फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Bihar ›   bihar election 2020 :Chirag have challenge to handle father's legacy with sympathy

चिराग के सामने सहानुभूति के सहारे पिता की विरासत संभालने की चुनौती

Sat, 10 Oct 2020 04:33 AM IST
Jeet Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पटना Published by: Jeet Kumar Updated Sat, 10 Oct 2020 04:33 AM IST
विज्ञापन
bihar election 2020 :Chirag have challenge to handle father's legacy with sympathy
चिराग पासवान (फाइल फोटो) - फोटो : PTI

दिग्गज दलित नेता रहे रामविलास पासवान के निधन के बाद राजनीतिक हल्कों में यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान संभावित सहानुभूति के सहारे पिता की विरासत संभाल पाएंगे? हालांकि पासवान के निधन के बाद जदयू और भाजपा के लिए अब लोजपा पर सीधा हमला बोलना आसान नहीं होगा।

विज्ञापन


राम विलास पासवान दलितों के सर्वमान्य और सर्वाधिक कद्दावर नेता रहे हैं। उनके निधन से लोजपा के प्रति दलितों में सहानुभूति स्वाभाविक है। हालांकि इसके बाद उनके सांसद पुत्र चिराग के लिए चुनौतियों का दौर शुरू होने वाला है। उनका राजनीतिक भविष्य बहुत हद तक बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे पर निर्भर करेगा।
विज्ञापन



चुनाव में पार्टी का बेहतर प्रदर्शन न सिर्फ चिराग के सियासी कद को नई ऊंचाइयां देगा, बल्कि पासवान के विरासत पर उनके नाम की मुहर भी लग जाएगी। इसके विपरीत अगर पार्टी का प्रदर्शन बेहतर नहीं रहा तो चिराग के लिए मुसीबतों का दौर शुरू होगा। केंद्र में पासवान की जगह मंत्री बनने की चिराग की चाहत भी बहुत कुछ चुनाव में प्रदर्शन से ही तय होगी।
विज्ञापन
विज्ञापन


चाचा बन सकते हैं चुनौती
चुनाव में भाजपा के साथ जदयू के खिलाफ की रणनीति खुद चिराग की थी। जैसे साल 2014 के लोकसभा चुनाव में चिराग के ही दबाव में पासवान राजग में शामिल हुए। हालांकि तब पार्टी की कमान पासवान के पास थी और पासवान के रहते पार्टी की विरासत पर सवाल उठाने की स्थिति नहीं आनी थी। अब पासवान के निधन के बाद परिस्थिति बदली हुई है।

पासवान के भाई पशुपति पारस से चिराग के मतभेद हैं। चिराग को पार्टी की कमान देने से पशुपति खुश नहीं थे। जाहिर तौर पर अगर चुनाव के नतीजे मनमाफिक नहीं आए तो लोक जनशक्ति पार्टी के भीतर ही बगावत के सुर तेज होंगे।

बढ़ी जदयू की मुसीबत
चुनाव से ठीक पहले पासवान के निधन से जदयू की मुसीबत बढ़ गई है। सीएम नीतीश कुमार ने बेहद चतुराई से महादलित कार्ड खेल कर राज्य में दलितों के बीच लोजपा का आधार कम किया था। हम के मुखिया जीतनराम मांझी को अंतिम समय में साधने की मुख्य वजह लोजपा को दलितों में आधार नहीं बनाने देने की थी।

अब पासवान के निधन से उपजी सहानुभूति दलित बिरादरी के सभी कुनबे को लोजपा के पक्ष में एक कर सकती है। जदयू की दूसरी परेशानी भाजपा की ओर से लोजपा पर सीधा हमला बोलने से बचने की रही है।

गठबंधन की घोषणा के पहले भाजपा ने नीतीश को पासवान की अस्वस्थता का हवाला देते हुए लोजपा को राजग से बाहर करने की मांग ठुकरा दी थी। अब जबकि पासवान का निधन हो चुका है। ऐसे में भाजपा और जदयू दोनों लोजपा के खिलाफ तीखा हमला बोलने की स्थिति में नहीं हैं। भाजपा को लोजपा पर हमला नहीं करने का बड़ा बहाना मिल गया है।

तेज होगा भाजपा से लोजपा जाने का सिलसिला
लोजपा ने अपने पहले चरण के लिए घोषित 42 उम्मीदवारों की सूची में भाजपा के छह बागियों को टिकट दिया है। पासवान के निधन के बाद टिकट पाने में नाकाम भाजपा नेताओं का लोजपा की शरण में जाने का सिलसिला और तेज हो सकता है क्योंकि आम धारणा है कि अब लोजपा के पक्ष में दलित वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है।


दूसरे मोर्चे की तरफ आकर्षित हो रहे बागी नेताओं की भी बाकी चरणों में अब विचारधारा और सहानुभूति लहर को देखते हुए लोजपा पहली पसंद हो सकते हैं। ऐसे में लोजपा को बैठे-बिठाए मजबूत दावेदार मिल जाएंगे।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed