याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: "डेटा ही आज की असली संपत्ति है", नए DPDP कानून पर उठे सवाल
DPDP Act 2023 Challenge Supreme Court:
सुप्रीम कोर्ट ने नए 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023' पर सुनवाई करते हुए एक बड़ी टिप्पणी की है कि आज के डिजिटल दौर में "डेटा ही असली संपत्ति है।" इस नए कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है जिसमें निजता, सूचना के अधिकार और पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सवाल उठाएं हैं।

विस्तार
क्या इंटरनेट पर आपका डेटा सुरक्षित है? यह सवाल एक बार फिर चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट में नए डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 (DPDP Act) को चुनौती दी गई है। चुनौती पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा है कि आज के दौर में "डेटा ही वास्तविक संपत्ति है" और इसकी सुरक्षा एक बड़ा वैश्विक मुद्दा है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने माना है कि जब दुनिया भर की बड़ी टेक कंपनियां हमारा डेटा कंट्रोल कर रही हैं। तो डेटा संप्रभुता और हमारी निजता के नियम बिल्कुल स्पष्ट होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच-मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली ने इस मामले में नोटिस जारी किया है। अदालत ने कहा कि इस मामले की अगली सुनवाई 23 मार्च को होगी।
किसने दाखिल की याचिका?
ये याचिका पत्रकार गीता सेशु और अन्य लोगों की ओर से दायर की गई है। इसमें डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 की कई धाराओं को असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि इस कानून की कुछ धाराएं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19(1)(a), 19(1)(g), 21 और 21A का उल्लंघन करती हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह सुप्रीम कोर्ट में पेश हुईं।
डेटा बन चुका है नई संपत्ति: सुप्रीम कोर्ट
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि नागरिकों का डेटा अब सिर्फ एक देश का मामला नहीं रहा बल्कि यह वैश्विक स्तर का मुद्दा बन चुका है। कोर्ट ने कहा कि आज बड़ी निजी कंपनियां दुनिया भर के नागरिकों का डेटा संभाल रही हैं और इसी वजह से डेटा संप्रभुता का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है। बेंच ने कहा, "आज के समय में डेटा ही असली संपत्ति बन चुका है।"
पत्रकारिता पर डेटा प्रोटेक्शन कानून का भी मुद्दा उठा
सुनवाई के दौरान इंदिरा जयसिंह ने अदालत को बताया कि इस कानून को अलग-अलग पहलुओं से कई याचिकाओं में चुनौती दी गई है। उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चिंता RTI कानून में मौजूद पब्लिक इंटरेस्ट अपवाद को हटाने को लेकर है। उनके मुताबिक, अगर किसी सूचना को व्यक्तिगत डेटा मान लिया गया तो पत्रकारों के लिए जनहित से जुड़ी जानकारी हासिल करना मुश्किल हो सकता है। उन्होंने कहा कि पत्रकार व्यक्तिगत जानकारी नहीं चाहते लेकिन अगर कोई जानकारी जनहित में है तो उसे पाने का अधिकार होना चाहिए।
कोर्ट ने सार्वजनिक डेटा और निजी डेटा के अंतर पर उठाए सवाल
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान एक अहम सवाल उठाया, उन्होंने पूछा कि "आखिर सार्वजनिक डेटा और व्यक्तिगत डेटा में अंतर क्या है?" साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि करना होगा कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक पद पर होता है तो उससे जुड़ी जानकारी को निजी नहीं माना जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि हमें निजता के अधिकार और सूचना के अधिकार के बीच एक संतुलन बनाना होगा ताकि एक अधिकार दूसरे के लिए बाधा न बने।
निगरानी और सरकारी छूट पर भी सवाल
याचिकाकर्ताओं ने ये भी कहा कि इस कानून में कुछ प्रावधान ऐसे हैं जिसमें सरकार को खुद को कई नियमों में छूट मिलती है। इससे नागरिकों पर निगरानी की आशंका भी पैदा होती है। इसके अलावा उन्होंने बताया कि पहले आईटी एक्ट के तहत अगर किसी का डेटा गलत तरीके से एक्सेस किया जाता था तो प्रभावित व्यक्ति को मुआवजा मांगने का अधिकार था। लेकिन नए कानून में यह अधिकार हटा दिया गया है और किसी भी जुर्माने की राशि डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड को जाएगी, न कि पीड़ित व्यक्ति को।
डेटा संप्रभुता बना वैश्विक मुद्दा
सुनवाई के दौरान अदालत ने माना कि ये मामला केवल भारत तक सीमित नहीं है। बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म और निजी कंपनियों के पास दुनिया भर के नागरिकों का डेटा है इसलिए डेटा संप्रभुता और डेटा सुरक्षा अब वैश्विक बहस का विषय बन चुके हैं। कोर्ट ने कहा कि ये एक महत्वपूर्ण और तात्कालिक मुद्दा है जिस पर स्पष्ट न्यायिक व्याख्या की जरूरत है।
याचिका में क्या मांग की गई है?
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में मुख्य रूप से ये मांगे रखी गई हैं:
- डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 (DPDP Act, 2023) की विवादित और असंवैधानिक धाराओं को रद्द किया जाए।
- डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स, 2025 (DPDP Rule, 2025) के कुछ नियमों को रद्द किया जाए।
- डेटा का गलत इस्तेमाल होने पर आम यूजर को हर्जाना मांगने का अधिकार वापस मिले।
- डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड को पूरी तरह से स्वतंत्र बनाया जाए ताकि सरकारी दखल कम हो।
- पत्रकारों को जनहित की खबरें करने के लिए डेटा इस्तेमाल की विशेष छूट मिले।
23 मार्च को अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए नोटिस जारी कर दिया है और कहा है कि इस याचिका को अन्य संबंधित मामलों के साथ 23 मार्च को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा। कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इस मामले का फैसला भारत में डेटा सुरक्षा, निजता और पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।