अमेरिका के जीपीएस को चीन के ‘बाइदो’ से मिल रही है जोरदार टक्कर

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अमेरिका के जीपीएस (ग्लोबल पॉजिशनिंग सिस्टम) को चीन का नेविगेशन सिस्टम- बाइदो- अब जबरदस्त चुनौती दे रहा है। ‘द फाइनेंशियल टाइम्स ग्रुप’ की वेबसाइट-निक्कई एशिया में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 165 देशों की राजधानियों में अब जीपीएस की तुलना में बाइदो का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है। ये रिपोर्ट 195 से जुटाए गए आंकड़ों पर आधारित है। ये आंकड़े अमेरिका की सैटेलाइट रिसीवर कंपनी ट्रिंबल ने जुटाए हैं।
चीन के लगभग 30 उपग्रहों से बाइदो सिस्टम को संकेत मिलते हैं। खासकर अफ्रीकी देशों में इसका इस्तेमाल ज्यादा हो रहा है। बताया जाता है कि वहां जीपीएस की तुलना में बाइदो की सेवाएं अधिक तेज गति से और अधिक सटीक ढंग से मिल रही हैं।
निक्कई एशिया की रिपोर्ट में इथोपिया की राजधानी अदिस अबाबा के कई निवासियों का हवाला दिया गया है। उनके मुताबिक इस शहर में सटीक सेवा के कारण बाइदो की लोकप्रियता हाल में तेजी से बढ़ी है। घर पर खाना सप्लाई करने वाले ऐप्स वहां अब इसका ही इस्तेमाल कर रहे हैं।
बताया जाता है कि इससे फूड ऑर्डर करने वाले व्यक्ति के घर का पता जीपीएस की तुलना में अधिक सही ढंग से सप्लायर को मिलता है। जानकारों का कहना है कि मूल रूप से चीन ने बाइदो सिस्टम सेना के इस्तेमाल के लिए बनाया था। इसलिए इससे अधिक सटीक ढंग से संकेत हासिल करने का सिस्टम लगाया गया।
रिपोर्ट में कई अफ्रीकी शहरों से शामिल की गई सूचनाओं के मुताबिक बाइदो के कारण वहां स्मार्टफोन पॉजिशनिंग इन्फॉर्मेशन में जबरदस्त सुधार हुआ है। आदिस अबाबा में रेस्त्रां चलाने वाले एक जापानी व्यक्ति ने निक्कई एशिया से कहा कि बाइदो के कारण ही कोरोना महामारी के समय भी उनका रेस्त्रां लोगों के घरों पर खाने की सप्लाई करता रहा।
अफ्रीका का ये अनुभव बताता है कि डाटा के मामले में अमेरिकी वर्चस्व को अब क्यों चुनौती मिल रही है। अमेरिका ने अपना पहला जीपीएस सैटेलाइट 1978 में छोड़ा था। जबकि चीन ने 1980 में इस पर काम शुरू किया और बाइदो सिस्टम को पूरी तरह इस साल जून में जाकर लॉन्च कर पाया। सिर्फ पांच महीनों में ये सिस्टम अब अमेरिकी वर्चस्व के लिए चुनौती बन गया है।
जीपीएस सिस्टम दोनों देशों में शुरुआत में सेना के उपयोग के लिए विकसित किए गए। मकसद यह था कि मिसाइलों को सही मार्ग निर्देशन मिले और दूसरे देशों की सेना कहां है इसका आभास पाया जा सके। बाद में चीन ने नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम के मामले में आत्म निर्भर होने के लक्ष्य का एलान किया था। ऐसा उसने 1996 की एक घटना के बाद किया। उस समय अमेरिका ने प्रशांत क्षेत्र में उस जीपीएस सिस्टम को काट दिया, जिसका इस्तेमाल चीन करता था।
अब दुनिया में डाटा वर्चस्व की लड़ाई सिर्फ अंतरिक्ष में नहीं, बल्कि जमीन और समुद्र में भी चल रही है। चीन बाइदो के साथ-साथ अपने 5जी नेटवर्क्स को भी दुनिया भर में पहुंचाने की कोशिशों में जुटा है। इसके अलावा उसने समुद्र के अंदर केबल बिछाए हैं, जिस सिस्टम को अंतरिक्ष लिंक्स और धरती के सिस्टमों के लिंक्स से मदद मिलती है।
निक्कई एशिया की रिपोर्ट में बताया गया है कि उसने चीन के 34 सरकारी जहाजों की गतिविधियों का अध्ययन वेबसाइट मरीनट्रैफिक के जरिए किया है। ये वेबसाइट दुनिया भर में जहाजों के आवागमन की निगरानी ऑटोमैटिक आइडेंटिफिकेशन सिस्टम के जरिए करती है। इस अध्ययन का निष्कर्ष यह रहा कि चीन के जहाज ये संभव है कि साथ ही साथ अपनी सेना के लिए भी जानकारियां जुटा रहे हों। चीन की इन्हीं क्षमताओं के कारण आज दुनिया भर में उसकी बढ़ती ताकत आशंका की वजह बन गई है।