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बिहार: यहां तो पिछड़ी जातियां ही हैं किंग मेकर

Sun, 16 Aug 2015 02:40 PM IST
Updated Sun, 16 Aug 2015 02:40 PM IST
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Bihar: Backward Castes may be the king maker of assembly election

बिहार विधानसभा चुनाव जैसे जैसे क़रीब आ रहा है, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि तमाम जातियां राज्य के दो प्रमुख गठबंधनों के ईर्द गिर्द तेजी से गोलबंद हो रही हैं। लेकिन अति पिछड़ी जाति के मतदाता आगामी चुनाव में अहम भूमिका अदा कर सकते हैं।

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हालांकि अलग अलग आंकलनों में इनकी संख्या अलग अलग बताई जाती है, लेकिन मोटे तौर पर बिहार के कुल मतदाताओं में इनकी संख्या लगभग 25 प्रतिशत है। हाल के दिनों में अन्य जातियों के वोटरों भी अपनी-अपनी पसंद की पार्टी के पक्ष में एकजुट हो रहे हैं, लेकिन अति पिछड़ी जातियों के वोटर बंटे रहे हैं।
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बंटा हुआ वोट
अन्य वजहों के अलवा, इनके वोटों के बंटे रहने का प्रमुख कारण है, इन सभी का एक जाति से न होना। इनमें कई जातियां हैं, जैसे- लुहार, कुम्हार, बढ़ई, सुनार, कहांर, केवट इत्यादि. ये सभी जातियां मिलकर अति पिछड़ा वर्ग बनाती हैं। अति पिछड़ा वर्ग की बहुत सी जातियां पारंपरिक कामों में लगी हुई हैं।

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जाति विशेष के नेता

Bihar: Backward Castes may be the king maker of assembly election

पिछले कुछ चुनावों में मतदान से पर्याप्त सबूत मिलते हैं कि अलग अलग जातियों के मतदाता चुनाव दर चुनाव बड़ी संख्या में एकजुट होकर अपनी पसंद की पार्टी को वोट देते हैं। अगर यादवों ने बड़ी संख्या में लालू यादव के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) को एकमुश्त वोट किया तो कुर्मी जाति के मतदाताओं ने नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के पक्ष में भारी संख्या में मतदान किया।
 
इसी तरह तथाकथित ऊंची जाति के मतदाता पिछले दो दशक से भारतीय जनता पार्टी के साथ बने हुए हैं। हालांकि इनमें से बड़ी संख्या में पहले कांग्रेस के वोटर थे।

राम विलास पासवान अभी भी दलितों और पासवान जाति में सबसे लोकप्रिय हैं। उनमें ऐसी क्षमता है कि जिस पार्टी के साथ वो जाएंगे, इन मतदाताओं का रुख भी उसी गठनबंधन की ओर मुड़ेगा।

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि अन्य नेतों और पार्टियों के मुक़ाबले पासवान अपने पसंद की पार्टी से बहुत आसानी से गठबंधन बना लेते हैं। शायद इसीलिए अन्य किसी नेता के मुक़ाबले वो लंबे समय तक सत्ता में (मंत्री) भी बने रहने में सफल रहे हैं।

एकत्र होकर बड़ी संख्या में किसी जाति के मतदाताओं का किसी खास पार्टी के पक्ष में मतदान करने के पीछे सबसे बड़ा कारण नेता का उस विशेष जाति से संबंध रखना है।

कद्दावर नेता की कमी

Bihar: Backward Castes may be the king maker of assembly election

अति पिछड़ी जातियों में कद्दावर नेताओं की ग़ैर-मौजूदगी के कारण इन जातियों का वोट विभिन्न पार्टियों के बीच बंट जाता है। वोट बंटने का दूसरा सबसे कारण है, मतदाताओं की एक बड़ी संख्या स्थानीय स्थितियों को ध्यान में रखकर वोट करती है।

सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ के विभिन्न विधानसभा और लोकसभा चुनावों में किए गए सर्वे बताते हैं कि अति पिछड़ी जातियों का वोट साल 2005 के विधानसभा चुनावों तक राजद और जदयू-भाजपा गठबंधन के बीच बंटा रहा है।

कुछ चुनावों में ये मतदाता राजद की ओर कुछ ज़्यादा झुके दिखे, जबकि अन्य चुनावों में जदयू-बीजेपी के पक्ष में, ऐसा उन्होंने स्थानीय वजहों से किया।

मतदान ढर्रे में बदलाव
साल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव के बाद अति पिछड़ी जातियों के मतदान के पैटर्न में बदलाव दिखता है। इस चुनाव में पिछले कई दशकों के मुकाबले इन मतदाताओं ने जदयू-बीजेपी गठबंधन के पक्ष में वोट किया।

जदयू-बीजेपी के पक्ष में अति पिछड़ी जातियों के मतदान के ढर्रे में आया बदलाव 2010 के विधानसभा और 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान और मजबूत हुआ। चूंकि जदयू और बीजेपी के बीच 1996 से लेकर 2010 तक गठबंधन था, तो किसी को भी इस बात पर संदेह हो सकता है कि अति पिछड़ी जातियों के वोटरों ने जदयू को वोट किया या बीजेपी को।

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