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Bihar News: मां के संघर्ष से कैसे दो दोस्त बने जज, एक ने कर्ज लिया, दूसरे ने कचहरी में नौकरी कर पढ़ाया
Fri, 29 Nov 2024 06:32 PM IST
अरविंद कुमार
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, औरंगाबाद
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, औरंगाबाद
Published by: अरविंद कुमार
Updated Fri, 29 Nov 2024 06:32 PM IST
सार
दो मां...दो दोस्त और फिर दोनों दोस्तों के जज बनने की ये कहानी पढ़, समझ और जानकर आप संघर्ष करना सीख सकते हैं। एक मां ने बेटे की पढ़ाई के लिए कर्ज लिया तो दूसरी मां ने कचहरी में नौकरी पर अपने बेटे को पढ़ाया, और आज दोनों दोस्तों ने उस मुकाम को हासिल कर लिया, जिसके लिए वे दिन-रात संघर्ष कर रहे थे।
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दो दोस्त बने जज
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
यह अनूठी कहानी दो दोस्तों की है। दोनों ने ही एक साथ बिहार लोक सेवा आयोग यानी बीपीएससी की न्यायिक सेवा परीक्षा (ज्यूडिसियल सर्विसेज एग्जाम) पास की है। अब दोनों ही दोस्त जज बनने जा रहे हैं। दोनों दोस्तों की कहानी इस वजह से अनूठी है, क्योंकि एक को उसके पिता ने जज बनने लायक बनाने के लिए ठेले पर ब्रेड-अंडे की दुकान चलाई और मां ने स्वयं सहायता समूह से कर्ज लिया। वहीं, दूसरे की मां ने ग्राम कचहरी के सचिव की छोटी सी नौकरी की और पिता ने प्रिंटिंग प्रेस चलाकर पढ़ाया और जज बनने लायक बनाया। दोनों दोस्तों की सफलता से उनके घर परिवार में खुशी का माहौल है।
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दरअसल, यह कहानी बिहार के औरंगाबाद जिले के मदनपुर प्रखंड के शिवगंज की है। शिवगंज के दो लायक बेटों ने बिहार लोक सेवा आयोग की न्यायिक सेवा परीक्षा 2024 में सफलता हासिल कर अपने माता-पिता, परिवार और गांव का नाम रोशन किया है। इनमें आदर्श कुमार ने 120वां और अनुपम कुमार ने 151वां रैंक लाया है। दोनों ने ही बिना किसी कोचिंग का सहारा लिए सेल्फ स्टडी कर यह सफलता हासिल की है। दोनों ही साधारण से ग्रामीण परिवार से आते हैं।
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दोनों दोस्तों ने एक साथ की लॉ की पढ़ाई, दोनों के सपने भी एक
आदर्श और उसके दोस्त अनुपम दोनों का एक ही सपना था कि वे कानून की पढ़ाई कर जज बने। लिहाजा, दोनों ने ही साल 2017 में एक साथ कॉमन लॉ एडमिशन टेस्ट (क्लैट) की परीक्षा दी। इस परीक्षा में दोनों को सफलता मिली और दोनों को एक साथ चाणक्या नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, पटना में दाखिला मिला। साल 2022 में एलएलबी की पढ़ाई पूरी होने के बाद दोनों ही न्यायिक सेवा की तैयारी में लग गए और दोनों को 2024 में एक साथ सफलता मिल गई और उनके जज बनने का सपना भी पूरा हो गया।
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बाप ने ठेले पर दुकान चलाई और मां ने लिया कर्ज, दो बेटियों के हाथ भी पीले किए
आदर्श के पिता विजय साव शिवगंज बाजार में चौराहे पर ठेले पर ब्रेड-अंडे की छोटी सी दुकान चलाते हैं। इसी दुकान के सहारे उन्होंने आदर्श की दो बड़ी बहनों लक्ष्मी और रेखा के भी हाथ पीले किए और दोनों बेटों आदर्श कुमार और राजू कुमार को भी पढ़ाया। आदर्श के छोटे भाई राजू ने स्नातक के बाद बीएड की पढ़ाई की है और सरकारी शिक्षक बनने के लिए तैयारी करने के साथ ही अपना खर्च चलाने के लिए शिवगंज में ही एक छोटा सा कोचिंग सेंटर चलाते हैं। आदर्श की पढ़ाई के दौरान परिवार के समक्ष जब रुपये की कमी आड़े आई तो उसकी मां सुनैना देवी ने पढ़ाई में बांधा न आने देने के लिए गांव में ही महिलाओं के स्वयं सहायता समूह से कर्ज लिया, जिसकी वह सदस्य भी हैं। आदर्श की सफलता से उसके पूरे परिवार में खुशी है।
