Bihar Bridge Collapse: 'बूंद' की धार तेज हुई तो पुल गिर जाएगा; किशनगंज में पुल धंसने का चौंकाने वाला कारण मिला
Amar Ujala Investigation : बिहार में दो महीने के दरम्यान एक दर्जन से ज्यादा पुल गिरे। अब कौन-सा पुल गिरने वाला है? यह पुल क्यों धंसा और अब गिरने का आरोप किसपर लगेगा, ‘अमर उजाला’ टीम इसकी पूरी पड़ताल सामने ला रहा है, ताकि सरकारी तंत्र आंखें खोले।
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विस्तार
अररिया-सिलीगुड़ी हाइवे पर पश्चिम बंगाल-बिहार जीरो प्वाइंट सीमा से कुछ किलोमीटर पहले जब हम एक ग्रामीण रास्ते पर निकले तो हमें न तो प्रधानमंत्री और न ही मुख्यमंत्री के नाम पर बनाई सड़कें दिखीं। किशनगंज जिले के पथरिया पंचायत में हमें वह रास्ते दिखते गए, जो बताते हों कि कभी यहां सड़क बनाई गई होगी। बीच-बीच में पिच रोड के निशान मिल रहे थे तो जगह-जगह पर पानी से भरे गड्ढे। रास्ते में बांग्ला और नेपाली मिश्रित हिंदी बोलने वालों से बात हुई। चाय के बागान दिखे। अनानास के पौधे भी। लेकिन, हम खोज रहे थे खुशी डांगी या खोशी डांगी। आखिरकार एक जगह जाकर बोर्ड दिखा- खोशी डांगी शून्य किलोमीटर। जैसे ही बोर्ड दिखा, बायीं तरफ खोड़ीबाड़ी (दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल) का रास्ता भी दिखा और रास्ता रोकने के लिए बांस-बल्लियां भी। इन बांस-बल्लियों से खोशी डांगी पुल पर आवागमन रोका गया है। यह वही पुल है, जो धंसने के कारण पिछले महीने के अंत में सुर्खियों में रहने के बाद भुला दिया गया था।
50 हजार से ज्यादा की आबादी सीधे प्रभावित
पुल के पास एक पेड़ की छांव में 10-12 लोग बैठकर समय गुजारते दिखे। 2008-09 में केंद्रीय योजना से जब यहां सड़क के साथ पुल बना तो यही लोग खुश थे। आज समय गुजारने को विवश दिखे। कई तो बात करने के लिए भी तैयार नहीं थे। जो बात करने के लिए तैयार हुए, उनसे संकेतों में पता चला कि किसी अनजाने डर की वजह से मीडिया से बात नहीं करना चाह रहे। वह 'अनजाना डर' क्या है, हम यह भी समझना चाह रहे थे। खैर, पुल की ओर बढ़े तो पुलिसिया वर्दी में एक महिला गृह रक्षक मिलीं। वह भी यह सुनिश्चित करने के लिए ड्यूटी पर लगाई गई हैं कि कोई गाड़ी इस पुल पर नहीं चढ़े। पुल गाड़ियों के लिए ही होता है और नदी पर ही बना होता है। लेकिन, इस पुल पर गाड़ियों की आवाजाही बंद है। नदी में पानी नहीं बढ़े और धार तो तेज न ही हो, सब यही मना रहे। किशनगंज में बारिश होती रहती है, इसलिए उससे भी डर है कि कहीं बहुत तेज नहीं हो कि उससे ही पुल गिर जाए। खोशी डांगी के पुल की इस हालत के कारण 50 से 60 हजार की आबादी प्रभावित है। रोजगार लगभग छिन गया है। पुल गिरा तो इस 'लगभग' शब्द को भी हटा देना होगा, क्योंकि तब यहां के लोग अमूमन पश्चिम बंगाल जाकर रोजी-रोजगार नहीं कर पाएंगे। इस जगह से पश्चिम बंगाल की दूरी दो-तीन किलोमीटर के आसपास है। लोग पुल के पास से ही बिजली के हाई टेंशन लाइन का एक पोल दिखाते हुए बताते हैं कि 'वह' पश्चिम बंगाल में है।
पानी की धार घटी, मगर पुल का धंसना नहीं
