सूर्यदेव अपने पुत्र शनि की मकर राशि की यात्रा समाप्त करके कुम्भ राशि में आ चुके हैं। सूर्य सृष्टि की आत्मा हैं और इन्हीं की रश्मियों द्वारा परमपिता ब्रह्मा जी चराचर जगत में जीव की उत्पत्ति करते हैं, जिसके फलस्वरूप इस दिन से जड़ता में चेतनता का भाव जागृत हो जाता है। पेड़-पौधे पुरानी पत्तियों को त्यागकर नई पत्तियों को जन्म देते हुए पुष्पों और फलों से आच्छादित हो जाते हैं। प्रकृति में नई ऊर्जा का संचार होने लगता है। पृथ्वी हरी-भरी होकर पुष्पों की चादर ओढ़ लेती है और मधुमास का शुभारम्भ हो जाता है।
Sun Transit in Aquarius: सूर्य के राशि परिवर्तन से 4 राशियां होंगी मालामाल, जानें अपना भी हाल
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सूर्य के रथ पर ये देवता होते हैं सवार
बसंत ऋतु की यात्रा के समय दो देवता - विष्णु और विश्कर्मा, दो ऋषि - जमदग्नि और विश्वामित्र, दो नाग - काद्रवेय और कम्बलाश्वतर सूर्य के ही रथ पर निवास करते हैं। सूर्यवर्चा और धृतराष्ट नामक दो गन्धर्व, अपनी सुंदरता से मन का हरण कर लेने वाली तिलोत्तमा और रम्भा नाम की दो अप्सराएं भी सूर्य की इस यात्रा में साथ चलती हैं। इनके साथ ऋतजित और सत्यजित दो महाबलवान सारथी तथा ब्रह्मोपेत और यज्ञोपेत नामक दो राक्षस निवास करते हैं।
ये सभी देवतागण आदि अपने अतिशय तेज से सूर्य को अतिशय तेजों वाला बनाते हैं। ऋषिगण अपने बनाए गये वाक्यों से सूर्यदेव की स्तुति करते हैं। इस प्रक्रार अपने रथ पर चलते हुए सूर्य सातों द्वीपों और सातों समुद्रों समेत सृष्टि का भ्रमण करते हुए दिन-रात्रि का निर्माण करते हैं। इन्हीं के द्वारा क्षण, मुहूर्त, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, दिन, अयन, वर्ष, तथा युग आदि का काल-विभाग होता है।
सूर्य के रंग से मिलते हैं भविष्य के संकेत
आदिकाल में ऋषिगण इनके रंगों के अनुसार सांसारिक-प्राकृतिक भविष्यवाणियां करते थे। मेदिनी ज्योतिष के अनुसार भगवान सूर्य असमय कृष्णवर्ण दिखें तो संसार पर विपत्ति, ताम्रवर्ण हों तो सेनापतियों के लिए घातक, पीले रंग के दिखें तो शीर्ष नेतृत्व के लिए अशुभ संकेत है। यदि सूर्य देवता श्वेत वर्ण के दिखें तो धर्मगुरुओं के लिए नेष्ट और धूम्रवर्ण होने से चोर अथवा शस्त्र का भय रहता है, किंतु इन वर्णों के साथ-साथ यदि वर्षा भी हो तो ये दोष नष्ट हो जाता है।
इस पूजा से प्रसन्न होंगे सूर्यदेव
तांबे के पात्र में गुड़हल का पुष्प (जपा कुसुम) या अन्य रक्तपुष्प, लाल चन्दन, अक्षत, शहद, हल्दी, अथवा इनमें से कोई भी पदार्थ मिलाकर सूर्य अर्घ्य देने से सभी नौ ग्रहों के दोष समाप्त हो जाते हैं। कुएं पर, तालाब में, सरोवर में, नदी और समुद्र में रहने पर पितरों की प्रसन्नता हेतु सूर्य का पाप नाशक और पुण्य बृद्धि कारक मंत्र -
सूर्यदेव महाभाग ! त्र्योक्य तिमिरापह।
मम पूर्व कृतं पापं क्षम्यतां परमेश्वरः।।
पढ़ते हुए प्रतिदिन लाल सूर्य में सूर्य नमस्कार करने से आयु, विद्या बुद्धि और यश की प्राप्ति होती है। इनके विषय में ब्रह्मा जी कहते हैं कि इनकी आराधना से प्राणियों का नवग्रह दोष भी नष्ट हो जाता है।
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