निधन: बिहार राज्यगीत के रचनाकार कवि सत्यनारायण ने प्राण त्यागे; 74 आंदोलन के प्रखर रचनाओं से बनाई थी पहचान
बिहार राज्यगीत के रचनाकार सत्यनारायण 1974 के जेपी आंदोलन में अपनी प्रभावशाली कविताओं के लिए विशेष रूप से जाने जाते थे। उन्होंने हिंदी और भोजपुरी साहित्य की सात दशकों से अधिक समय तक सेवा की। उनके निधन से साहित्य जगत में शोक की लहर है।
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बिहार राज्यगीत ‘तुझको शत-शत वंदन बिहार’ के रचनाकार और प्रखर कवि सत्यनारायण का शुक्रवार तड़के निधन हो गया। उन्होंने पटना के कदमकुआं स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। वे 91 वर्ष के थे। उनके निधन की खबर से साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई। उनके पार्थिव शरीर को उनके परिजनों और साहित्यकारों ने श्रद्धांजलि दी। उनकी अंत्येष्टि 29 अगस्त, शनिवार को की जाएगी। सत्यनारायण को खास तौर पर 1974 के जेपी आंदोलन के दौरान अपनी कविताओं के जरिए जनचेतना जगाने के लिए याद किया जाता है। उनकी रचनाओं ने आंदोलन के दौरान लोगों में जागरूकता और संघर्ष की भावना पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सामाजिक सरोकार और जनचेतना उनकी रचनाओं की प्रमुख विशेषता रही।
लेखक, लघुकथाकर और प्रखर कवि सत्यनारायण को करीब से जाने वाले ध्रुव कुमार ने कहा कि उनके जाने से बिहार ही नहीं देश को अपूरणीय क्षति हुई है। उनका जन्म भोजपुर में हुआ था जन्म, पटना कॉलेज से शुरू हुआ काव्य सफर सत्यनारायण का जन्म 13 सितंबर 1935 को भोजपुर जिले के कौलोडिहरी गांव में हुआ था। गांव में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद वे 1942 में पटना आए और पटना कॉलेज में दाखिला लिया। इसी दौरान उन्होंने काव्य पाठ प्रतियोगिता में हिस्सा लिया और जयद्रथ वध की पंक्तियों का पाठ कर पुरस्कार हासिल किया।उनके हिंदी शिक्षक डॉ. रामखेलावन पांडे का उन्हें स्नेह और मार्गदर्शन मिला। वहीं कवि रामगोपाल रूद्र से उन्हें तुकबंदी और गीत लेखन की प्रेरणा मिली। सत्यनारायण ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में देशभक्ति के गीतों और कविताओं को भी करीब से महसूस किया।
बच्चन की कविताओं का भी पड़ा प्रभाव
ध्रुव कुमार ने कहा कि कॉलेज के दिनों में उन्हें हरिवंश राय बच्चन को सुनने का अवसर मिला। बच्चन कॉलेज में एक अध्यापक से मिलने पहुंचे थे। छात्रों के आग्रह पर उन्होंने कक्षा में अपनी रचनाएं सुनाईं। बच्चन की कविताओं ने सत्यनारायण के मन पर गहरा प्रभाव छोड़ा और उनकी साहित्यिक यात्रा को आगे बढ़ाने में प्रेरणा दी।
नवगीत और कविता को लेकर रखते थे स्पष्ट विचार
ध्रुव कुमार ने कहा कि सत्यनारायण ने हिंदी कविता, खासकर नवगीत विधा में अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी प्रमुख कृतियों में ‘तुम ना नहीं कर सकते’, ‘टूटते जल बिंब’, ‘सभाध्यक्ष हंस रहा है’, ‘सुने प्रजाजन’ और ‘स्मृतियों में’ शामिल हैं। उन्होंने ‘धरती से जुड़कर’ कविता संग्रह और ‘नुक्कड़ कविता’ पत्रिका का संपादन भी किया। नई कविता, गीत और नवगीत के बीच के विभाजन को लेकर भी उनके विचार स्पष्ट थे। उनका मानना था कि गीत और नवगीत भी कविता का ही हिस्सा हैं। वे कहते थे कि रचना अपने कथ्य के अनुरूप अपना शिल्प गढ़ती है।
सात दशक से अधिक समय तक साहित्य सेवा
लेखक ध्रुव कुमार बताते हैं कि सत्यनारायण ने सात दशकों से अधिक समय तक हिंदी और भोजपुरी साहित्य की सेवा की। उनके साहित्यिक योगदान के लिए बिहार राष्ट्रभाषा परिषद की ओर से विशिष्ट साहित्य सेवा सम्मान समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें शाद अजीमाबादी सम्मान भी मिला। बिहार राज्यगीत ‘तुझको शत-शत वंदन बिहार’ के लिए वर्ष 2012 में उन्हें एक लाख रुपये की सम्मान राशि से पुरस्कृत किया गया था। वे हिंदी प्रगति समिति के अध्यक्ष भी रहे। बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन समेत कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े रहे और जीवन के अंतिम दौर तक रचनात्मक रूप से सक्रिय रहे।
मानव मूल्यों के क्षरण को लेकर चिंतित थे
लेखक ध्रुव कुमार बताते हैं कि सत्यनारायण मौजूदा दौर में मानव मूल्यों के लगातार क्षरण को लेकर चिंतित रहते थे। उनका मानना था कि साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। वे सफलता हासिल करने के लिए शॉर्टकट अपनाने के खिलाफ थे और नई पीढ़ी को निरंतर अध्ययन, सृजन और मूल्यों से जुड़े रहने की प्रेरणा देते रहे। साहित्य जगत में उनकी कविताओं को अपने समय की पहचान माना जाता है। हिंदी और भोजपुरी साहित्य में उनके योगदान ने बिहार को देश-विदेश में विशिष्ट पहचान दिलाई। उनके निधन से साहित्य जगत ने एक ऐसे रचनाकार को खो दिया, जिसकी लेखनी लंबे समय तक जनचेतना की आवाज बनी रही।