इंस्टाग्राम पर चाइल्ड एब्यूज विज्ञापन पर एनएचआरसी सख्त: 2 हफ्ते में मांगा जवाब, क्या बढ़ेगी कंपनी की मुश्किल?

जागृति शुक्ला
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्लीजागृति शुक्ला
Thu, 03 Sep 2026 05:42 PM IST
सार

इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मटीरियल को बढ़ावा देने वाले पेड विज्ञापन का नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन ने कड़ा संज्ञान लिया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, एनएचआरसी ने इलेक्ट्रॉनिक्स व आईटी मंत्रालय, सूचना और आईटी मंत्रालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय और दिल्ली पुलिस से दो हफ्ते के अंदर रिपोर्ट मांगी है। आइए जानते हैं आखिर पूरा मामला क्या है और मेटा पर शिकंजा क्यों कसा जा रहा है।

विज्ञापन
Instagram CSAM Ads Row, NHRC Seeks Reports  Meta, Questions  AI Role
इंस्टाग्राम पर चाइल्ड एब्यूज कंटेंट के पेड विज्ञापन पर एनएचआरसी की कार्रवाई - फोटो : एआई जनरेटेड

    विस्तार

    नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन यानी एनएचआरसी ने मेटा के इंस्टाग्राम पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मटीरियल (सीएसएएम) तक पहुंच को कथित तौर पर बढ़ावा देने या आसान बनाने वाले पेड विज्ञापनों की रिपोर्ट्स का संज्ञान लिया है। इस मामले में आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (एमआईबी) और दिल्ली पुलिस से दो सप्ताह के भीतर खास और पॉइंट-वाइज एक्शन टेकन रिपोर्ट मांगी है।

    क्या है पूरा मामला?

    दरअसल, एनएचआरसी ने एक मीडिया रिपोर्टस का संज्ञान लिया है। रिपोर्ट्स में आरोप लगाया गया था कि इंस्टाग्राम पर दिखाए गए कुछ पेड विज्ञापनों के जरिए भारत में बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री तक पहुंच को कथित तौर पर बढ़ावा दिया गया। आरोप है कि कुछ विज्ञापनों में रेप वीडियो और चाइल्ड वीडियो जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया और यूजर्स को टेलीग्राम के उन चैनलों की ओर भेजा गया, जहां ऐसी सामग्री कथित तौर पर बिक्री के लिए उपलब्ध कराई जा रही थी।

    विज्ञापन

    विज्ञापन रिव्यू सिस्टम पर भी सवाल

    • इतना ही नहीं, एनएचआरसी की कार्यवाही में कहा गया है कि रिपोर्ट किए गए विज्ञापन मेटा के रिव्यू सिस्टम से गुजरने के बावजूद कथित तौर पर उपलब्ध रहे। रिपोर्ट के अनुसार, इन्हें तब हटाया गया जब उसे खास तौर पर मेटा के संज्ञान में यह मामला लाया है।
    • आयोग का कहना है कि अगर ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो मामला सिर्फ आपत्तिजनक ऑनलाइन कंटेंट तक सीमित नहीं रहेगा। इससे बच्चों के ऑनलाइन यौन शोषण, सीएसएएम या सीएसईएएम के प्रसार और कथित मुद्रीकरण, संभावित संगठित अपराध तथा विज्ञापन समीक्षा, कंटेंट मॉडरेशन और बाल सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता से जुड़े गंभीर सवाल उठेंगे।

    MeitY से पॉक्सो की धारा 19 पर जवाब मांगा

    • एनएचआरसी ने MeitY से खास तौर पर यह बताने को कहा है कि पॉक्सो एक्ट, 2012 की धारा 19 के तहत क्या कार्रवाई की गई। धारा 19 के तहत ऐसे अपराधों की जानकारी मिलने पर संबंधित मामले की रिपोर्ट स्पेशल जुवेनाइल पुलिस यूनिट या स्थानीय पुलिस को किए जाने की व्यवस्था है।
    • एनएचआरसी ने पूछा है कि क्या कथित अपराध की जानकारी मिलने के बाद इसकी रिपोर्ट की गई थी। अगर रिपोर्ट नहीं की गई तो इसकी वजह और जिम्मेदार अधिकारी या प्राधिकरण की जानकारी भी देने को कहा गया है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि ऐसे मामलों में कानूनी रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी को केवल अंदरूनी बातचीत, शिकायत निपटाने या नियामकीय प्रक्रिया से नहीं बदला जा सकता।

