मंगल के चंद्रमा पर उतरेगा रोबोट: फिर पृथ्वी पर लाएगा मिट्टी; तकनीक के लिहाज से क्यों खास है जापान का यह मिशन?
मंगल के चंद्रमा 'फोबोस' से मिट्टी और चट्टानों के नमूने पृथ्वी पर लाना बिल्कुल भी आसान नहीं है, लेकिन जापान का एमएमएक्स मिशन अपनी तकनीक से इस बड़ी चुनौती को मात देने की तैयारी में है। इस मिशन में खुद को खुद-ब-खुद सीधा कर सकने वाला चार पहियों का रोवर, कम ग्रेविटेशन में काम करने वाला लैंडर और सैंपल्स को सुरक्षित पृथ्वी पर वापस लाने वाला एडवांस अंतरिक्ष यान शामिल है। आइए जानते हैं कि तकनीक के लिहाज से जापान का यह मिशन इतना खास क्यों माना जा रहा है...

विस्तार
अंतरिक्ष में किसी दूसरे ग्रह या उसके चंद्रमा तक पहुंचना ही बड़ी चुनौती नहीं है। बल्कि वहां रोबोट को सुरक्षित उतारना, कम ग्रे वहां रोबोट को सुरक्षित उतारना, कम ग्रेविटेशन (माइक्रो-ग्रेविटी) में उसे चलाना, मिट्टी और चट्टानों के नमूने इकट्ठा करना और फिर उन्हें पृथ्वी तक वापस लाना तकनीक की कहीं बड़ी परीक्षा है। जापान का मार्शियन मून्स एक्सप्लोरेशन यानी एमएमएक्स मिशन इन्हीं चुनौतियों पर काम कर रहा है। इसका लक्ष्य मंगल के चंद्रमा फोबोस से नमूने लाकर 2031 तक पृथ्वी पर पहुंचाना है। मिशन की खासियत इसका रोवर, नमूने जुटाने वाला लैंडर और वापसी के लिए तैयार किया गया पूरा सिस्टम है।
जापान के MMX मिशन की तकनीक खास क्यों है?
- जापान की अंतरिक्ष एजेंसी जापान एयरोस्पेस एक्सप्लोरेशन एजेंसी के देखरेख में चल रहा एमएमएक्स मिशन मंगल के दो चंद्रमाओं फोबोस और डीमोस का अध्ययन करेगा। इसमें करीब पांच टन वजनी अंतरिक्ष यान का इस्तेमाल किया जाएगा। मिशन के तहत फोबोस की सतह पर एक रोबोटिक रोवर उतारा जाएगा, जबकि मुख्य अंतरिक्ष यान बाद में वहां से नमूने इकट्ठा करके पृथ्वी पर वापस लाने की कोशिश करेगा।
- इस मिशन की सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती सिर्फ फोबोस तक पहुंचना ही नहीं, बल्कि वहां की सतह पर काम करते हुए नमूनों को सुरक्षित वापस लाना भी है। पृथ्वी पर लौटने से पहले अंतरिक्ष यान को मंगल प्रणाली में कई चरण पूरे करने होंगे। इसी वजह से यह मिशन रोबोटिक्स, नेविगेशन, सतह पर उतरने और सैंपल रिटर्न तकनीक का यह परीक्षण खास माना जा रहा है।
कम ग्रेविटेशन में कैसे काम करेगा रोवर?
- इस मिशन में फ्रांस और जर्मनी के सहयोग से तैयार किया गया आइडफिक्स (Idefix) रोवर फोबोस की सतह पर उतर सकता है। इसका आकार माइक्रोवेव ओवन से बड़ा नहीं बताया गया है। चार पहियों वाला यह रोवर बेहद कम ग्रेविटेशन वाले वातावरण में काम करेगा, जहां सामान्य ग्रहों की तरह चलना आसान नहीं होगा।
- फोबोस पर ग्रेविटेशन बहुत कम होने की वजह से रोवर उतरते समय कुछ देर तक सतह पर उछल सकता है। इसलिए इसका डिजाइन इस तरह तैयार किया गया है कि यह उल्टा गिरने पर खुद को सीधा कर सके। हालांकि, नरम मिट्टी में धंसने या चट्टानों के बीच फंसने जैसी स्थिति में इसे बचाना मुश्किल हो सकता है।
- रोवर की गति भी बेहद धीमी रखी जाएगी। यह लगभग एक मिलीमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से आगे बढ़ सकता है। इसकी वजह सतह पर सुरक्षित तरीके से चलना और आसपास के इलाके का निरीक्षण करना है। रोवर का काम करीब 100 दिनों तक फोबोस की सतह और आसपास के क्षेत्र की जानकारी जुटाना होगा।
मुख्य लैंडर के लिए रास्ता तैयार करेगा रोवर
- बता दें कि आइडफिक्स रोवर सिर्फ तस्वीरें लेने या सतह का अध्ययन करने के लिए नहीं है। यह मुख्य अंतरिक्ष यान के लिए एक तरह के सुरक्षा स्काउट की भूमिका भी निभाएगा। इसके जरिए वैज्ञानिक फोबोस की सतह पर मौजूद धूल, चट्टानों और ऊबड़-खाबड़ हिस्सों को समझ सकेंगे।
- यह जानकारी इसलिए जरूरी है, क्योंकि मिशन के अगले चरण में मुख्य लैंडर को सतह पर उतरकर नमूने इकट्ठा करने हैं। गलत जगह उतरने पर लैंडर को नुकसान पहुंच सकता है या वह नमूने जुटाने में असफल हो सकता है। रोवर से मिली जानकारी सही स्थान चुनने और जोखिम कम करने में मदद कर सकती है।
सिर्फ दो घंटे में नमूने जुटाने की चुनौती
- मिशन की योजना के अनुसार, मुख्य लैंडर 2028 के अंत या 2029 में फोबोस की सतह पर उतर सकता है। उसे वहां करीब दो घंटे बिताने होंगे। इसी दौरान ड्रिलिंग करके कम से कम दस ग्राम मिट्टी और चट्टानों की सामग्री जुटाने का लक्ष्य है।
- यह काम सीमित समय में पूरा करना होगा। लैंडर को सतह पर उतरने, सही जगह पर काम करने, नमूने इकट्ठा करने और फिर वापस उड़ान भरने की तैयारी करनी होगी। कम ग्रेविटेशन और असमान सतह की वजह से हर चरण में तकनीकी जोखिम रहेगा।
- इन नमूनों को खास इसलिए भी माना जा रहा है, क्योंकि फोबोस की सामग्री में मंगल से आए पदार्थ मौजूद हो सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो वैज्ञानिकों को एक ही मिशन से फोबोस के साथ मंगल के बारे में भी अहम जानकारी मिल सकती है।
नमूने पृथ्वी तक कैसे पहुंचेंगे?
