भारत का वो गांव, जो आजादी के 24 साल बाद तक पाकिस्तान में था
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सरहदें अच्छी भी होती हैं और खराब भी। अच्छी इसलिए की सरहदें किसी मुल्क को उसके वजूद का अहसास दिलाती हैं। खराब इसलिए कि ये लोगों को एक दूसरे से जुदा कर देती हैं। सरहदें बनने का दर्द भारत से बेहतर और कौन जान सकता है। सरहद ने एक ही मुल्क के लोगों को एक दूसरे के लिए बेगाना बना दिया। जहां बंटवारे की लाइन खींची गई, वहां के आधे लोग एक तरफ और आधे लोग दूसरी तरफ के हो गए। सब हिंदुस्तानी से भारतीय और पाकिस्तानी हो गए।
बंटवारे की इस लड़ाई में सरहद के पास ऐसे बहुत से इलाके थे जिन पर दोनों मुल्क अपना अपना दावा ठोंक रहे थे। ऐसे ही इलाकों में से एक था जम्मू-कश्मीर के बाल्टिस्तान इलाके का तुरतुक गांव। बंटवारे के वक्त ये पाकिस्तान में था। चूंकि ये गांव दोनों मुल्कों की सरहदों के बीच स्थित था, लिहाजा यहां बाहरी लोगों के आने पर पाबंदी थी। यहां के लोग बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे हुए थे। 1971 की लड़ाई में जब पाकिस्तान को मुंह की खानी पड़ी, तो तुरतुक भी उसके हाथ से निकल कर भारत में शामिल हो गया।
भारत और पाकिस्तान में खींचतान
जम्मू-कश्मीर की नई सरहदें बनने से पहले बाल्टिस्तान एक अलग राज्य होता था। सोलहवीं सदी तक यहां तुर्किस्तान के यागबू वंश के शासकों ने राज किया था। ये शासक मध्य एशिया से आए थे और 800 से लेकर 1600 ईस्वी तक इन्होंने यहां राज किया। बाल्टिस्तान के यागबू राजों के राज में कला और साहित्य को खूब बढ़ावा मिला। इनकी कुछ इमारतें तुरतुक गांव में भी हैं, जिन्हें आज म्यूजियम की शक्ल दे दी गई है। तुरतुक राजाओं के वंशज आज भी तुरतुक को अपना घर मानते हैं।
भारत और पाकिस्तान के बीच खींचतान का शिकार रहा तुरतुक बरसों तक बेरुखी का शिकार रहा। किसी ने यहां की कुदरती खूबसरती, यहां की सांस्कृतिक विरासत और सबसे अहम यहां के लोगों के बारे में सोचा ही नहीं। ये इलाका कराकोरम पहाड़ों से घिरा हुआ है। दूर-दूर तक जहां देखिए पहाड़ ही पहाड़ नजर आते हैं।
एक दौर में ये इलाका मशहूर सिल्क रोड से जुड़ा हुआ था। यहां से भारत, चीन, रोम और फारस तक व्यापार होता था। तुरतुक गांव बौद्धों के गढ़ लद्दाख में है, लेकिन यहां कि ज्यादातर आबादी मुसलमानों की है। इन लोगों पर तिब्बत और बौद्धों का गहरा प्रभाव है। माना जाता है कि ये सभी इंडो-आर्यनों के वंशज हैं। मूल रूप से ये लोग बाल्टी भाषा बोलते हैं, लेकिन इनका खानपान और संस्कृति साझा है।
तरक्की नहीं हो पाई है यहां
चूंकि ये इलाका सरहद की उलझन में उलझा रहा, लिहाजा यहां तरक्की भी बहुत कम या ना के बराबर हुई है। यहां तक कि सड़क जैसी बुनियादी सहूलतें भी नसीब नहीं हैं। सड़कों की चौड़ाई इतनी भर ही है कि अगर आपकी गाड़ी के बराबर से कोई गुजर जाए तो गाड़ी को नुकसान पहुंचना तय है। गाड़ी के अंदर बैठ कर भी आप हिचकोले ही खाते रहेंगे, लेकिन जब यहां की खूबसूरती को देखेंगे तो ये मुश्किलें आप पल भर में भूल जाएंगे।
देश के एक छोर पर बसे तुरतुक गांव के लोगों की जिंदगी बहुत सादी है। लोग छोटा-मोटा कारोबार करके अपना गुजारा करते हैं। बिजली भी यहां नाम मात्र ही आती है। मगर, कुदरत ने इस गांव को अपनी नेमतों से मालामाल किया है। जंगल, पहाड़, नदियां और खूबसूरत नजारे यहां खूब हैं।
