अपनी पसंद के पालतू जानवर के साथ हम एक अलग तरह का भावनात्मक रिश्ता बना लेते हैं। आप कुत्ते के साथ बातें करते हैं, हैम्स्टर के साथ खेलते हैं और अपने पैराकीट (तोते) को वे रहस्य भी बताते हैं जो आप किसी और को नहीं बताते। कभी-कभी आपको शक भी होता है कि ऐसा करने का कोई तुक नहीं है, लेकिन आपके अंदर यह उम्मीद बनती है कि आपका प्यारा जानवर आपको समझता है। लेकिन जानवर क्या और कितना समझते हैं?
आखिर इंसानों में कैसे विकसित हुई हंसने की कला, क्या जानवर भी खिलखिलाते हैं?
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हम क्यों हंसते हैं?
क्या कुत्ते या बिल्ली या कोई भी जानवर उसी तरह हंसते हैं जैसे हम हंसते हैं? इंसान ने हंसने की कला किस वजह से विकसित की, यह एक रहस्य है। धरती पर मौजूद हर शख्स चाहे वह जो भी भाषा बोलता हो वह हंसना जानता है। हम अवचेतन में ऐसा करते हैं। हंसी हमारे अंदर से निकलती है। हमें इसके लिए कोई विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता।
हंसना संक्रामक है। एक व्यक्ति हंसे तो दूसरा भी मुस्कुरा देता है। यह सामाजिक है। हम बोलना सीखने से पहले हंसना सीख लेते हैं। ऐसा माना गया कि हंसी से दो या दो से अधिक व्यक्तियों के बीच संबंध का आधार तैयार होता है। एक दूसरा सिद्धांत कहता है कि इसकी शुरुआत अचानक हो रही किसी घटना के बारे में चेतावनी देने के लिए हुई थी, जैसे कोई बाघ आ जाए। तो भले ही हमें यह मालूम नहीं कि हम क्यों हंसते हैं, मगर हम सब जानते हैं कि हम ऐसा करते हैं। लेकिन क्या जानवर भी खिलखिलाते हैं और अगर नहीं तो क्यों नहीं?
गुस्ताख बंदर
जानवरों में चिंपाजी, गोरिल्ला, बोनोबो और ओरांग-ऊटान हम इंसानों के सबसे करीबी संबंधी हैं। वे दौड़ने-पकड़ने के खेल में खुश होने पर या गुदगुदाने पर खिलखिलाते हैं। वे हांफने जैसी आवाज निकालकर खुशी जाहिर करते हैं। दिलचस्प है कि चिंपाजी की तरह जो एप्स इंसानों से ज्यादा निकटता से जुड़े हुए हैं उनकी आवाज हमारी हंसी के ज्यादा करीब होती है।
ओरांग-ऊटान जैसे हमारे दूर के करीबियों की प्रफुल्लित आवाजें हमसे बहुत कम मिलती हैं। ऐसी आवाजें उस वक्त ज्यादा निकलती हैं जब उनको गुदगुदी जैसी कोई उत्तेजना कराई जाती है। इससे संकेत मिलता है कि हंसी हमारे बोलने से पहले विकसित हुई थी। सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल करने वाली मादा गोरिल्ला कोको ने एक बार अपने कीपर के जूतों के फीते आपस में बांध दिए और फिर इशारा किया कि अब मुझे पकड़कर दिखाओ। इससे उसके मजाक करने की क्षमता का पता चलता है।
कौए की कांव-कांव
पशुओं की एकदम अलग शाखा जैसे परिंदों के बारे में क्या है? आवाज की नकल उतारने वाले कुछ चालाक पक्षियों जैसे मैना और काकातुआ (कलगी वाला तोता) को इंसानी हंसी की भी नकल उतारते देखा गया है। कुछ तोते दूसरे जानवरों को चिढ़ाने के लिए भी कुछ आवाजें निकालते हैं। एक तोता परिवार के पालतू कुत्ते को परेशान करने के लिए सीटी बजाता है, सिर्फ अपने मनोरंजन के लिए।
कौए और उस परिवार के दूसरे पक्षी भोजन का पता लगाने के लिए कई तरकीबें लगाते हैं। यहां तक कि वे शिकारी मांसाहारी जानवरों की पूंछ भी खींचते हैं। पहले माना जाता था कि वे शिकारी जानवरों का ध्यान भटकाने के लिए ऐसा करते हैं ताकि वे भोजन चुरा सकें, लेकिन अब ऐसा भी देखा गया है कि जब कोई खाना मौजूद ना हो तब भी वे ऐसा करते हैं। इससे लगता है कि ये परिंदे सिर्फ मजे के लिए ऐसा करते हैं। तो यह मुमकिन है कि कुछ पक्षियों में सेंस ऑफ ह्यूमर हो। वे हंसते भी हों लेकिन हम अभी तक इसे पहचान नहीं पाए हों।
जानवरों का मजाक
कुछ अन्य जीवों को भी हंसने के लिए जाना जाता है, जैसे कि चूहे। संवेदनशील जगहों जैसे गर्दन के पास गुदगुदाने पर वे चीं-चीं की आवाज निकालते हैं। खेल-खेल में झगड़ते हुए डॉल्फिन भी कुछ आवाज निकालती हैं। इससे वे संकेत देती हैं कि उनके आसपास जो मौजूद हैं उनसे कोई खतरा नहीं है। हाथी मस्ती में होने पर अक्सर चिंघाड़ते हैं, लेकिन यह साबित करना लगभग नामुमकिन है कि उनका व्यवहार इंसानों के हास्य की तरह है या विशेष परिस्थितियों में दूसरे जानवर जैसी आवाजें निकालते हैं ये भी वैसा ही कुछ करते हैं।