Bihar: नीतीश कुमार सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस बंद करवा पाएंगे? 15 साल पहले इस फैसले का हो चुका है विरोध
Bihar Health News: सीएम नीतीश कुमार ने सरकारी डॉक्टरों के निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने का फैसला 15 साल पहले भी लिया था। लेकिन, उस वक्त सरकार को डॉक्टरों के विरोध का सामना करना पड़ा था। इसके बाद सरकार ने अपना आदेश वापस ले लिया था। अब आने वाला वक्त बताएगा कि सरकार का यह फैसला धरातल पर कितना लागू हो पाएगा?
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202 सीटें जीतकर आने के बाद राष्ट्रीय जनतात्रिक गठबंधन की सरकार लगातार कड़े निर्णय ले रही है। चाहे वह अभिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई हो, या जमीन विवाद को सुलझाने का मामले हो या अपराध के खिलाफ एक्शन हो। इसी कड़ी में नीतीश सरकार एक और कड़ा निर्णय लिया। यह निर्णय धरती के भगवान को लेकर है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने यह निर्णय लिया है। उन्होंने पश्चिम चंपारण के बेतिया में अपनी समृद्धि यात्रा के दौरान एलान किया कि अब बिहार के सरकारी डॉक्टर निजी प्रैक्टिस नहीं कर सकेंगे। इसके लिए सरकार नई नीति लाने जा रही है, जिससे सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की उपलब्धता सुनिश्चित होगी और आम मरीजों को समय पर इलाज मिल सकेगा।
सात निश्चय तीन की बात को एक महीना बाद सीएम नीतीश ने दोहराई
सीएम नीतीश कुमार ने 16 दिसंबर 2025 को सात निश्चय-3 की घोषणा की थी। इसके पांचवें निश्चय में उन्होंने ‘सुलभ स्वास्थ्य- सुरक्षित जीवन’ की बात कही थी। उन्होंने कहा कि प्रखंड सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को विशिष्ट चिकित्सा केंद्र (Speciality Hospital) के रूप में तथा जिला अस्पतालों को अति विशिष्ट चिकित्सा केंद्र (Super Speciality Hospital) के रूप में विकसित किया जाएगा। राज्य के नए मेडिकल कॉलेजों एवं अस्पतालों में बेहतर पढ़ाई एवं इलाज के लिए लोक-निजी भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाएगा। दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर चिकित्सा सुविधा सुनिश्चित करने के लिए चिकित्सकों को अलग से प्रोत्साहन की व्यवस्था एवं सरकारी चिकित्सकों की निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने की नीति लाई जाएगी। हालांकि, उस वक्त किसी ने इस पर बहुत ध्यान नहीं दिया था। लेकिन, सात निश्चय 3 की घोषणा के ठीक एक महीने बाद तक जब सीएम नीतीश कुमार ने निजी प्रैक्ट्रिस बंद करने की बात दोहराई तो उनका यह बयान सुर्खियों में आ गया।
पिछली बार विरोध किस बात को लेकर हुआ था? इस बार विधानसभा में ताकतवर तो...
वित्तीय वर्ष 2011-12 में सीएम नीतीश कुमार सरकारी डॉक्टरों के निजी प्रैक्टिस पर रोक लगाने की घोषणा की थी। लेकिन, उस वक्त बिहार के सभी सरकारी डॉक्टर एक हो गए और इस फैसले का विरोध करने लगे। डॉक्टरों ने नौकरी छोड़ने तक की धमकी दे दी थी। उस वक्त विपक्ष के कुछ नेता भी डॉक्टरों के समर्थन में थे। अब देखना होगा कि सरकार जो नई नीति लाने जा रहे है, उसका विरोध होता है या नहीं? इधर, विपक्ष इस फैसले का विरोध करे, इसकी आशंका कम ही लग रही है। क्योंकि बिहार विधानसभा में पूरा विपक्ष महज 35 सीटों पर सिमट चुका है।
सीएम जगन्नाथ मिश्रा की सरकार को भी वापस लेना पड़ा था आदेश
वहीं बिहार के जाने माने डॉक्टर अमूल्य सिंह ने कहा कि यह कोई नई घोषणा नहीं है। मेरे पिताजी पीएमसीएच में कार्यरत थे। यह बात साल 1976-77 की है। सीएम जगन्नाथ मिश्रा की सरकार ने ऐसी ही घोषणा की थी। लेकिन, छह महीना बाद ही सरकार ने अपना फैसला वापस ले लिया। नीतीश सरकार ने इस बार जो घोषणा की है, वह अच्छी पहल है। डॉक्टरों सरकारी अस्पताल में आठ घंटे की ड्यूटी करते हैं। सरकार उसी मापदंड से पैसा दे रही है। डॉक्टरों ने इन सब बातों को जानते हुए नौकरी में आते भी हैं। चिकित्सा क्षेत्र में नीतीश सरकार बहुत काम कर रही है। बिहार में बड़े बड़े अस्पताल बना रहे हैं। अगर चिकित्सक इन अस्पतालों में अच्छे से काम करे तो आम लोगों को इससे काफी फायदा मिलेगा। सरकार अगर नॉन प्रैक्टिसिंग एलाउंस देती है तो इसका यह काफी अच्छा होगा। यह सभी सरकारी डॉक्टरों को देना चाहिए।
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आरोप- कुछ सरकारी डॉक्टर अपनी मनमानी करते हैं
रिटेल केमिस्ट एसोसिएशन जनरल सेक्रेटरी संजय कुमार ने कहा कि 15 साल पहले भी सीएम नीतीश कुमार ने ऐसी घोषणा की थी। इस बार फिर से उन्होंने एक बड़ी पहल की थी। आम मरीज जो सरकारी हॉस्पिटल पर निर्भर रहत हैं, उन्हें सरकार के इस निर्णय से काफी लाभ मिलेगा। क्योंकि अभी कई सरकारी डॉक्टर हॉस्पिटल में आधा से एक घंटा ही समय देते हैं। इसके बाद अपनी निजी क्लिनिक में आ जाते हैं। दलाल मरीजों को यहां पहुंचाते हैं। इससे गरीब मरीजों का इलाज नहीं हो पाता है। संजय कुमार ने आरोप लगाया कि कुछ सरकारी डॉक्टर अपनी मनमानी करते हैं। बिहार का सबसे बड़ा अस्पातल पीएमसीएच है लेकिन वहां डॉक्टर नदारद रहते हैं। पड़ोस के राज्य पश्चिम बंगाल में सरकारी डॉक्टरों का निजी प्रैक्टिस बंद है। बिहार के सरकारी अस्पतालों में तीन से चार लाख की सैलरी मिलती है। इतनी सैलरी मिलने के बाजवूद वह अस्पताल में कम और अपने क्लिनिक में ज्यादा समय देते हैं। सीएम नीतीश कुमार का यह फैसला काफी स्वागत योग्य है। इसे अब पूरी तरह धरातल पर उतारने की जरूरत है।