तुरतुक के पास से ही श्योक नदी बहती है। सिल्क रोड के जमाने में इसे डेथ रिवर के नाम से भी जाना जाता था। यहां के लोग जौ की खेती करते हैं। तुरतुक गांव में बमुश्किल तीन सौ घर होंगे। जरा सोच कर देखिए कितना हसीन लगता होगा वो मंजर जब आप इन पहाड़ियों के ऊपर से गांव को देखते होंगे। सादगी से बने हुए घर, उनके पास जौ के खेत और खुबानी के पेड़। पास ही बहती हुई नदी। कुदरती खूबसूरती से लबरेज है तुरतुक।
बना भारत का हिस्सा
भारत को आजादी 70 साल पहले नसीब हुई थी, लेकिन तुरतुक 1971 में ही भारत का हिस्सा बन पाया था। भारत में शामिल होने के बाद यहां कुछ सड़कें, स्कूल और अस्पताल बनाए गए हैं, लेकिन वो अभी नाकाफी हैं। अब्दुल करीम हशमत नाम के बुजुर्ग ने यहां एक गेस्ट हाउस खोला है। वो 40 साल पहले पाकिस्तान से यहां आए थे। वो तुरतुक के पहले प्राइमरी स्कूल में गणित के उस्ताद थे।
हशमत बताते हैं पहले पहल यहां के लोग भारत में आने से डरते थे, लेकिन 1971 की लड़ाई के दौरान भारतीय फौज के कर्नल रिनचेन इस गांव पहुंचे। उन्होंने तुरतुक के लोगों को समझाया कि डरने की कोई बात नहीं। कर्नल रिनचेन पास के ही गांव के रहने वाले थे। उनके ऊपर तुरतुक के लोगों का भरोसा था। इसीलिए जब कर्नल रिनचेन ने समझाया तो तुरतुक के लोग भारत का हिस्सा बनने को राजी हो गए।
बंटवारे के वक्त औरतों और बच्चों ने तुरतुक की मस्जिदों में पनाह ली थी। जब उन सभी को कर्नल ने समझाया तो वो सब खुश हो गए। यहां के लोगों ने नाच गा कर भारतीय सेना का स्वागत किया और उन्हें ताजा खुबानियों का नजराना पेश किया।
आधे हिंदुस्तानी, आधे पाकिस्तानी
1971 से पहले तुरतुक गांव के बहुत से लोग पाकिस्तान में पढ़ाई कर रहे थे या बहुत से लोग वहां कारोबार कर रहे थे, लेकिन जब तुरतुक भारत का हिस्सा बना तो वो लोग वहीं फंस कर रह गए। एक ही परिवार के आधे लोग हिंदुस्तान आ गए और आधे लोग पाकिस्तान में ही रह गए। हालांकि भारत की सरकार ने ऐसे परिवारों के लिए रास्ता आसान बना दिया है। वीजा लेकर लोग पाकिस्तान जा सकते हैं और अपने रिश्तेदारों से मुलाकात कर सकते हैं, लेकिन इस सब में एक तो पैसा बहुत खर्च होता है और कागजी कार्रवाई भी बहुत ज्यादा होती है।
यहां न तो किसी के पास मोबाइल फोन है और न ही सोशल मीडिया तक पहुंच है। लोग पेन ड्राइव में अपने वीडियो खत बनाकर एक-दूसरे को भेजते हैं। इन रिकॉर्डेड मैसेज के जरिए लोग बात तो कर लेते हैं, लेकिन एक दूसरे से मिलने की तड़प हमेशा बनी रहती है। लोग एक दूसरे के वीडियो मैसेज देखकर ही भावुक हो उठते हैं। जुदाई के दर्द की शिद्दत को शायद वही लोग महसूस कर पाते हैं जो कभी किसी अपने से बिछड़े होते हैं।
एक दौर था जब तुरतुक के लोग कहीं नहीं जाते थे, न ही यहां कोई आता था। लेकिन अब तुरतुक सैलानियों कि पहली पसंद बन चुका है। दूर-दूर से लोग यहां सुकून के कुछ पल गुजारने आते हैं। अगर देखा जाए तो यहां की बौद्ध-मुस्लिम संस्कृति ने पहले ही कभी किसी सरहद को नहीं माना था। ये तो सियासी झगड़ों ने दीवारें खींच दी थीं। बहरहाल अब तुरतुक भारत का हिस्सा है और यहां की खूबसूरती बेमिसाल है।