मां-बाप ने सपने में भी नहीं सोंचा कि बेटा बनेगा जज
आदर्श के पिता विजय साव और मां सुनैना देवी बेटे की सफलता से आह्लादित हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने तो सपने में भी नहीं सोंचा था कि उनका बेटा जज बनेगा। उन्हें इतनी ही उम्मीद थी कि बेटा कानून की पढ़ाई कर रहा है। पढ़-लिखकर एक अच्छा वकील बन जाएगा और अपना परिवार चला लेगा। लेकिन बेटे ने तो उनकी उम्मीद से बढ़कर बड़ा काम और नाम कर दिया। आदर्श के छोटे भाई राजू कहते हैं कि मेरे भईया धुन के पक्के इंसान हैं, वे जिस बात को ठान लेते हैं, उसे कर दिखाते हैं। भइया एलएलबी करने के बाद वकालत शुरू कर सकते थे। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उन्होंने जज बनने की ठानी तो जज बनकर ही दम लिया।
आदर्श ने कहा- मां-बाप मेरे भगवान, मेहनत करने पर मिलेगी सफलता
आदर्श अपनी सफलता का श्रेय माता-पिता को देते हुए कहते हैं कि मेरे लिए मां-बाप ही भगवान हैं। उन्होंने ही अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई मुझ पर खर्च कर इस लायक बनाया, जिससे मैं न्यायिक सेवा परीक्षा पास कर सका। कहा कि मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती है। प्रयास करने से सफलता जरूर मिलती है। इसलिए प्रयास करने से कभी भी पीछे मत हटिए और प्रयास करते जाइए। मैंने सही तरीके से प्रयास किया तो पहले प्रयास में ही मुझे सफलता मिल गई। यदि बार-बार के प्रयास के बावजूद सफलता नहीं मिल रही है तो यह तय है कि आप प्रयास पूरे मनोयोग से नहीं कर रहे हैं। पूरे मनोयोग से प्रयास करेंगे तो सफलता न मिलने का प्रश्न ही नहीं उठता।
अनुपम की सफलता से परिवार में खुशी
वहीं, अनुपम कुमार की सफलता से उनके परिवार में भी खुशी है। अनुपम के पिता अशोक मेहता किसान हैं और शिवगंज में प्रिंटिंग प्रेस चलाते हैं। लगनौती मौसम में शादी विवाह का कार्ड और अन्य अवसरों पर आमंत्रण कार्ड छापने का काम करते हैं। इसी प्रिटिंग प्रेस और छोटे रकबे की खेती से उनके पूरे परिवार का खर्च चलता है। परिवार का खर्च चलाने में सहयोग के लिए अनुपम की मां संजू देवी एरकीकला ग्राम कचहरी में सचिव की संविदा वाली नौकरी करती हैं। अनुपम का एक छोटा भाई और एक छोटी बहन है। छोटा भाई शुभम कुमार पटना वाणिज्य महाविद्यालय में बीबीए फाइनल ईयर का छात्र है और वह एमबीए करने के लिए कैट की तैयारी में लगा है। जबकि छोटी बहन खुशबू कुमारी पटना वीमेंस कॉलेज में एमसीए फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रही हैं।
'अब लोग कहेंगे, जज का बाप'
अनुपम की सफलता पर उनके पिता अशोक मेहता कहते हैं कि अभी तक तो इलाके में लोग मुझे प्रिंटिंग प्रेस चलाने वाला और छपाई वाला के रूप में जानते हैं। लेकिन अब लोग मुझे जज के बाप के रूप में जानेंगे। यह मेरे लिए बड़ी खुशी है। बेटे ने समाज में मेरा मान-सम्मान बढ़ाया है। वहीं, मां संजू देवी कहती हैं कि बाल-बच्चों का लायक निकलना एक मां के लिए बहुत बड़ी खुशी है। मैं इतनी खुश हूं, जिसे बयां नहीं कर सकती हूं।
अनुपम ने कहा कि सफलता हासिल करनी है तो ज्यादा दूर की मत सोंचिए। सिर्फ लक्ष्य पर काम करिए। स्टेप बाई स्टेप आगे बढ़िए। एक स्टेप पर सफलता मिल जाए, तभी दूसरे स्टेज के लिए आगे बढ़िए। एक साथ कई सारी सफलता नहीं मिल सकती है। इस कारण स्टेप वार आगे बढ़ने पर सफलता जरूर मिलेगी। इसे ही वे अपनी सफलता का मूल मंत्र मानते हैं।