लोजपा के बागियों के सहारे खुद को कितना मजबूत कर पाएंगे नीतीश, क्या इससे नहीं सताएगा भाजपा का डर?
- बिहार विधानसभा चुनाव में जेडीयू की भाजपा से कम सीटें आने के बाद से ही असहज हैं नीतीश कुमार
- भाजपा के स्थानीय नेताओं की महत्वाकांक्षा से बचने के लिए मजबूत करने में लगे अपना किला
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नवादा से लोकजनशक्ति पार्टी के सांसद चंदन कुमार सिंह ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात की है। सियासी हलकों में इस मुलाकात के अलग-अलग मतलब निकाले जा रहे हैं। माना जा रहा है कि नीतीश कुमार अपना किला 'मजबूत' कर बिहार भाजपा की संभावित चुनौती से निपटने का रास्ता तलाश रहे हैं। इस काम में उनकी मदद लोक जनशक्ति पार्टी के वे बागी विधायक-सांसद कर रहे हैं, जो कथित तौर पर चिराग के नेतृत्व में खुद को असहज महसूस कर रहे हैं। यानी नीतीश एक तीर से दो शिकार करना चाहते हैं। एक तो वे बिहार भाजपा की किसी संभावित चुनौती का इलाज भी करना चाहते हैं तो दूसरे लोकजनशक्ति पार्टी की कमर भी तोड़ना चाहते हैं, जो पिछले विधानसभा चुनाव में कम से कम 32 सीटों पर जेडीयू के हार का कारण बनी थी।
जेडीयू के एक नेता के मुताबिक यह दोनों नेताओं की सामान्य मुलाकात थी और इसका कोई खास मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए, लेकिन जहां तक बिहार की सियासत का सवाल है भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व गठबंधन के लिए सकारात्मक रुख रखता है, लेकिन बिहार भाजपा के नेता समय-समय पर बयानबाजी कर अपनी महत्वाकांक्षा जाहिर करते रहते हैं। ऐसे में इस महत्वाकांक्षा का 'इलाज' बहुत जरूरी है। इसके लिए अपना घर मजबूत करने की कोशिश अवश्य की जानी चाहिए। ऐसे में अगर किसी अन्य दल के लोग जेडीयू के साथ आना चाहते हैं, तो पार्टी इसका स्वागत करेगी।
भूमिहार समीकरण साधना बड़ी चुनौती
दरअसल, एलजेपी सांसद चंदन कुमार सिंह भूमिहार जाति से आते हैं। भाजपा और जेडीयू दोनों ही ये जानते हैं कि बिहार में भूमिहार वर्ग उनसे काफी नाराज है। विकल्पहीनता की स्थिति में उसने इस विधानसभा चुनाव में एनडीए को वोट दिया है। नीतीश कुमार इसी नाराजगी को दूर करना चाहते हैं और इसके लिए चंदन कुमार सिंह जैसे लोग उनकी मदद कर सकते हैं। कम्युनिस्ट नेता कन्हैया कुमार की जेडीयू मंत्री अशोक चौधरी से मुलाकात को भी इसी नजर से देखा जा रहा है। अगर कन्हैया कुमार जैसे वोकल युवा नेता नीतीश के खेमे से जुड़ जाते हैं, तो इस जमात के लिए यह एक बड़ा संदेश होगा।
बिहार की राजनीति पर पकड़ रखने वाले धीरेंद्र कुमार कहते हैं कि 2011 की जनगणना में बिहार में भूमिहार की आबादी तकरीबन छह फीसदी है। अपनी इस संख्या की बदौलत यह वर्ग बिहार की सियासत में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। अस्सी-नब्बे के दशक की रक्तरंजित राजनीति के कारण यह वर्ग आरजेडी के खेमे के साथ जुड़ने से अब तक असहज महसूस करता रहा है, लेकिन अगर तेजस्वी यादव कोई बड़ा दांव खेलते हैं तो बदली सियासी हवा में युवा भूमिहारों का एक वर्ग आरजेडी से जुड़ सकता है। अगर ऐसा होता है तो राज्य में नीतीश कुमार की स्थिति ज्यादा कमजोर हो जाएगी। इसके उलट अगर यही वर्ग नीतीश के साथ आ जाता है तो यह उनकी ताकत भी बन सकती है। चंदन सिंह और कन्हैया को साधने की कोशिश कर नीतीश कुमार यही संकेत देने की जुगत में हैं।
क्या चिराग से असहज हैं उनकी पार्टी के नेता
वहीं, लोकजनशक्ति पार्टी के एक शीर्ष नेता के मुताबिक रामविलास पासवान ने अपने जिंदा रहते ही पार्टी की कमान युवा चिराग पासवान के हाथों में दे दी थी। उन्होंने पार्टी के दिल्ली अधिवेशन में सबके सामने चिराग की यह कहकर तारीफ की थी कि उनके एनडीए में आने के पीछे सबसे बड़े कारण चिराग पासवान ही थे और उन्होंने ही पार्टी का भाजपा से समीकरण बिठाने में अहम भूमिका निभाई थी। मोदी लहर में पार्टी ने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में अच्छी सफलता दर्ज की जो चिराग पासवान के खाते में गया।
एलजेपी नेता के मुताबिक लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान की राजनीतिक अनुभवहीनता ने कुछ नेताओं को परेशान कर दिया। चिराग पासवान ने ऐसे कई निर्णय लिए जिससे पार्टी के कई नेता सहमत नहीं थे। पार्टी के अनेक नेता चिराग के एनडीए से बाहर रहकर चुनाव लड़ने के पक्ष में भी नहीं थे और चुनाव के समय से ही बगावती मूड में थे। चुनाव में पार्टी की हुई करारी हार ने इन बगावती लोगों को एक अवसर दे दिया है और अब वे अपना झंडा बुलंद करना चाहते हैं। नीतीश कुमार लोजपा की इस 'आपदा' में अपने लिए अवसर तलाश रहे हैं। लोजपा नेता केशव सिंह अपने साथ भारी संख्या में पार्टी नेताओं को जेडीयू खेमे में ले जाकर नीतीश की इच्छा पूरी कर सकते हैं।
निर्दलीय सुमित कुमार सिंह को अपने खेमे में लेकर भी नीतीश कुमार चिराग पासवान को उनके गढ़ में ही रोकने की कोशिश कर रहे हैं। लोहिया के समय की राजनीति के धुरंधर स्थानीय नेता नरेंद्र सिंह के बेटे सुमित कुमार सिंह इस क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखते हैं और वे चिराग पासवान के धुर विरोधी बताए जाते हैं। इनको अपने खेमे में लेकर भी नीतीश ने चिराग पासवान को कमजोर करने का काम किया है। चिराग की यह खोती हुई ताकत बिहार में नीतीश कुमार को नई ऊर्जा से लबरेज कर सकती है।