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Durga Puja: समस्तीपुर में माता को कंधे पर उठाकर निकाला गया जुलूस, फिर नचाकर किया विसर्जन; 500 वर्षों की परंपरा
Sun, 13 Oct 2024 03:07 PM IST
हिमांशु प्रियदर्शी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, समस्तीपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, समस्तीपुर
Published by: हिमांशु प्रियदर्शी
Updated Sun, 13 Oct 2024 03:07 PM IST
सार
Durga Idol Immersion: स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि अगर नवरात्रि के दौरान किसी कारण माता के दर्शन नहीं हो पाते, तो इस अनुष्ठान को देखने मात्र से सभी कष्टों का निवारण हो जाता है।
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मां दुर्गा की प्रतिमा के विसर्जन के लिए श्रद्धालुओं में भारी उत्साह दिखा
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
समस्तीपुर जिले के पतैली दुर्गा स्थान मंदिर में रविवार अहले सुबह 500 वर्षों से चली आ रही परंपरा का पालन करते हुए माता दुर्गा की प्रतिमा का भव्य विसर्जन किया गया। इस परंपरा के तहत माता की प्रतिमा को कंधे पर उठाकर नचाते हुए जमुआरी नदी तक ले जाया गया और वहां विसर्जन किया गया। यह अनूठी प्रथा पतैली गांव और आसपास के क्षेत्रों में वर्षों से चली आ रही है और इसमें बड़ी संख्या में लोग उत्साहपूर्वक हिस्सा लेते हैं।
विसर्जन से पहले जुलूस और माता का नाच
जानकारी के मुताबिक, हर साल की तरह इस साल भी माता दुर्गा की प्रतिमा को भव्य तरीके से विदाई दी गई। पतैली गांव के अलावा आसपास के गांवों से भी लोग इस जुलूस में शामिल हुए। परंपरा के अनुसार, माता की प्रतिमा को मंदिर से निकालकर एक किलोमीटर लंबा पैदल जुलूस निकाला गया। इस दौरान भक्तों ने माता को अपने कंधे पर उठाया और पूरे जोश के साथ जय माता दी के नारे लगाते हुए उन्हें नदी तट की ओर ले गए।
मंदिर के प्रांगण में माता की प्रतिमा को विशेष रूप से नचाया गया। लोगों ने अपने कंधों पर रस्सी की सहायता से प्रतिमा को उठाकर नचाया, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचे थे। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि अगर नवरात्रि के दौरान किसी कारण माता के दर्शन नहीं हो पाते, तो इस अनुष्ठान को देखने मात्र से सभी कष्टों का निवारण हो जाता है। इस परंपरा को देखने के लिए हर साल दूर-दूर से लोग यहां आते हैं।
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जोश और तेजी का अद्भुत नजारा
प्रतिमा को लेकर लोगों के जोश और उत्साह का यह आलम था कि पूरे जुलूस में भक्त तेजी से आगे बढ़ते गए। करीब एक किलोमीटर की दूरी तय करने में उन्हें दो घंटे से अधिक का समय लगा। इस यात्रा में माता की प्रतिमा को संभालना आसान नहीं था, क्योंकि जोश और गति इतनी तेज थी कि अगर कोई भक्त लड़खड़ाता तो उसे गंभीर चोट लगने का भी खतरा था। लेकिन सभी श्रद्धालु पूरी शिद्दत से माता की सेवा में जुटे रहे और अंत में माता की प्रतिमा को जमुआरी नदी में विसर्जित किया गया।
500 वर्षों की है परंपरा
पतैली गांव के दुर्गा मंदिर की स्थापना करीब 500 साल पहले गांव के दिवंगत बतास साह ने की थी। वह कामर कामाख्या से माता की मूर्ति लेकर आए थे और यहां मिट्टी का मंदिर बनवाकर माता दुर्गा और मां काली की मूर्ति स्थापित की थी। तब से लेकर अब तक यह परंपरा चली आ रही है। वर्तमान में उनके वंशज विशुन साह, त्रिवेणी साह, मदन साह, शिबू साह, हरि साह, निर्मल साह आदि मंदिर की देखभाल और पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी संभालते हैं। 20 वर्ष पहले स्थानीय लोगों की मदद से इस मंदिर का पक्का निर्माण कराया गया।
रस्सी के सहारे माता का नाच
इस प्राचीन परंपरा के तहत माता की प्रतिमा को रस्सी के सहारे भक्त अपने कंधों पर उठाकर नचाते हैं। माना जाता है कि इस अनुष्ठान में शामिल होने वाले लोग कभी खाली हाथ नहीं लौटते हैं। लोग माता से अपनी मनोकामनाएं पूर्ण कराने के लिए यहां आते हैं। यह मान्यता है कि माता के दरबार में आने वालों की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं।
प्रतिमा बनाने के लिए सालों इंतजार