- यह इस मिशन को लेकर सबसे बड़ा सवाल है। सैंपल इकट्ठा करने के बाद मिशन का सबसे अहम चरण शुरू होगा, जो है उन्हें सुरक्षित पृथ्वी तक लाना। योजना के अनुसार, अंतरिक्ष यान 2030 में मंगल के आसपास के क्षेत्र से रवाना होने से पहले डीमोस के पास से गुजरकर उसका अध्ययन करेगा। इसके बाद यह पृथ्वी की ओर लौटेगा और 2031 में ऑस्ट्रेलिया के रेगिस्तान में नमूनों को पहुंचाने का लक्ष्य है।
- इस तरह मिशन केवल दूसरे खगोलीय पिंड तक पहुंचने तक सीमित नहीं है। इसमें नमूनों को इकट्ठा करने, उन्हें अंतरिक्ष में सुरक्षित रखने, वापसी की यात्रा पूरी करने और पृथ्वी पर पहुंचाने की तकनीक भी शामिल है। यदि यह प्रक्रिया सफल रहती है, तो मंगल प्रणाली से नमूने वापस लाने वाला यह पहला मिशन बन सकता है।
जापान को सैंपल रिटर्न तकनीक में बढ़त क्यों?
- जापान पहले ही दो बार क्षुद्रग्रहों से नमूने पृथ्वी पर वापस लाने में सफल रहा है। इस अनुभव से उसे ऐसे मिशन की योजना बनाने में मदद मिल सकती है, जिसमें दूसरे खगोलीय पिंड के पास पहुंचना, वहां से सामग्री जुटाना और उसे पृथ्वी तक वापस लाना शामिल है।
- हालांकि, फोबोस का वातावरण और सतह क्षुद्रग्रहों से अलग हो सकते हैं। इसलिए पहले के मिशनों का अनुभव मददगार होने के बावजूद एमएमएक्स की सफलता की गारंटी नहीं देता। इस बार रोवर को कम गुरुत्वाकर्षण में काम करना होगा और मुख्य अंतरिक्ष यान को मंगल प्रणाली में जटिल चरण पूरे करने होंगे।
फोबोस की मिट्टी से क्या पता चलेगा?
- फोबोस मंगल का छोटा और अनियमित आकार वाला चंद्रमा है, जिसका व्यास लगभग 22 किलोमीटर है। वैज्ञानिकों के सामने इसके बनने को लेकर दो प्रमुख संभावनाएं हैं। पहली, बहुत पहले मंगल और किसी बड़े अंतरिक्ष पिंड की टक्कर से निकले मलबे से फोबोस और डीमोस बने हों। दूसरी, ये चंद्रमा मूल रूप से क्षुद्रग्रह रहे हों, जो मंगल के ग्रेविटेशन में फंस गए।
- फोबोस के नमूनों का अध्ययन इन संभावनाओं के बीच अंतर समझने में मदद कर सकता है। अगर नमूनों में मंगल से आए पदार्थ मिले, तो वैज्ञानिक मंगल की सतह और उसके इतिहास के बारे में भी नई जानकारी हासिल कर सकते हैं।
- इससे ग्रहों और उनके चंद्रमाओं के बनने की प्रक्रिया को समझने में मदद मिल सकती है। भविष्य के मंगल अभियानों के लिए भी ऐसी जानकारी उपयोगी साबित हो सकती है।
इस मिशन में कई देशों की तकनीक शामिल
- बता दें कि एमएमएक्स मिशन जापान के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय सहयोग का उदाहरण है। इसमें फ्रांस और जर्मनी ने रोवर के विकास में योगदान दिया है, जबकि नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी समेत अन्य एजेंसियां भी सहयोग कर रही हैं। मिशन की कुल लागत करीब 578 मिलियन अमेरिकी डॉलर बताई गई है।
- जापान इस परियोजना में लगभग 350 मिलियन डॉलर का योगदान दे रहा है। नासा करीब 87 मिलियन डॉलर, फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसी लगभग 68 मिलियन डॉलर, जर्मन अंतरिक्ष एजेंसी करीब 56 मिलियन डॉलर और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी लगभग 17 मिलियन डॉलर दे रही है।
- इस बीच, चीन भी 2028 में मंगल से नमूने वापस लाने वाला मिशन लॉन्च करने की योजना बना रहा है। वहीं, नासा अपने पर्सिवरेंस रोवर द्वारा जुटाए गए नमूनों को पृथ्वी तक लाने के विकल्पों पर काम कर रहा है। ऐसे में मंगल प्रणाली से नमूने वापस लाने की तकनीक अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान का अहम क्षेत्र बन रही है।