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Independence Day : सात अंग्रेज सिपाहियों को मौत के घाट उतार कर लिया बदला, जानिए कौन थी बहुरिया रामस्वरूपा देवी

Thu, 15 Aug 2024 02:48 PM IST
कृष्ण बल्लभ नारायण न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, सारण
न्यूज़ डेस्क, अमर उजाला, सारण Published by: कृष्ण बल्लभ नारायण Updated Thu, 15 Aug 2024 02:48 PM IST
सार

Bihar : एक सिपाही वहां से भाग कर किसी घर के अंदर जाकर छुप गया, लेकिन वहां की महिलाएं धान कूटने वाली मूसर से उसकी कुटाई करने लगी। वह ज़िंदगी की भीख मांग रहा था, लेकिन उन महिलाओं ने मूसर-डंटे से मारकर उसे मौत के घाट उतार दिए। 

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Independence Day : Fight for independence Bahuriya Ramswarupa Devi British soldiers took revenge bihar news
बहुरिया राम स्वरूपा देवी। - फोटो : अमर उजाला डिजिटल

विस्तार

भारत की स्वाधीनता आंदोलन के लिए विद्रोह कर ऐतिहासिक अभियान के मात्र पंद्रह दिनों के अंदर बिहार में आजादी का बिगुल फूंक दिया था। इस काल में यह स्पष्ट हो गया था कि नामी - गिरामी नेतृत्व सामने नहीं था। बल्कि जनता के निचले तबका के लोग इस अभियान के प्राण थे। राजनीतिक और सामरिक तौर पर प्रशिक्षित नहीं थे, लेकिन उन्नत राष्ट्रीय और ब्रिटिश विरोधी चेतना से लैस होकर आंदोलन में जान डाल रहे थे।

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जानिए कौन हैं बहुरिया राम स्वरूपा देवी
अगस्त क्रांति के दौरान महात्मा गांधी द्वारा भारत छोड़ो आंदोलन और करो या मरो का ऐतिहासिक नारा से प्रभावित होकर सात नव युवक पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने चल पड़े थे, लेकिन झंडा फहराने के दौरान अंग्रेज सिपाहियों की गोली से शहीद हो गए, इन सात नवयुवको की शहादत संपूर्ण बिहार को आंदोलित कर दिया था। इसमें सारण की ऐतिहासिक धरती के अमनौर की बहुरिया राम स्वरूपा देवी इन खबरों को सुन एक महिला होकर भी तिलमिला गई थी। उसके बाद क्रांति की रणचंडी बनकर निकल पड़ी। लेकिन 16 अगस्त को मढ़ौरा की फैक्ट्रियों पर कब्जा करने के बाद थाना पर भारतीय झंडा फहराने की योजना बनाई गई। 18 अगस्त को महता गाछी में सभा आयोजित की गई। योजना के अनुसार सभा का आयोजन किया गया। बहुरिया जी ने अपना ओजस्वी भाषण प्रारंभ किया ही था कि हथियारों से लैस ब्रिटिस फौज के सिपाहियों की टुकड़ी वहां पहुंच गई।
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सात अंग्रेज सिपाहियों जा ऐसे किया था सफाया 
सभा स्थल पर ही अंग्रेजी सिपाहियों की टुकड़ियों ने अचानक हमला बोल दिया। अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दिया। हालांकि इस घटना के समय भारतीयों द्वारा अपने अपने खेतो से निकलकर अंग्रेजो पर टूट पड़े और ईंट-पत्थर बरसाने लगे। इतना देख अंग्रेज सिपाही अपनी हार मानते हुए भागने लगे। हालांकि बहुरिया रामस्वरुपा देवी की ललकार पर निहत्थे रहने वाले निचले तबका के लोगो ने छः गोरे सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिए थे। एक सिपाही वहां से भाग कर किसी घर के अंदर जाकर छुप गया, लेकिन वहां की महिलाएं धान कूटने वाली मूसर से उसकी कुटाई करने लगी। वह ज़िंदगी की भीख मांग रहा था, लेकिन उन महिलाओं ने मूसर डंटे से मारकर मौत के घाट उतार दिए। मारे हुए अंग्रेंजो को बैल गाड़ी पर लादकर परशुरामपुर गांव के नारायणी नदी में ले जाकर प्रवाहित कर दिया गया।
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Independence Day : Fight for independence Bahuriya Ramswarupa Devi British soldiers took revenge bihar news
गुड्डी पाण्डेय और जय मंगल महतो। - फोटो : अमर उजाला डिजिटल