    मेटा की एआई भूमिका भी जांच के दायरे में

    • इतना ही नहीं इस मामले में एनएचआरसी ने सिर्फ विज्ञापनों तक अपनी जांच सीमित नहीं रखी है। आयोग ने यह सवाल भी उठाया है कि अगर मेटा के एआई और एल्गोरिदमिक सिस्टम कंटेंट को बनाते, बदलते, क्यूरेट करते, रिकमेंड करते, प्रकाशित या बढ़ावा देते हैं, तो क्या कंपनी की कानूनी स्थिति सिर्फ एक इंटरमीडियरी की रह जाती है।
    • एमआईबी से यह जांचने को कहा गया है कि ऐसी भूमिका होने पर क्या मेटा पर आईटी रूल्स, 2021 के तहत ऑनलाइन क्यूरेटेड कंटेंट के पब्लिशर या संबंधित श्रेणी के तौर पर कोई अलग नियामकीय जिम्मेदारी लागू होती है।

    इंटरमीडियरी स्टेटस पर क्यों उठा सवाल?

    • सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को इंटरमीडियरी के तौर पर कुछ कानूनी सुरक्षा मिलती है, लेकिन एनएचआरसी अब यह देखना चाहता है कि जब प्लेटफॉर्म के अपने सिस्टम कंटेंट को चुनने, रिकमेंड करने, बढ़ाने या मॉनेटाइज करने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी किस सीमा तक तय होनी चाहिए।
    • आयोग ने इस बात पर जोर दिया है कि मेटा की वास्तविक तकनीकी और संपादकीय भूमिका को देखकर यह तय किया जाना चाहिए कि वह सिर्फ एक निष्क्रिय प्लेटफॉर्म है या उसके सिस्टम कंटेंट के प्रसार और प्रमोशन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

    सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी जिक्र

    एनएचआरसी ने जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन एलायंस एंड एनादर बनाम एस हरिश एंड अदर्स मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी संज्ञान लिया है। आयोग ने तुरंत रिपोर्टिंग, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को सुरक्षित रखने, संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय, बच्चों की पहचान और उनके बचाव व सुरक्षा जैसे पहलुओं पर जोर दिया है। एनएचआरसी ने यह भी कहा है कि इंर्फोमेशन टेक्नोलॉजी एक्ट 2000 की धारा 79 अपने आप में पॉक्सो एक्ट और उसके तहत लागू जिम्मेदारियों का पालन न करने से छूट नहीं देती।

    विज्ञापन
    विज्ञापन

    जांच में किन चीजों पर होगी नजर?

    एनएचआरसी की कार्यवाही के अनुसार, मामले की जांच पॉक्सो एक्ट, इंर्फोमेशन टेक्नोलॉजी एक्ट और लागू इंटरमीडियरी फ्रेमवर्क के तहत की जानी चाहिए। इसमें इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को सुरक्षित रखना और उनकी फोरेंसिक जांच, विज्ञापनदाता और अन्य संबंधित पक्षों की पहचान, वित्तीय लेनदेन की कड़ी का पता लगाना, बाल पीड़ितों की पहचान और बचाव तथा उनकी सुरक्षा और पुनर्वास जैसे पहलू शामिल हैं। साथ ही, संबंधित इंटरमीडियरी और उनके जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका और जिम्मेदारी भी जांच का हिस्सा हो सकती है।

    दिल्ली पुलिस से भी मांगी गई अपडेटेड रिपोर्ट

    इंर्फोमेशन टेक्नोलॉजी एक्टने दिल्ली पुलिस की पहले दाखिल की गई रिपोर्ट को रिकॉर्ड में लिया है। अब पुलिस आयुक्त, दिल्ली को अतिरिक्त जानकारी और अपडेटेड एक्शन टेकन रिपोर्ट दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया गया है। पुलिस से खास तौर पर मामले में की गई कार्रवाई और टेलीग्राम से मांगी या प्राप्त की गई जानकारी, अगर कोई है, उसका विवरण और उस जानकारी के आधार पर की गई आगे की कार्रवाई बताने को कहा गया है।

    अब आगे क्या होगा?

    अब MeitY, एमआईबी और दिल्ली पुलिस को एनएचआरसी के सामने पॉइंट-वाइज रिपोर्ट रखनी होगी। जांच का दायरा सिर्फ कथित सीएसएम विज्ञापनों तक नहीं है, बल्कि यह भी देखा जा रहा है कि प्लेटफॉर्म की तकनीकी, एआई और एल्गोरिदमिक प्रणालियां कंटेंट के चयन, सिफारिश, प्रसार और मॉनेटाइजेशन में कितनी सक्रिय भूमिका निभाती हैं। फिलहाल ये सभी आरोप जांच के दायरे में हैं और एनएचआरसी ने अभी इन आरोपों को अंतिम रूप से सही ठहराने वाला निष्कर्ष नहीं दिया है।

    Login or Signup
    अपना शहर चुनें