Cloud Seeding: क्या है क्लाउड सीडिंग, जहरीली हवा पर कैसे वार करती है ये टेक्नोलॉजी?

नीतीश कुमार
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीनीतीश कुमार
Tue, 30 Sep 2025 06:13 PM IST
सार

Cloud Seeding Technology:

हाल ही में दिल्ली सरकार को हवा में प्रदूषण कम करने के लिए क्लाउट सीडिंग की अनुमति मिली है। प्रदूषण कम करने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल कैसे होता है, आइए जानते हैं।

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क्या है क्लाउड सीडिंग? - फोटो : AI

    विस्तार

    दिल्ली की हवा को सांस लेने लायक बनाने के लिए अब कृत्रिम बारिश (Artificial Rain) का सहारा लिया जाएगा। हाल ही में नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) ने IIT कानपुर को क्लाउड सीडिंग ऑपरेशन करने की मंजूरी दी। ये ऑपरेशन अक्टूबर से नवंबर के बीच चलेंगे। ऐसे में आइए जानते हैं क्लाउड सीडिंग में किस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर कृत्रिम बारिश कराई जाती है।

    कृत्रिम बारिश के जरिए प्रदूषण से निजात पाने की तकनीक कोई नई नहीं है। दुनियाभर के कई शहरों में प्रदूषण से निजात पाने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल काफी समय से किया जा रहा है।

    क्या है क्लाउड सीडिंग?

    क्लाउड सीडिंग एक वैज्ञानिक तकनीक है जिसमें बादलों को बरसने के लिए कृत्रिम तरीके से प्रेरित किया जाता है। सामान्य तौर पर बारिश तब होती है जब बादलों में मौजूद पानी के कण भारी होकर बरसने लगते हैं। लेकिन जब ये प्रक्रिया प्राकृतिक तौर पर न हो तब वैज्ञानिक हस्तक्षेप किया जाता है।

    आसमान में बादलों के फॉर्मेशन के लिए हवाई जहाज की मदद से काफी ऊंचाई पर सिल्वर आयोडाइड, ड्राई आइस और अन्य रसायन बादलों में छोड़े जाते हैं। ये केमिकल्स नमी को आकर्षित करते हैं और बादलों को जोड़कर बारिश की संभावना बढ़ा देते हैं। इसी तकनीक को क्लाउड सीडिंग कहा जाता है। यह तकनीक सूखे इलाकों में बारिश लाने, ओले कम करने या धुंध हटाने के लिए भी कारगर है।

    दिल्ली के लिए क्यों जरूरी है यह प्रयोग?
    दिल्ली के लिए क्यों जरूरी है यह प्रयोग? - फोटो : AI

    क्यों जरूरी है दिल्ली के लिए यह प्रयोग?

    दिल्ली की गिनती दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में होती है। खासकर सर्दियों के दौरान यहां का हाल और भी खराब हो जाता है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) के मुताबिक 2024-25 की सर्दियों में दिल्ली का PM 2.5 स्तर औसतन 175 माइक्रोग्राम/क्यूबिक मीटर रहा।

    यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो की एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट (EPIC) की रिपोर्ट बताती है कि प्रदूषण की वजह से दिल्लीवासियों की औसत आयु करीब 11.9 साल कम हो रही है। ऐसे में कृत्रिम बारिश को हवा साफ करने का संभावित समाधान माना जा रहा है।

    बारिश होने से हवा में मौजूद पार्टिकुलेट मैटर (PM 2.5) कम हो जाते हैं। साथ ही, मट्टी में नमी बढ़ने से धूल उड़ाना भी कम हो जाता है। हवा में स्मॉग की परत हटने से ताजी हवी मिलने लगती है और लोग राहत की सांस ले पाते हैं।

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