बिहार में ओवैशी की एंट्री बदल सकती है सारे समीकरण, जानिए कैसे?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बिहार में होने वाले विधानसभा चुनावों की जंग रोचक होती जा रही है, अभी तक भाजपा गठबंधन और जेडीयू-आरजेडी के महागठबंधन के बीच माने जा रहे मुख्य मुकाबले में एक तीसरे खिलाड़ी ने भी जोरदार एंट्री मार दी है।
ये खिलाड़ी हैं ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानी की एआईएमआईएम के नेता असद्दुदीन ओवैशी। हैदराबाद के सांसद ओवैशी मुस्लिमों में तेजी से लोकप्रिय होते नेता हैं।
उनकी लोकप्रियता का आलम ये है कि कुछ समय पहले हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी एआईएमआईएम ने मोदी के प्रभाव के बावजूद जोरदार उपस्थिति दर्ज कराते हुए दो सीटें जीतने में सफलता हासिल की थी। जबकि वहां पहले से ही जमे जमाए खिलाड़ी राज ठाकरे की एमएनएस का सूपड़ा साफ हो गया था।
ऐसे में बिहार के किसनगंज में बीते रविवार को की गई उनकी रैली ने जमे जमाए नेताओं की नींद उड़ा दी है। मुस्लिम बहुल किशनगंज में उनकी रैली में उमड़ी भीड़ ने खासकर जेडीयू और आरजेडी नेताओं की नींदें उड़ा दी हैं।
ओवैशी की दावेदारी से बिगड़ेगा लालू-नीतीश का खेल
आमतौर पर अभी तक भाजपा को साम्प्रदायिक बताकर लालू प्रसाद यादव की राजद ही मुस्लिम वोटों पर अपनी दावेदारी करती रही है। वैसे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी मुस्लिमों को रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ते और इन वोटों को खो देने के डर से ही उन्होंने भाजपा से रिश्ता तोड़ने में भी देर नहीं नहीं लगाई थी।
आगामी चुनावों में बिहार की राजनीति के ये दोनों बड़े खिलाड़ी मिलकर चुनाव लड़ने की तैयारी में भी हैं ऐसे में ओवैशी की एंट्री दोनों नेताओं के लिए चिंता का सबब बन गई है।
अपनी जोरदार तकरीरों और कड़वे बोलों के चलते बेशक असद्दुदीन ओवैशी पर साम्प्रदायिक होने और देशविरोधी बयान देने के आरोप लगते रहे हों लेकिन मुस्लिमों में उनकी लोकप्रियता से शायद ही कोई इंकार कर सके।
किशनगंज में हुई रैली में अपने भाषण में उन्होंने सत्तारूढ़ जेडीयू-आरजेडी के अलावा भाजपा पर जमकर निशाने साधे थे। ऐसे में साफ था कि उनकी निगाहें विधानसभा चुनावों पर टिकी हुई है।
दो दर्जन सीटों पर निर्णायक स्थिति में हैं मुस्लिम मतदाता
बिहार में मुस्लिमों की कुल आबादी 17 फीसदी के करीब है जिनमें से सीमांत बिहार में 25-30 सीटों पर वो ठीक ठाक स्थिति में हैं और चुनावी समीकरणों को प्रभावित भी कर सकते हैं।
सीमांत इलाकों किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार में मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है। इनमें से कटिहार से एनसीपी के तारिक अनवर तो अररिया से आरजेडी के तसलीमुद्दीन सांसद हैं, जबकि किशनगंज से कांग्र्रेस के मौलाना असरारुल हक सांसद हैं।
ऐसे में इन सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं के प्रभाव का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। ओवैशी की निगाहें इन्हीं सीटों पर टिकी हुई हैं। चुनावी समीकरणों की बात करें तो भाजपा का इन सीटों पर कभी मजबूत दावा नहीं रहा है, मुस्लिम बहुल क्षेत्र होने के कारण भाजपा इन सीटों पर खास तैयारी भी नहीं कर रही थी लेकिन नीतीश कुमार और लालू यादव का इन सीटों पर अच्छा प्रभाव माना जाता है। ज्यादातर विधायक भी इन्हीं की पार्टियों से हैं।
अगर इन सीटों पर ओवैशी अपने प्रत्याशी उतारते हैं तो उसका सीधा-सीधा नुकसान लालू-नीतीश के गठबंधन को होगा और भाजपा इसका फायदा उठाने में कामयाब हो सकती है।
भाजपा को मिल सकता है ओवैशी की एंट्री का फायदा
ओवैशी बेशक महाराष्ट्र की तरह ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब न हो सकें लेकिन वह लालू-नीतीश का खेल तो बिगाड़ ही सकते हैं जिसका सीधा सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा।
लालू नीतीश की जोड़ी की एक बड़ी दिक्कत ये भी है कि ओवैशी जिस तरह के भाषण देते हैं उससे साम्प्रदायिक धुव्रीकरण की आंशका ज्यादा रहती है।
ओवैशी ने जिस तरह की भीड़ किशनगंज की रैली में जुटाई थी अगर ऐसी ही भीड़ उनकी अन्य रैलियों में भी आती है तो हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना भी बढ़ जाएगी। क्योंकि हिंदू वोटरों में ओवैशी को लेकर उनके पुराने भाषणों और तकरीरों के चलते रोष देखा जाता है।
ऐसे में साफ है कि ओवैशी जितना दम बिहार चुनावों में अपने उम्मीदवारों पर लगाएंगे उतना यहां ध्रुवीकरण की संभावना बढ़ती जाएगी और भाजपा इस मौके को हर हाल में भुनाना चाहेगी। वैसे भी ये माना जाता है कि वोटों के ध्रुवीकरण का ज्यादा फायदा भाजपा को ही मिलता है यूपी में लोकसभा चुनावों में इसकी बानगी लोग देख चुके हैं।