गुड्डी पाण्डेय का था देश की स्वतंत्रता में अहम योगदान
सुंदर सुडौल और हट्टा-कट्टा व्यक्तित्व के धनी गोसी अमनौर गांव निवासी गुड्डी पाण्डेय का भी देश की स्वतंत्रता में अहम योगदान रहा है। कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद अंग्रेजी अखबार जरूर खरीदते थे। क्योंकि इनके जेहन में देशभक्ति कूट-कूट कर भरी हुई थी। रोजी-रोटी और कपड़ा की जुगाड़ में गुद्दी पाण्डेय रोजगार की तलाश में नागपुर गए हुए थे। वर्ष 1931 के दौरान नागपुर में साइमन टेलर नामक एक अंग्रेज अधिकारी मंच से सभा को संबोधित कर रहा था। उन्होंने साइमन को जूता चलाकर मार दिया, जिससे वहां भगदड़ मच गई। अंग्रेज सिपाहियों ने पकड़ कर उनकी जमकर पिटाई कर दी, जिस कारण अधमरा हो गए थे। अंत में उन्हें जेल भेज दिया गया। गांधी जी द्वारा डार्विन समझौता के छः माह बाद इन्हें छोड़ दिया गया। सन 1932 में सेनानियों द्वारा स्वराज आश्रम में एक सभा का आयोजन कर दिघवारा में अंग्रेज कलक्टर को जूते के माला पहनाने का लोगों ने निर्णय लिया गया। गुद्दी पाण्डेय ने इस कार्य को करने के लिए खुद बीड़ा उठाया। अंग्रेज कलक्टर काफी अत्याचारी था, हर समय लोगों पर जुर्म किया करता था। उन्होंने दिघवारा जाकर अंग्रेज कलक्टर को उनके ऑफिस में घुसकर जूते का माला पहनाकर हिदुस्तान जिंदाबाद का नारा लगाया। इससे क्रोधित होकर अंग्रेज सिपाही बुरी तरह मार पीट कर अधमरा कर इन्हें फिर से जेल भेज दिया था।

जय मंगल महतो की शहादत को याद नही करना दुर्भाग्य की बात
अंग्रेज सिपाहियों ने अपने साथी की मौत से आक्रोशित होकर सैनिक समूह को उतारने के बाद अमनौर गांव को चारों तरफ से घेरने लगे, तभी हमारे पूर्वजों ने मही नदी के पुल को तोड़ डाला। इसके बावजूद भी 20 अगस्त को अंग्रेज नदी के पार आना चाह रहे थे। जैसे ही यह खबर जय मंगल महतो के कानों में पड़ी तो अकेले ही तीर और कमान लेकर अंग्रेजो से लोहा लेने निकल पड़े। हालांकि कई अंग्रेज इनके तीर से घायल भी हुए थे। लेकिन अंत में अंग्रेजो द्वारा चलाई गई गोली का शिकार होकर अपने को भारत भूमि की रक्षा के लिए शहीद हो गए। जयमंगल महतो ने अपनी जान गवां कर अंग्रेजो से गांव की रक्षा किया था। देश के लिए शहादत देने वाले का नाम प्रखंड मुख्यालय के शिला पट्ट पर अंकित नही होना दुर्भाग्य है। जबकि इस शिला पट्ट पर स्वतंत्रता सेनानी का नाम दर्ज किया गया है।

छत पर लगे मशीनगन से बरसाई थीं गोलियां 
मढ़ौरा में शहीद स्मारक का उद्घाटन करने आए तत्कालीन मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद राय ने कहा था कि रामजीवन सिंह और अमनौर के जय मंगल महतो की शहादत से उपजे जनाक्रोश की गूंज लंदन की संसद तक गुंजी थी। वहीं प्रधानमंत्री चर्चिल ने कहा था कि मढ़ौरा में जिस सिपाहियों को मार कर उनकी लाशें तक खपा दी गई थी, उस मढ़ौरा में मशीन गन लगाकर 19 किमी की रेडीयंस को मानव विहीन बना दिया जाए। वैसे स्थानीय ग्रामीणों द्वारा कहा जाता था कि मढ़ौरा मार्टन फैक्ट्री के छत पर मशीन गन लगी थी जो नाचते हुए गोलियां बरसाया करती थी। अगस्त क्रांति के दौरान अमनौर हरनारायण के जगनाथ सिंह, परसुरामपुर के बासुदेव नारायण सिंह, पंडित राम कुमार तिवारी, राजेंद्र दुबे, शीतल सिंह और भोला तिवारी का भी सराहनीय योगदान रहा है।

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