ईरान: हिजाब न पहनने वाली महिलाओं की बढ़ रही है शामत, बुर्के को बढ़ावा देने के लिए सरकार खर्च करती है मोटी रकम
देश में हर साल हिजाब पहनने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित करने पर सरकार लाखों डॉलर खर्च करती है। इसके लिए प्रदशनियां लगाई जाती हैं, सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं, टीवी और रेडियो पर प्रोग्राम दिखाए जाते हैं, पर्चे बांटे जाते हैं, और जगह-जगह हॉर्डिंग लगाए गए हैं। एक अध्ययन के मुताबिक 32 सरकारी विभाग और एजेंसियां ऐसी हैं, जो हिजाब से जुड़े प्रचार पर धन खर्च करती हैं...
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ईरान के उरमिया शहर में बीते आठ अगस्त एक कट्टरपंथी व्यक्ति ने दो महिलाओं को अपने वाहन से टक्कर मार दी। उसे शिकायत थी कि वे महिलाएं हिजाब के नियम का ठीक से पालन नहीं कर रही हैं। इस घटना का वीडियो पूरे ईरान में वायरल हुआ। तब अधिकारियों ने हमलावर पर कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया था। लेकिन इस दिशा में अब तक ऐसी कोई पहल नहीं हुई है, जिससे ये भरोसा बंधता कि दोषी को कड़ी सजा दी जाएगी। ऐसा पहले कई दूसरे मामलो में भी हुआ है।
ईरान में 1979 में हुई इस्लामी क्रांति के बाद से हिजाब (बुर्के) के बारे में सख्त नियम लागू हैं। देश में हर साल हिजाब पहनने के लिए महिलाओं को प्रोत्साहित करने पर सरकार लाखों डॉलर खर्च करती है। इसके लिए प्रदशनियां लगाई जाती हैं, सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं, टीवी और रेडियो पर प्रोग्राम दिखाए जाते हैं, पर्चे बांटे जाते हैं, और जगह-जगह हॉर्डिंग लगाए गए हैं। एक अध्ययन के मुताबिक 32 सरकारी विभाग और एजेंसियां ऐसी हैं, जो हिजाब से जुड़े प्रचार पर धन खर्च करती हैं।
अब आशंका है कि इब्राहिम रईसी के राष्ट्रपति बनने के बाद हिजाब संबंधी नियम और सख्ती से लागू किए जाएंगे। रईसी पहले देश के प्रधान न्यायाधीश थे। तब उन्होंने हिजाब नियमों के बारे में कई सख्त निर्देश जारी किए थे। आलोचकों का कहना है कि रईसी के राष्ट्रपति बनने से कट्टरपंथियों का मनोबल बढ़ा है। उरमिया में हुई घटना को भी इससे जोड़ कर देखा गया है। रईसी ने पांच अगस्त को राष्ट्रपति पद की शपथ ली थी। उसके तीन दिन बाद वह घटना हुई।
ईरान की पुलिस में एक नैतिक सुरक्षा प्रभाग भी है। उसके कर्मचारी हिजाब नियमों का उल्लंघन करने वाली महिलाओं की भी निगरानी करते हैं। कई बार इस दौरान उनके हिंसक ढंग से पेश आने की शिकायतें भी आती रही हैं। ऐसे कोई फोटो या वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके हैं, जिनमें इन कर्मचारियों को महिलाओं को पीटते हुए या उन्हे अपमानित करते दिखाया गया। वैसे आम तौर पर नियम तोड़ने वाली महिला को उससे यह हलफनामा भरवाने के बाद छोड़ दिया जाता है कि वह आगे ऐसा नहीं करेगी।
उरमिया की घटना के बाद से ईरान में सोशल मीडिया पर हिजाब नियमों को लेकर तीखी बहस चल रही है। इस दौरान कई लोगों ने ये दलील दी है कि हिजाब एक धार्मिक सलाह है, जिसकी व्याख्या अपने ढंग से की जा सकती है। उनके मुताबिक कई इस्लामी देशों में ऐसा ही प्रावधान है। लेकिन ईरान में सरकार का समर्थन ऐसे चरमपंथी गुटों या व्यक्तियों के साथ रहता है, जो सड़कों पर हिजाब नियम तोड़ने वाली महिलाओं को फटकार लगाते हैं या उन पर फब्तियां कसते हैं।
महिला अधिकार संगठनों के मुताबिक ऐसी घटनाओं का महिलाओं के मनोविज्ञान पर बहुत बुरा असर होता है। पीड़ित महिलाएं भीतर से टूट जाती हैं। आलोचकों का कहना है कि इराक, लेबनान और सीरिया जैसे देशों में भी आबादी का बड़ा हिस्सा ईरान की तरह ही शिया मुसलमानों का है। लेकिन वहां महिलाओं की आजादी पर वैसी रोक नहीं है, जैसा ईरान में थोपा जाता है। कई विश्लेषकों का कहना है कि ईरान की सरकार हिजाब नियमों में ढील देने के लिए इस डर से भी तैयार नहीं होती कि उस हाल में लोग दूसरी आजादियां भी मांगने लगेंगे। अमेरिका की नॉर्थ-ईस्टर्न इलिनोइस यूनिवर्सिटी में इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर मोहम्मद फरजानाह ने वेबसाइट एशिया टाइम्स से कहा- ‘कभी-कभी हिजाब जैसी साधारण सी चीज भी वह पैमाना बन जाती है, जिससे लोग यह समझ सकते हैं कि किसी देश में जनता पर सरकार का किस हद तक नियंत्रण है।’