Bihar Election 2025 : प्रशांत किशोर बिहार चुनाव में क्या कर सकेंगे, कल ही फैसला; जन सुराज ने खुद किया ऐसा दावा
Bihar News : बिहार विधानसभा चुनाव तो अक्टूबर-नवंबर में होगा, लेकिन कल ही यह फैसला हो जाएगा कि प्रशांत किशोर इस चुनाव में कितना दम दिखा सकेंगे। जन सुराज ने ऐसा दावा कर दिया है कि अब सत्ताधारी जदयू-भाजपा से लेकर विपक्षी दल तक कल उनका प्रदर्शन देखेंगे।
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बिहार विधानसभा चुनाव में अभी करीब छह-सात महीने का वक्त है, लेकिन प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने अभी ही फैसले का एलान कर दिया है। मतलब, भीड़ से है। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने पूरे पटना को ऐसे पोस्टर से पाट दिया है, जिसमें दावा किया गया है कि "फैसला तो कल (11 अप्रैल 2025) गांधी मैदान पटना में ही होगा।" दरअसल, शुक्रवार को बिहार के चुनावी साल में प्रशांत किशोर की पहली रैली है, जिसका नाम 'बिहार बदलाव रैली' दिया गया है। यानी, बिहार चुनाव में बदलाव होना है या नहीं, यह शुक्रवार को पीके की रैली में उमड़ी भीड़ से पता चल जाएगा। अब यही पोस्टर पीके के लिए मुसीबत बन जाएगा, अगर वह ऐसा करिश्मा नहीं दिखा पाते हैं तो। और, अगर उनका दावा सही हो गया तो सत्ता से लेकर विपक्ष तक को यह सीधी चुनौती होगा।
गांधी मैदान को पीके ने क्यों चुना, उसकी भी है वजह
बिहार में रैलियों के लिए सबसे बड़ी जगह पटना का गांधी मैदान है। यह ऐतिहासिक गांधी मैदान है, क्योंकि लोकनायक जय प्रकाश नारायण ने यहीं से संपूर्ण क्रांति का एलान करते हुए कहा था- 'सिंहासन खाली करो कि जनता आती है'। आजादी के पहले यहां महात्मा गांधी ने भी सभा की थी। तब इसे बांकीपुर मैदान और पटना लॉन के नाम से लोग जानते थे। 30 जनवरी 1948 को मोहन दास करमचंद गांधी की हत्या के बाद एक शिक्षक की अपील पर 1948 में इसका नाम गांधी मैदान किया गया। इसके बाद से गांधी मैदान राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन की राज्य में सबसे बड़ी जगह रही है। जेपी ने छात्र आंदोलन का आगाज़ यहीं से किया था। दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी की जनसभाओं से लेकर राष्ट्रीय जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद की गरीब रैली-महारैली-महारैला तक का यह गवाह रहा है। नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने से पहले यहीं 27 अक्तूबर 2013 को आतंकी बम धमाकों के बीच हुंकार रैली की थी।
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रैलियों का क्या गणित रहा है बिहार में? जान लें यहां
चाणक्य स्कूल ऑफ पॉलिटिकल राइट्स एंड रिसर्च के अध्यक्ष सुनील कुमार सिन्हा कहते हैं- "एक जमाने में बिहार में रैलियों की भीड़ से चुनावी ताकत का अंदाजा लग जाता था। राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने अपनी गरीब रैली की और भारी भीड़ के बाद अगली बार उसका नाम गरीब महारैली और फिर महारैला हो गया। बिहार के क्षेत्रीय नेताओं की ताकत पहले रैलियों से आंक ली जाती थी। एक समय था, जब अटलजी को सुनने के लिए गांधी मैदान में भीड़ आती थी, लेकिन भाजपा को वोट नहीं मिल पाता था। फिर भाजपा को भी रैली से चुनाव का अंदाजा लगने लगा। लेकिन, अब रैलियों के अर्थशास्त्र की खबरें चर्चा में रहती हैं और उसकी भीड़ वोट में नहीं बदलती है। लोकसभा चुनाव 2024 में तो जिनकी सभाओं में भीड़ अपरंपार दिख रही थी, वह भी चुनाव परिणाम में अपने दल की सीटों के लिए मशक्कत करते दिखे।"