बिहार न्यूज: 18 साल का अलगाव मानसिक क्रूरता, पटना हाईकोर्ट ने तलाक का फैसला रखा बरकरार
पटना हाईकोर्ट ने करीब 18 साल के वैवाहिक अलगाव को पति के प्रति मानसिक क्रूरता मानते हुए भोजपुर परिवार न्यायालय का तलाक आदेश बरकरार रखा। पत्नी की अपील खारिज कर दी गई, लेकिन उसे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी भरण-पोषण के लिए आवेदन करने की छूट दी गई।
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पटना उच्च न्यायालय ने करीब 18 वर्षों तक पति-पत्नी के अलग रहने को मानसिक क्रूरता मानते हुए भोजपुर परिवार न्यायालय के तलाक के फैसले को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति बिबेक चौधरी और न्यायमूर्ति राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए कहा कि बिना उचित कारण लंबे समय तक पति से अलग रहना वैवाहिक संबंधों का परित्याग और मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।
18 साल से अलग रह रहे थे दंपती
मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने पाया कि दोनों पक्ष करीब 18 वर्षों से अलग रह रहे हैं। अदालत ने कहा कि मुकदमा शुरू होने से पहले भी दोनों के बीच दो वर्ष से अधिक समय तक वैवाहिक सहवास नहीं था और पत्नी ने वैवाहिक दायित्वों का निर्वहन नहीं किया। पीठ ने माना कि इतने लंबे समय तक अलग रहना पति के लिए मानसिक क्रूरता के समान है। ऐसे में परिवार न्यायालय के तलाक के आदेश में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं बनता।
शादी के बाद बिगड़े रिश्ते
मामले के अनुसार, अभिषेक वर्मा और खुशबू कुमारी का विवाह 3 दिसंबर 2007 को हुआ था। पति का आरोप था कि शादी के कुछ समय बाद पत्नी मायके चली गई और फिर वापस नहीं लौटी। पति ने यह भी आरोप लगाया था कि पत्नी उसे दहेज हत्या के झूठे मामले में फंसाने की धमकी देती थी और परिवार से अलग रहने का दबाव बनाती थी।
वहीं, पत्नी ने आरोपों से इनकार करते हुए पति और उसके परिजनों पर दहेज मांगने तथा स्त्रीधन अपने पास रखकर उसे घर से निकालने का आरोप लगाया था। पति ने वर्ष 2008 में तलाक की अर्जी दाखिल की थी, जिसे शुरुआती चरण में खारिज कर दिया गया था। इसके बाद लंबी कानूनी प्रक्रिया चली। भोजपुर परिवार न्यायालय ने 7 जून 2022 को तलाक का फैसला सुनाया और 22 जून 2022 को इसकी डिक्री जारी की।
पत्नी को स्थायी भरण-पोषण के लिए आवेदन की छूट
उच्च न्यायालय ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए उसे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी भरण-पोषण के लिए आवेदन करने की स्वतंत्रता दी है। अदालत ने कहा कि यदि पत्नी भरण-पोषण के लिए आवेदन करती है, तो संबंधित परिवार न्यायालय को उस पर चार महीने के भीतर फैसला करना होगा।