिल
आशीष के अनुसार उसकी हाइब्रिड साइकिल की रफ्तार 60 किलोमीटर प्रति घंटा है। इस साइकिल में बाइक की तरह रेस, मीटर, इंडीकेटर, ब्रेक आदि के साथ संतुलन पर भी खास ध्यान दिया गया है। इसकी बैटरी को एक बार चार्ज करने के बाद यह साइकिल 60 किलोमीटर तक चल सकती है। दावा है कि इस तरह के संसाधनों में यह दुनिया की सबसे तेज चलने वाली साइकिल है।
जानिए संघर्ष से कैसे पाई सफलता
- जीजेयू में बीटेक मेकैनिकल द्वितीय वर्ष के छात्र आशीष ने 8वीं कक्षा में अपनी साइकिल पर मोटर लगाकर उसे इलेक्ट्रॉनिक बनाने का प्रयास किया, लेकिन प्रयोग कामयाब नहीं हुआ।
- 10वीं के बाद कोचिंग के लिए गांव से हिसार आया तो भाई की साइकिल साथ ले आया। ऑटो मार्केट में एक दुकान पर ले गया और अपनी इच्छा अनुसार पूरी साइकिल खोलकर दोबारा अपने हिसाब से बनाई। पैसे खत्म हो गए तो काम रुक गया।
- तीन महीने बीते थे कि बड़े भाई को साइकिल की जरूरत पड़ी। उन्होंने वापस मांग ली। साइकिल फिर पहले वैसी बनाकर भाई को लौटा दी, लेकिन साइकिल के पुर्जे खोले जाने का पता भाई को लगा तो जमकर डांट पड़ी।
- भविष्य को ध्यान में रख आशीष ने दो साल तक बचत की और करीब 24 हजार रुपये बचाए।
- पिछले वर्ष गुरु जंभेश्वर विश्वविद्यालय में बीटेक मेकैनिकल में दाखिला ले लिया और एक बार फिर अपने भाई की साइकिल ले आया। ऑटो मार्केट गया और साइकिल पर दोबारा काम शुरू किया। सामान की जरूरत पड़ी तो दिल्ली की कई मार्केट में घूमा और सामान खरीदा। करीब आठ महीने में आशीष ने एक ऐसी साइकिल बना ली, जो 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ती है।
अब अगला कदम
गांव मोहब्बतपुर निवासी आशीष के अनुसार वह अपनी साइकिल को ऐसी बनाना चाहता है कि पैडल मारने से बैटरी भी चार्ज हो। इसके लिए एक प्रोजेक्ट की योजना बना रखी है, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण इस पर काम नहीं हो पाया। उसे अब उम्मीद जगी है कि वह अपने प्रोजेक्ट पर आगे काम कर पाएगा।