जानिए, पंजाब के बढ़े मतदान के क्या हैं मायने
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पंजाब में लोकसभा चुनाव के दौरान मतदान के नया रिकॉर्ड बनाते ही विचार-विमर्श शुरू हो गया है कि आखिर जनता ने पिछले आम चुनाव से अधिक वोट देकर किसे फतवा दिया है।
पंजाब का इतिहास है कि मतदान का बढ़ना अधिकतर मौकों पर शिअद और इसकी सहयोगी पार्टियों के पक्ष में गया है। केवल 2009 के लोकसभा चुनाव में मतदान बढ़ने का फायदा कांग्रेस को मिला। उस चुनाव में कांग्रेस पंजाब की 13 में से 8 सीटें जीतने में कामयाब हुई थी, जबकि शिअद को 4 और भाजपा को एक सीट से संतोष करना पड़ा था।
वहीं, 1977 से अब तक हुए विधानसभा चुनाव में जब भी मतदान बढ़ा, कांग्रेस के खिलाफ गया। 1977 से 2012 तक 10 लोकसभा और 8 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। इनके मत प्रतिशत से संबंधित आंकड़ों पर नजर दौड़ाएं तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो जाती है।
उल्लेखनीय है कि पिछले आम चुनाव में मत प्रतिशत 70.04 फीसदी था, जो इस बार बढ़कर करीब 71 फीसदी हो गया है। अभी इसमें और इजाफे की संभावना सीईओ वीके सिंह ने व्यक्त की है।
हर बार बढ़ा है मतदान का प्रतिशत
1977 के लोकसभा चुनाव में 70.14 फीसदी मतदान हुआ और प्रदेश में अकाली दल-बीएलडी को जबरदस्त सफलता मिली। 1980 में मतदान का प्रतिशत कम होकर 62.65 रह गया और कांग्रेस ने लगभग क्लीन स्वीप किया। 1985 में मतदान प्रतिशत बढ़कर 67.36 फीसदी हुआ और शिअद को कांग्रेस के मुकाबले एक सीट अधिक मिली।
1989 में शिअद (बादल) के बहिष्कार के बीच 62.67 फीसदी लोगों ने मतदान किया, तो अकाली दल मान ने 6 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को केवल 2 सीटों पर जीत हासिल हुई। 1992 में एक बार फिर शिअद (बादल) ने चुनाव प्रक्रिया का बायकॉट किया तथा 23.96 फीसदी मतदान के बीच कांग्रेस 13 में से 12 सीटों पर जीत गई।
1996 में मतदान प्रतिशत बढ़कर 62.25 फीसदी हो गया तथा शिअद-बसपा गठबंधन ने 11 सीटें जीतीं। 1998, 1999 तथा 2004 में अकाली-भाजपा गठबंधन ने कांग्रेस को लगातार शिकस्त दी। इस दौरान मत प्रतिशत क्रमश: 60.07, 56.11 और 61.59 फीसदी रहा।
यानी इसके घटने-बढ़ने का कोई ज्यादा असर अकाली-भाजपा गठबंधन पर नहीं पड़ा। फिर 2009 में मतदान के बढ़कर 70.04 फीसदी होने का फायदा जरूर कांग्रेस को मिला और यह 8-5 के अंतर से शिअद-भाजपा गठबंधन से आगे रही।
किसे मिलेगा बढ़े हुए मतदान का फायदा
बात विधानसभा चुनाव की करें तो अधिक मत प्रतिशत हमेशा ही कांग्रेस का सिरदर्द साबित हुआ। 1977 में 65.37 फीसदी मतदान हुआ और अकाली-जनता गठबंधन को जीत मिली। 1980 में मतदान कम होकर 64.33 फीसदी रह गया तथा सरकार कांग्रेस की बनी। 1985 में मतदान प्रतिशत बढ़कर 67.53 फीसदी हुआ और शिअद की सरकार बन गई।
1992 में शिअद (बादल) के बहिष्कार के बीच हुए 23.82 फीसदी मतदान ने कांग्रेस की सरकार बनवा दी। 1997 में मतदान बढ़कर 68.73 फीसदी पहुंचा और अकाली-भाजपा गठबंधन को जबरदस्त सफलता मिली। 2002 में मतदान फिर गिरा और 65.14 फीसदी पोलिंग के बीच कांग्रेस को बहुमत मिला। 2007 में मतदान बढ़कर 75.45 फीसदी हुआ और सरकार अकाली-भाजपा गठबंधन की बन गई।
2012 में मतदान प्रतिशत बढ़कर 78.20 फीसदी पर पहुंचते ही इतिहास बना और अकाली-भाजपा गठबंधन लगातार दूसरी बार पंजाब की सत्ता पर काबिज हुआ। अब देखना है कि 2009 तथा 2014 के लोकसभा चुनाव के बीच बढ़ा 3 फीसदी मतदान किसे फायदा देता है। ट्रैक रिकॉर्ड के मुताबिक अकाली-भाजपा गठबंधन को फायदा मिलता है या फिर 2009 की तरह कांग्रेस लाभ की स्थिति में रहती है।