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ज्योति की जिजीविषाः हालात से नहीं मानी हार, साइकिल पर बीमार पिता को बिठा गुरुग्राम से पहुंची बिहार

Wed, 20 May 2020 03:09 AM IST
संजीव कुमार झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दरभंगा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दरभंगा Published by: संजीव कुमार झा Updated Wed, 20 May 2020 03:09 AM IST
सार

  • घायल पिता का सहारा बनी 13 साल की ज्योति
  • रास्ते में ट्रक वाले मांग रहे थे बहुत पैसे
  • खाने पीने के लिए पास में कुछ भी पैसे नहीं बचे थे

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13 years old Jyoti putting her sick father on a cycle and reached darbhanga from gurugram in 7 days
13 साल की ज्योति अपने पिता के साथ

विस्तार

दुनिया कोरोना का संकट झेल रही है। कई देशों में लॉकडाउन जारी है। हर गुजरता दिन दुख, दर्द, बेबसी, बहादुरी, हौसला, लाचारी और इरादों की बुलंदी की कितनी ही कहानियां लेकर इतिहास बन रहा है। ऐसी ही एक कहानी है ज्योति की। जिसके हौसले के आगे दूरियां मिट गई और संकट के इस महाकाल में जीने की एक नई राह खुली। 

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महज 13 साल की ज्योति पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है। देश भर में लोग उसकी खूब तारीफ कर रहे हैं। भला उसकी तारीफ हो भी क्यों नहीं, आखिर उसने जो किया यह हर किसी के लिए संभव भी नहीं है। कोरोना महामारी की वजह से लगे लॉकडाउन के कारण  कई लोग मजबूर होकर लंबी दूरी की परवाह किए बिना अपनी जान जोखिम में डाल गृह प्रदेश की ओर निकल पड़े हैं। ऐसी ही संघर्ष भरी कहानी है दरभंगा जिले की सिरुहुलिया गांव की रहनेवाली ज्योति की।
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ज्योति ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया कि खाने पीने के लिए हमारे पास कुछ भी पैसे नहीं बचे थे। रूम मालिक भी किराए नहीं देने पर तीन बार बाहर निकालने की धमकी दे चुका था। गुरूग्राम में मरने से अच्छा था कि हम रास्ते में मरें। इसलिए हम बीमार पापा से कहे कि आप चलो साइकिल से। मैं आपको ले चलूंगी। पापा नहीं मान रहे थे, लेकिन फिर हम जबरदस्ती किए और आखिरकार जैसे-तैसे वे मान गए।
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ज्योति अपने पिता मोहन पासवान को साइकिल पर बिठा कर हरियाणा के गुरुग्राम से अपने घर दरभंगा के लिए निकली। इस दौरान रास्ते में कई तरह की परेशानियां हुईं लेकिन हर बाधा को ज्योति बिना हिम्मत हारे पार करती गई। कई बार ज्योति को खाना भी नहीं मिला। रास्ते में कहीं किसी ने पानी पिलाया तो कहीं किसी ने खाना खिलाया। लेकिन ज्योति ने हिम्मत नहीं हारी।

साइकिल से आना बहुत कठिन यात्रा थी लेकिन दूसरा कोई रास्ता नहीं था 

ज्योति ने बताया कि ऐसे में उसके पास साइकिल के सिवा आने के लिए और कुछ नहीं था। हालांकि बिहार आने के लिए उसके पापा ने एक ट्रक वाले से बात की थी। उसने दोनों लोगों को घर पहुंचाने के लिए बहुत ज्यादा पैसे मांगे। ज्योति ने बताया कि पापा के पास उतने रुपये नहीं थे। इसलिए उसने साइकिल से घर आने का फैसला लिया। पापा ने भी साथ दिया। साइकिल से गुरुग्राम से दरंभगा की लंबी यात्रा बहुत कठिन थी। बावजूद इसके हमारे पास कोई दूसरा चारा नहीं था।

7 दिन में तय किया करीब 1200 किमी का कठिन सफर

ज्योति ने बताया कि उसने पापा को साइकिल पर बैठा कर 10 मई को गुरुग्राम से चलना शुरू किया और 15 की शाम में घर पहुंची। इस दौरान उसे बहुत सारी परेशानियों का सामना करना पड़ा। ज्योति ने कहा कि भगवान की कृपा से हमलोग अपने घर पहुंच गए। वहीं गांव पहुंचने पर लोगों द्वारा इस बच्ची की खूब तारीफ हुई । लोगों ने दोनों पिता व बेटी को गांव स्थित एक पुस्तकालय में रखा, जहां दोनों का मेडिकल चेकअप होगा उसके बाद 14 दिन के लिए दोनों को क्वारंटीन में रखा जाएगा।

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