मंदिर में नवरात्रि के दौरान लगने वाले मेले में माता की प्रतिमा बनवाने के लिए भक्तों को सालों इंतजार करना पड़ता है। मेला कमेटी के अनुसार, माता की प्रतिमा बनवाने के लिए भक्तों को पहले से अपना नाम दर्ज कराना पड़ता है। वर्तमान में 15 वर्षों से अधिक की प्रतीक्षा सूची है, यानी भक्तों को अपनी बारी आने के लिए कई वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है।
उत्सव का अनोखा स्वरूप
पतैली दुर्गा स्थान मंदिर की यह प्राचीन और अनोखी परंपरा पूरे क्षेत्र में आस्था और उत्साह का प्रतीक बन चुकी है। हर साल नवरात्रि के दौरान इस विसर्जन जुलूस को देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं और माता के आशीर्वाद के साथ अपनी जीवन की समस्याओं का समाधान पाते हैं।
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विसर्जन से पहले जुलूस और माता का नाच
जानकारी के मुताबिक, हर साल की तरह इस साल भी माता दुर्गा की प्रतिमा को भव्य तरीके से विदाई दी गई। पतैली गांव के अलावा आसपास के गांवों से भी लोग इस जुलूस में शामिल हुए। परंपरा के अनुसार, माता की प्रतिमा को मंदिर से निकालकर एक किलोमीटर लंबा पैदल जुलूस निकाला गया। इस दौरान भक्तों ने माता को अपने कंधे पर उठाया और पूरे जोश के साथ जय माता दी के नारे लगाते हुए उन्हें नदी तट की ओर ले गए।
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मंदिर के प्रांगण में माता की प्रतिमा को विशेष रूप से नचाया गया। लोगों ने अपने कंधों पर रस्सी की सहायता से प्रतिमा को उठाकर नचाया, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचे थे। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि अगर नवरात्रि के दौरान किसी कारण माता के दर्शन नहीं हो पाते, तो इस अनुष्ठान को देखने मात्र से सभी कष्टों का निवारण हो जाता है। इस परंपरा को देखने के लिए हर साल दूर-दूर से लोग यहां आते हैं।
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जोश और तेजी का अद्भुत नजारा
प्रतिमा को लेकर लोगों के जोश और उत्साह का यह आलम था कि पूरे जुलूस में भक्त तेजी से आगे बढ़ते गए। करीब एक किलोमीटर की दूरी तय करने में उन्हें दो घंटे से अधिक का समय लगा। इस यात्रा में माता की प्रतिमा को संभालना आसान नहीं था, क्योंकि जोश और गति इतनी तेज थी कि अगर कोई भक्त लड़खड़ाता तो उसे गंभीर चोट लगने का भी खतरा था। लेकिन सभी श्रद्धालु पूरी शिद्दत से माता की सेवा में जुटे रहे और अंत में माता की प्रतिमा को जमुआरी नदी में विसर्जित किया गया।
500 वर्षों की है परंपरा
पतैली गांव के दुर्गा मंदिर की स्थापना करीब 500 साल पहले गांव के दिवंगत बतास साह ने की थी। वह कामर कामाख्या से माता की मूर्ति लेकर आए थे और यहां मिट्टी का मंदिर बनवाकर माता दुर्गा और मां काली की मूर्ति स्थापित की थी। तब से लेकर अब तक यह परंपरा चली आ रही है। वर्तमान में उनके वंशज विशुन साह, त्रिवेणी साह, मदन साह, शिबू साह, हरि साह, निर्मल साह आदि मंदिर की देखभाल और पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी संभालते हैं। 20 वर्ष पहले स्थानीय लोगों की मदद से इस मंदिर का पक्का निर्माण कराया गया।
रस्सी के सहारे माता का नाच
इस प्राचीन परंपरा के तहत माता की प्रतिमा को रस्सी के सहारे भक्त अपने कंधों पर उठाकर नचाते हैं। माना जाता है कि इस अनुष्ठान में शामिल होने वाले लोग कभी खाली हाथ नहीं लौटते हैं। लोग माता से अपनी मनोकामनाएं पूर्ण कराने के लिए यहां आते हैं। यह मान्यता है कि माता के दरबार में आने वालों की सभी परेशानियां दूर हो जाती हैं।
प्रतिमा बनाने के लिए सालों इंतजार
मंदिर में नवरात्रि के दौरान लगने वाले मेले में माता की प्रतिमा बनवाने के लिए भक्तों को सालों इंतजार करना पड़ता है। मेला कमेटी के अनुसार, माता की प्रतिमा बनवाने के लिए भक्तों को पहले से अपना नाम दर्ज कराना पड़ता है। वर्तमान में 15 वर्षों से अधिक की प्रतीक्षा सूची है, यानी भक्तों को अपनी बारी आने के लिए कई वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है।
उत्सव का अनोखा स्वरूप
पतैली दुर्गा स्थान मंदिर की यह प्राचीन और अनोखी परंपरा पूरे क्षेत्र में आस्था और उत्साह का प्रतीक बन चुकी है। हर साल नवरात्रि के दौरान इस विसर्जन जुलूस को देखने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं और माता के आशीर्वाद के साथ अपनी जीवन की समस्याओं का समाधान पाते हैं।