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Bihar News: SC ने सिन्हा लाइब्रेरी अधिनियम को किया खारिज, ट्रस्ट को वापस मिली प्रबंधन की जिम्मेदारी
Wed, 11 Mar 2026 10:25 PM IST
Ashutosh Pratap Singh
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
Published by: Ashutosh Pratap Singh
Updated Wed, 11 Mar 2026 10:25 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार के 2015 के अधिनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया, जिसके तहत राज्य सरकार को पटना की विरासत ‘सिन्हा लाइब्रेरी’ का अधिग्रहण करने का अधिकार था।
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर)
- फोटो : ANI
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार के एक विरासत लाइब्रेरी अधिग्रहण कानून को असंवैधानिक घोषित करते हुए खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस अधिनियम में एक रुपये जैसी "प्रतीकात्मक" मुआवजे की व्यवस्था केवल दिखावा है और इसमें न्यायसंगत प्रक्रिया के मूल तत्व ही नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पटना उच्च न्यायालय के 2024 के आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें पहले राज्य सरकार के लाइब्रेरी अधिग्रहण को सही ठहराया गया था। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा, “श्रीमती राधिका सिन्हा इंस्टिट्यूट और सच्चिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी (रिक्विजिशन एंड मैनेजमेंट) एक्ट, 2015 असंवैधानिक घोषित किया जाता है और इसे निरस्त किया जाता है।” कोर्ट ने निर्देश दिया कि लाइब्रेरी का प्रबंधन और प्रशासन मूल ट्रस्ट को वापस किया जाए।
लाइब्रेरी का महत्व
बिहार की राजधानी पटना के बीचोंबीच स्थित यह दो-मंजिला इमारत आमतौर पर 'सिन्हा लाइब्रेरी' के नाम से जानी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने ट्रस्ट या उसके सदस्यों को किसी भी आरोप जैसे कि प्रबंधन की कमी, वित्तीय अनियमितता या ट्रस्ट के उद्देश्य में विफलता की जानकारी नहीं दी थी। कोर्ट ने अधिनियम की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें सेक्शन 7 राज्य को अधिकतम केवल एक रुपये का मुआवजा देने का अधिकार देता है, जो अधिनियम की मनमानी प्रवृत्ति को और बढ़ाता है। कोर्ट ने कहा कि यह राशि केवल “प्रतीकात्मक और भ्रमपूर्ण” है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति को कानून के माध्यम से हटा सकते हैं, लेकिन ऐसा कानून न्यायसंगत, उचित और संतुलित होना चाहिए, न कि मनमाना या जबरन हड़पने वाला। अधिनियम संपत्ति के हस्तांतरण को जबरन और असंवैधानिक बनाता है और अनुच्छेद 14 (कानून के सामने समानता) का उल्लंघन करता है।
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अधिनियम के उद्देश्य और निष्पादन में असंगति
कोर्ट ने कहा, “इस अधिनियम के माध्यम से दी गई शक्ति अत्यधिक, बिना तर्क और अपेक्षित उद्देश्य के अनुपात में असंगत है। इसलिए यह अधिनियम स्पष्ट रूप से मनमाना है और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।”
लाइब्रेरी की स्थापना और इतिहास
सच्चिदानंद सिन्हा द्वारा स्थापित इस लाइब्रेरी का उद्घाटन 9 फरवरी 1924 को बिहार और उड़ीसा के तत्कालीन गवर्नर सर हेनरी व्हीलर ने किया था। इसे आधिकारिक रूप से 'श्रीमती राधिका सिन्हा इंस्टिट्यूट और सच्चिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी' के नाम से जाना जाता है, लेकिन आम तौर पर इसे 'सिन्हा लाइब्रेरी' कहा जाता था। संस्थान का नाम सिन्हा की पत्नी के नाम पर रखा गया था। सच्चिदानंद सिन्हा, आधुनिक बिहार के प्रमुख निर्माताओं में से एक, 1946 में दिल्ली में पहली बार हुई संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष भी रहे। अधिनियम से पहले यह संस्थान श्रीमती राधिका सिन्हा इंस्टिट्यूट और सच्चिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी ट्रस्ट द्वारा संचालित किया जाता था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब लाइब्रेरी का प्रबंधन और प्रशासन मूल ट्रस्ट के पास लौटाया जाएगा।
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लाइब्रेरी का महत्व
बिहार की राजधानी पटना के बीचोंबीच स्थित यह दो-मंजिला इमारत आमतौर पर 'सिन्हा लाइब्रेरी' के नाम से जानी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने ट्रस्ट या उसके सदस्यों को किसी भी आरोप जैसे कि प्रबंधन की कमी, वित्तीय अनियमितता या ट्रस्ट के उद्देश्य में विफलता की जानकारी नहीं दी थी। कोर्ट ने अधिनियम की आलोचना करते हुए कहा कि इसमें सेक्शन 7 राज्य को अधिकतम केवल एक रुपये का मुआवजा देने का अधिकार देता है, जो अधिनियम की मनमानी प्रवृत्ति को और बढ़ाता है। कोर्ट ने कहा कि यह राशि केवल “प्रतीकात्मक और भ्रमपूर्ण” है।
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति को कानून के माध्यम से हटा सकते हैं, लेकिन ऐसा कानून न्यायसंगत, उचित और संतुलित होना चाहिए, न कि मनमाना या जबरन हड़पने वाला। अधिनियम संपत्ति के हस्तांतरण को जबरन और असंवैधानिक बनाता है और अनुच्छेद 14 (कानून के सामने समानता) का उल्लंघन करता है।
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अधिनियम के उद्देश्य और निष्पादन में असंगति
कोर्ट ने कहा, “इस अधिनियम के माध्यम से दी गई शक्ति अत्यधिक, बिना तर्क और अपेक्षित उद्देश्य के अनुपात में असंगत है। इसलिए यह अधिनियम स्पष्ट रूप से मनमाना है और अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है।”
लाइब्रेरी की स्थापना और इतिहास
सच्चिदानंद सिन्हा द्वारा स्थापित इस लाइब्रेरी का उद्घाटन 9 फरवरी 1924 को बिहार और उड़ीसा के तत्कालीन गवर्नर सर हेनरी व्हीलर ने किया था। इसे आधिकारिक रूप से 'श्रीमती राधिका सिन्हा इंस्टिट्यूट और सच्चिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी' के नाम से जाना जाता है, लेकिन आम तौर पर इसे 'सिन्हा लाइब्रेरी' कहा जाता था। संस्थान का नाम सिन्हा की पत्नी के नाम पर रखा गया था। सच्चिदानंद सिन्हा, आधुनिक बिहार के प्रमुख निर्माताओं में से एक, 1946 में दिल्ली में पहली बार हुई संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष भी रहे। अधिनियम से पहले यह संस्थान श्रीमती राधिका सिन्हा इंस्टिट्यूट और सच्चिदानंद सिन्हा लाइब्रेरी ट्रस्ट द्वारा संचालित किया जाता था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब लाइब्रेरी का प्रबंधन और प्रशासन मूल ट्रस्ट के पास लौटाया जाएगा।