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बिहार: आकाश कुमार को पटना हाईकोर्ट से बड़ी राहत, महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय का निष्कासन आदेश रद्द

Thu, 24 Sep 2026 07:16 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: शबाहत हुसैन Updated Thu, 24 Sep 2026 07:16 PM IST
सार

पटना हाईकोर्ट ने महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के मीडिया अध्ययन विभाग के छात्र आकाश कुमार के निष्कासन आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने कार्रवाई को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताया और अनिश्चित निष्कासन को छात्र के लिए ‘शैक्षणिक मौत’ जैसी स्थिति बताया।

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Major relief for Akash Kumar from Patna High Court; Mahatma Gandhi Central University expulsion order quashed
पटना हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

पटना हाईकोर्ट ने महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय के मीडिया अध्ययन विभाग के छात्र आकाश कुमार के निष्कासन के आदेश को रद्द कर दिया है। विश्वविद्यालय ने आकाश को 14 अगस्त 2024 को निष्कासित किया था। न्यायमूर्ति हरीश कुमार की अदालत ने 21 सितंबर 2026 को दिए अपने फैसले में कहा कि अनिश्चित अवधि के लिए किया गया निष्कासन प्रथम दृष्टया विश्वविद्यालय के अधिनियम और अध्यादेश के तहत अधिकृत नहीं था। अदालत ने विश्वविद्यालय की कार्रवाई को निष्पक्षता की कसौटी पर खरा नहीं उतरने वाला बताते हुए इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन माना।

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‘शैक्षणिक मौत’ जैसी स्थिति पर कोर्ट की टिप्पणी
फैसले में हाईकोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के एक पूर्व निर्णय का उल्लेख करते हुए कहा कि अनिश्चित और निर्दिष्ट अवधि के लिए निष्कासन छात्र के लिए ‘शैक्षणिक मौत’ जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। ऐसी कार्रवाई से छात्र की शिक्षा और भविष्य की शैक्षणिक प्रगति पर गंभीर और स्थायी प्रभाव पड़ सकता है। संबंधित निर्णय में भी अनिश्चित अवधि के निष्कासन को कठोर कार्रवाई बताते हुए समानता के प्रश्न पर विचार की बात कही गई थी।
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सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भी कोर्ट ने की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने आकाश कुमार को व्हिसल ब्लोअर मानते हुए सोशल मीडिया पर दिनेश हुड्डा की नियुक्ति और पदोन्नति प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं को लेकर पोस्ट किए गए वीडियो को अनुचित नहीं माना। अदालत के आदेश के अनुसार, नियम विरुद्ध या अवैध नियुक्ति के खिलाफ आवाज उठाना अपने आप में अनुशासनहीनता नहीं माना जा सकता।


पटना हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत कश्यप के अनुसार, उच्च न्यायालय ने अपने लिखित आदेश में कहा कि संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई निष्पक्षता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती और यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का भी स्पष्ट उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि अधिनियम या अध्यादेश के तहत अनिश्चित काल के लिए निष्कासन उचित नहीं है।

अधिवक्ता प्रशांत कश्यप ने बताया कि अदालत ने यह भी कहा कि अनिश्चित काल के लिए निष्कासन जैसी कड़ी सजा देने से पहले याचिकाकर्ता को कोई विशिष्ट कारण बताओ नोटिस और जांच रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई। नोटिस में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि उसके किस आचरण के आधार पर उसे विश्वविद्यालय से निष्कासित किया जा सकता है। अदालत ने इसी आधार पर निष्कासन आदेश को रद्द कर दिया।

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