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Bihar: मघड़ा में उमड़ेगा आस्था का सैलाब, मां शीतला के दरबार में तीन दिवसीय शीतलाष्टमी मेला आज से; जानें

Mon, 09 Mar 2026 10:04 AM IST
पटना ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नालंदा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नालंदा Published by: पटना ब्यूरो Updated Mon, 09 Mar 2026 10:04 AM IST
सार

बिहारशरीफ के पास मघड़ा गांव स्थित प्राचीन सिद्धपीठ मां शीतला मंदिर में मंगलवार से तीन दिवसीय शीतलाष्टमी मेला शुरू होगा। देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचेंगे। बसियौरा पूजा की परंपरा निभाई जाएगी, वहीं प्रशासन ने सीसीटीवी, मेडिकल कैंप और सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं।

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Nalanda news Sheetla Ashtami fair to begin tomorrow in Nalanda, CCTV surveillance to be conducted
मां शीतला देवी का मंदिर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

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बिहारशरीफ मुख्यालय से महज 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ऐतिहासिक मघड़ा ग्राम में आस्था का सैलाब उमड़ने को तैयार है। पंचाने नदी के पश्चिमी तट पर स्थित प्राचीन सिद्धपीठ मां शीतला के दरबार में मंगलवार से तीन दिवसीय वार्षिक शीतलाष्टमी मेले का भव्य आगाज होगा। चैत्र कृष्ण सप्तमी से शुरू होने वाले इस मेले को लेकर न केवल बिहार, बल्कि उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और उत्तराखंड सहित कई राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी श्रद्धालुओं के जत्थे मघड़ा पहुंचने लगे हैं।

इतिहास की परतों में मघड़ा का महत्व
इस मंदिर की प्राचीनता का उल्लेख चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों में भी मिलता है। मंदिर के पुजारी मिथलेश कुमार मिश्रा बताते हैं कि जब ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे थे, तब वे बड़ी पहाड़ी स्थित पुस्तकालय से विश्वविद्यालय जाने के दौरान इसी स्थान पर नीम और पीपल के वृक्षों की छांव में विश्राम किया करते थे। उन्होंने अपने लेखन में इस देवी स्थान का विशेष उल्लेख किया है।

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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने माता सती के शरीर के खंड किए थे, तब महादेव ने सती के अवशेषों को एक ‘मघ’ (घड़े) में रखकर इसी पावन धरती पर छिपा दिया था। इसी कारण इस गांव का नाम मघड़ा पड़ा। कालांतर में राजा वृषकेतु को माता ने स्वप्न में दर्शन दिए, जिसके बाद खुदाई के दौरान मां की प्रतिमा प्राप्त हुई।
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अनोखी परंपरा: ‘मिट्ठी कुआं’ के जल से बनता है बसियौरा
मघड़ा मंदिर की सबसे विशिष्ट परंपरा ‘बसियौरा’ पूजा है। सप्तमी के दिन श्रद्धालु चने की दाल, चावल और सब्जी का प्रसाद बनाते हैं और अष्टमी के दिन माता को बासी भोग लगाया जाता है। इस दौरान पूरे गांव में चूल्हा नहीं जलता और स्वच्छता का ऐसा नियम है कि घरों में झाड़ू तक नहीं लगाई जाती। प्रसाद बनाने के लिए गांव के ऐतिहासिक ‘मिट्ठी कुआं’ के जल का उपयोग किया जाता है। लोकमान्यता है कि जहां से माता की प्रतिमा प्रकट हुई थी, वही स्थान आज कुएं के रूप में है। इस कुएं का पानी भीषण गर्मी में भी कभी नहीं सूखता।


आरोग्य और मनोकामना की देवी
चेचक (माता) जैसे असाध्य रोगों से मुक्ति के लिए यह सिद्धपीठ पूरे देश में प्रसिद्ध है। श्रद्धालुओं का मानना है कि माता के दरबार का जल और भभूत लगाने से चर्म रोगों से राहत मिलती है। मन्नत पूरी होने पर भक्त यहां ‘जीव के बदले जीव’ अर्पित करने की परंपरा के तहत कबूतर सहित अन्य भेंट चढ़ाते हैं।

सुरक्षा के कड़े इंतजाम
मेले की व्यापकता को देखते हुए नगर निगम और जिला प्रशासन ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए हैं। वार्ड पार्षद प्रतिनिधि जयंत शर्मा ने बताया कि इस बार पूरे मेला क्षेत्र को सीसीटीवी कैमरों से लैस किया गया है। मंदिर परिसर में 16 और बाहरी क्षेत्रों में 20 कैमरे लगाए गए हैं, जिनकी मॉनिटरिंग कंट्रोल रूम से की जाएगी। श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए लाइटिंग, पेयजल, मोबाइल शौचालय और मेडिकल कैंप की व्यवस्था की गई है। तालाब में किसी भी अप्रिय घटना से बचाव के लिए SDRF की टीम को भी तैनात किया गया है।

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