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वीडियो: 35 साल बाद परिवार से मिलीं प्रमिला, बांह पर बने एक टैटू ने अपनों तक पहुंचाई राह

करीब 35 साल का लंबा इंतजार आखिरकार खत्म हुआ। ओडिशा की रहने वाली प्रमिला ने रविवार को वीडियो कॉल के जरिए अपने परिवार से बात की तो दशकों से बिछड़े रिश्तों की डोर फिर जुड़ गई। लंबे समय बाद अपनों की आवाज सुनते ही परिवार के सदस्यों की आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े। प्रमिला तक उनके परिवार को पहुंचाने में उनकी बांह पर बना एक छोटा-सा टैटू और बिखरी हुई यादें अहम सुराग बनीं। प्रमिला मूल रूप से अलुपुआ पंचायत, जिला केंद्रापड़ा, ओडिशा की रहने वाली हैं। हालांकि, कुछ संस्थागत अभिलेखों में उनकी पहचान रामकली मलिक के नाम से दर्ज है। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक, उन्होंने वर्ष 2011 से 2018 तक शिमला स्थित एक मानसिक स्वास्थ्य देखभाल केंद्र में समय बिताया। इसके बाद वह शिमला के नारी निकेतन में रहीं और बाद में मंडी जिले के भंगरोटू स्थित वृद्ध आश्रम पहुंचीं। प्रमिला की पहचान और उनके परिवार तक पहुंचने की कोशिश के तहत ‘मिशन अपनो तक’ के अंतर्गत एसडीएम बल्ह समृतिका नेगी ने तहसील कल्याण अधिकारी धर्मशीला के साथ वृद्ध आश्रम का दौरा किया। टीम ने प्रमिला से संवेदनशीलता के साथ बातचीत की और उनके घर, परिवार तथा अतीत से जुड़ी यादों को समझने का प्रयास किया। इसी दौरान प्रमिला की बांह पर बना ओड़िया भाषा का टैटू सामने आया। यह टैटू उनकी पहचान की तलाश में महत्वपूर्ण सुराग बना। बातचीत में प्रमिला ने कटक और ओडिशा से जुड़े कुछ अन्य स्थानों का भी जिक्र किया। बिखरी हुई यादों और उपलब्ध संकेतों को जोड़कर परिवार की तलाश को आगे बढ़ाया गया। प्रमिला की बातचीत के छोटे वीडियो सबिता चंदा और इंडिया केयर्स के साथ साझा किए गए। परिवार की तलाश के लिए ओडिशा पुलिस से भी सहयोग लिया गया। सबिता चंदा ने ओडिशा रेलवे पुलिस एवं कोस्टल सिक्योरिटी के एडीजी अरुण बोथरा से संपर्क किया। इसके अलावा अमित कुमार मलिक ने भी उपलब्ध सुरागों के सत्यापन में सहयोग किया। प्रणय राउत और राजा मलिक समेत कई लोगों ने अलग-अलग चरणों में जानकारी जुटाने और सुरागों को जोड़ने में मदद की। लगातार प्रयासों और जानकारी के सत्यापन के बाद आखिरकार प्रमिला के परिवार का पता लगा लिया गया। इसके बाद रविवार को वीडियो कॉल के माध्यम से प्रमिला की अपने परिजनों से बातचीत करवाई गई। वीडियो कॉल पर जब प्रमिला ने वर्षों बाद अपने परिवार के सदस्यों को देखा और उनकी आवाज सुनी तो यह पल बेहद भावुक रहा। एक ओर दशकों तक चले बिछोह की पीड़ा थी तो दूसरी ओर अपनों से दोबारा जुड़ने की खुशी। प्रमिला की यह कहानी बताती है कि कभी-कभी पहचान की तलाश में छोटी-सी जानकारी भी बड़ी कड़ी साबित हो सकती है। यहां एक टैटू, कुछ स्थानों के नाम और वर्षों पुरानी यादों को जोड़कर खोज को आगे बढ़ाया गया और आखिरकार प्रमिला को उनके परिवार तक पहुंचाया जा सका। करीब 35 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद प्रमिला का परिवार से दोबारा जुड़ना उनके लिए ही नहीं, बल्कि परिवार के लिए भी भावुक क्षण रहा। इस पूरी खोज में संस्थागत रिकॉर्ड, प्रमिला की यादें, टैटू और ओडिशा से जुड़े सुरागों को मिलाकर काम किया गया। ‘मिशन अपनो तक’ के प्रयासों से पूरी हुई यह तलाश इस बात की मिसाल भी बनी कि किसी व्यक्ति की पहचान केवल सरकारी या संस्थागत रिकॉर्ड तक सीमित नहीं होती। उसके पीछे परिवार, रिश्ते और वर्षों पुरानी यादों की एक पूरी कहानी होती है—जिसे सही सुराग मिलने पर फिर से जोड़ा जा सकता है।

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