जून 2024 के अंत में 'किशनगंज का पुल धंसा' शीर्षक के साथ खोशी डांगी चर्चा में आया था। तब 420 किलोमीटर दूर राजधानी पटना तक सभी को खोशी डांगी का नाम पता चल गया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तक बात पहुंची। पुल का पाया धंसने से क्रैक आने की सूचना पर इतना हंगामा था कि बिहार के पूर्वोत्तर छोर किशनगंज में गाड़ियों का काफिला पहुंच जाए। लेकिन, ऐसा कुछ जमीन पर नहीं हुआ। इस पुल को देखने के लिए प्रखंड स्तर तक के ही अधिकारी आए। करीब 50 किलोमीटर की यात्रा कर किशनगंज जिलाधिकारी भी नहीं आए। जनप्रतिनिधि में मुखिया ने ही आकर देखा। विधायक-सांसद भी नहीं। हम 420 किलोमीटर दूर पटना से पहुंचे तो लोगों को चौंकना स्वाभाविक था। विश्वास जमाने में कुछ वक्त लगा, लेकिन जब हम पुल धंसने की वजह ढूंढ़ने लगे तो धीरे-धीरे कुछ लोग सामने आने लगे। कहने लगे- "पानी की धार अभी कम है। कम ही रहे तो काम चलता रहेगा। कोई देखने तो आ नहीं रहा। पुल गिर जाएगा तो शायद आ जाए।" महानंदा की सहायक बूंद नदी पर बने इस पुल के दो पाये जून के अंत में पहली बार धंसे तो ऊपरी हिस्सा अलग होने की जगह गैप भर गया। जिस जगह पर दबाव पड़ा, वहां रेलिंग भी टूट गई। छड़ झांक गया। उसके बाद पानी तो घटा, लेकिन पुल के पायों का धंसना नहीं रुका। पायों के धंसने के बाद पूरा ढांचा इधर-उधर हुआ तो पुल को सपोर्ट देने वाले निर्माण एक-एक कर जगह छोड़ रहे, गिर रहे। स्थानीय पत्रकार प्रदीप इस पुल को बार-बार आकर देखते हैं, वह कहते हैं- "बूंद नदी की धारा अभी कमजोर है, इसलिए पाये धीरे-धीरे जगह छोड़ रहे हैं। इस रफ्तार से धंसने पर समय लगेगा, लेकिन अचानक नदी में पानी बढ़ा तो पूरा पुल धड़ाम हो जाएगा। यह दो पंचायतों को जोड़ने वाला पुल है, लेकिन सबसे बड़ा जुड़ाव पश्चिम बंगाल से है। लोग उधर ही रोजगार से जुड़े हैं।"
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देशों के तहत बिहार में 15 जून से 15 अक्टूबर के बीच वैध नदी घाटों पर भी खनन करना मना है, लेकिन 'अमर उजाला' को यहां पड़ताल के दौरान जुलाई में भी खनन का प्रमाण मिला। लोगों ने इस पुल के नीचे से भी बालू-गिट्टी निकाले जाने की जानकारी दी और कुछ ही दूर पर हमें जमा गिट्टी का ढेर और इसे निकालने का सामान भी मिला। इस नदी से बालू के साथ गिट्टी निकालकर ले जाया जाता है। पुल के दोनों तरफ से गिट्टी निकाले जाने के कारण कई जगह गड्ढे हो गए, जिसके कारण पायों का आधार हिल गया। आधार हिलने के बाद पायों को जमाए रखने वाला सीमेंट का स्लैब दरका और फिर पाये अपनी जगह से अंदर चले गए।
किशनगंज में 14-15 साल पहले ढाई करोड़ में बने खोशी डांगी के पुल के धंसने के बाद भी बूंद नदी से गिट्टी निकालने का सिलसिला नहीं रुका। ज्यादातर लोग इस बारे में कुछ बोलने से कतरा रहे थे, लेकिन सुजीत राम ने आगे आकर कंपनियों का नाम तक बता दिया कि किस तरह पोकलन मशीन लाकर यहां से बालू और गिट्टी निकालने का खेल चल रहा था। जो खेल पुल के पास चल रहा था, अब थोड़ी दूर चल रहा।
नीचे से खोखला कर देंगे तो पुल कहां से टिकेगा!
कई ग्रामीणों ने बताया कि यहां से बालू-गिट्टी निकाला जा रहा था, लेकिन अनजाने डर से कोई नाम बताने को तैयार नहीं। लेकिन, जब 'अमर उजाला' ने बातचीत में उस अनजाने डर को लेकर बहुत कुरेदा तो ग्रामीण सुजीत राम ने कंपनियों का नाम लेकर बताना शुरू किया कि कौन-कौन यहां से बालू-गिट्टी ले जा रहा है, किसने यहां पोकलन मशीन से भी खनन किया। प्रमाण के रूप में जब हमने आगे बढ़कर मौजूदा खनन वाली जगह तक पहुंचने का प्रयास किया तो ग्रामीण उस तरफ जाने को तैयार नहीं हुए थे। खैर, जब वह प्रमाण हमने कैमरे में दिखाया तो लोगों ने कहा कि पुलिस भी आती है, लेकिन कोई रोकता नहीं। मतलब, साफ है कि प्रशासन से लेकर पुलिस तक- हरेक को यहां पुल के धंसने की वजह पता है, बस मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा तक यह बात नहीं पहुंची है। हम ग्राउंड से यह सब लेकर आए हैं ताकि सरकार जागे। खोशी डांगी के लोगों को भी सरकार के जागने का इंतजार है, क्योंकि एक बड़ी आबादी का रोजी-रोजगार इस पुल के भरोसे था, है और रहेगा।