रिपोर्ट: फार्मा कंपनियों के गुप्त डेटा से एआई हुआ और ताकतवर, दवा खोज में हो सकता है बड़ा बदलाव

नितिन गौतम
अमर उजाला नेटवर्कनितिन गौतम
Tue, 15 Sep 2026 02:39 PM IST
सार

विभिन्न रिसर्च में एआई तकनीक का काफी फायदा मिल रहा है। अब फार्मा कंपनियों के गुप्त डाटा से एआई और ताकतवर हुआ है और इससे दवा की खोज के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आ सकते हैं। आइए समझते हैं कैसे...

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AI became powerful after pharma companies secret data can change medical science
डॉक्टरों की मदद करने वाला एआई - फोटो : Amarujala.com/AI

    विस्तार

    दवा बनाने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाने वाले प्रोटीन की संरचना और दवाओं के साथ उनकी प्रतिक्रिया समझने वाले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) मॉडल को अब फार्मा कंपनियों के निजी डेटा से बड़ी ताकत मिल सकती है। वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय समूह ने दवा कंपनियों के पास मौजूद 20 हजार से ज्यादा प्रोटीन संरचनाओं का इस्तेमाल कर एआई मॉडल को प्रशिक्षित किया और पाया कि इसकी भविष्यवाणी करने की क्षमता सार्वजनिक डेटा पर निर्भर मॉडल से काफी बेहतर हो गई।

    नेचर में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह अध्ययन एआई और दवा खोज के क्षेत्र में एक बड़ी समस्या की ओर भी इशारा करता है। प्रोटीन की संरचना को समझने के लिए दुनिया में सबसे महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्रोत प्रोटीन डेटा बैंक (पीडीबी) है। इसमें प्रयोगों से हासिल दो लाख से ज्यादा प्रोटीन संरचनाएं मौजूद हैं। इसी तरह के विशाल सार्वजनिक डेटा ने अल्फाफोल्ड-2 जैसे एआई मॉडल को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, लेकिन जब बात प्रोटीन और संभावित दवा के बीच होने वाली जटिल बातचीत को समझने की आती है, तो सार्वजनिक डेटाबेस में डेटा अपेक्षाकृत कम है।

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    दवा कंपनियां अपने अनुसंधान के दौरान एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी और क्रायो-इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी जैसी तकनीकों से हजारों प्रोटीन संरचनाएं हासिल करती हैं। इनमें से बहुत-सी संरचनाएं सार्वजनिक नहीं की जातीं, क्योंकि वे नई दवाओं के विकास से जुड़ी गोपनीय परियोजनाओं का हिस्सा होती हैं।

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    20,167 संरचनाओं से मिली एआई को नई ट्रेनिंग

    एआई स्ट्रक्चरल बायोलॉजी नेटवर्क में शामिल शोधकर्ताओं ने ओपनफोल्ड-3 नाम के ओपन-सोर्स एआई मॉडल को अतिरिक्त 20,167 ऐसी प्रोटीन संरचनाओं से प्रशिक्षित किया, जिनमें प्रोटीन संभावित दवाओं या दूसरे अणुओं के साथ जुड़े हुए थे। यह डेटा पांच दवा कंपनियों से मिला। कंपनियों का मूल निजी डेटा सार्वजनिक किए बिना मॉडल को प्रशिक्षित किया गया।इसके बाद मॉडल की जांच 1,056 ऐसी प्रोटीन-दवा संरचनाओं पर की गई, जिन्हें प्रशिक्षण के दौरान इस्तेमाल नहीं किया गया था। नतीजे उत्साहजनक रहे। नए मॉडल ने आधे से ज्यादा मामलों में उच्च स्तर की सटीकता हासिल की। वहीं केवल सार्वजनिक डेटा पर प्रशिक्षित ओपनफोल्ड-3 ने करीब एक-तिहाई मामलों में ही इसी स्तर का प्रदर्शन किया। दूसरे ओपन-सोर्स मॉडल बोल्ट्ज-2 का प्रदर्शन करीब 40 प्रतिशत रहा।

    डेटा जितना बड़ा, एआई की समझ उतनी बेहतर

    शोधकर्ताओं के मुताबिक नतीजे यह बताते हैं कि अलग-अलग कंपनियों के डेटा को एक साथ इस्तेमाल करने से एआई की क्षमता और बढ़ सकती है। खास बात यह है कि किसी एक कंपनी के निजी डेटा पर प्रशिक्षित मॉडल की तुलना में भी साझा डेटा से प्रशिक्षित मॉडल ने बेहतर प्रदर्शन किया।वैज्ञानिकों का मानना है कि प्रोटीन और दवाओं की परस्पर क्रिया से जुड़े ज्यादा डेटा उपलब्ध होने पर एआई नए संभावित ड्रग टारगेट और दवा अणुओं की पहचान में ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

    आम आदमी के लिए इसका मतलब क्या?

    सीधी भाषा में समझें तो वैज्ञानिक एआई को यह सिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि किसी बीमारी से जुड़े प्रोटीन के साथ कौन-सी दवा बेहतर तरीके से काम कर सकती है। जितने ज्यादा असली उदाहरण एआई को मिलेंगे, वह संभावित दवाओं के असर का अनुमान उतनी बेहतर तरह से लगा सकेगा। इससे भविष्य में प्रयोगशाला में बेकार साबित होने वाली दवाओं पर समय और पैसा खर्च कम करने तथा संभावित दवाओं की पहचान तेजी से करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, एआई की बेहतर भविष्यवाणी का मतलब यह नहीं है कि दवा सीधे मरीजों के लिए तैयार हो गई।

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